News Strike: बिजली कंपनी की बकाया बिल वसूलने की योजना को लगा पलीता, क्या निजीकरण की है तैयारी

मध्यप्रदेश में बिजली कंपनियों के प्राइवेटाइजेशन को लेकर विवाद तेज हो गया है। बकाया बिल वसूलने के लिए समाधान योजना भी विफल हो गई है। आम उपभोक्ताओं पर बोझ बढ़ सकता है।

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Harish Divekar
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Photograph: (thesootr)

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NEWS STRIKE (न्यूज स्ट्राइक) :मध्यप्रदेश में बिजली उपभोक्ताओं के दिन कभी भी फिर सकते हैं। अफसरों की लेतलाली या लापरवाही या कुछ नामुनासिब मंसूबे बहुत जल्द आम उपभोक्ताओं पर महंगी बिजली का भार थोप सकते हैं।

बिजली विभाग और बिजली कंपनियों के मौजूदा हालात इसी ओर इशारा कर रहे हैं। खबरिया चैनल, अखबार या सोशल मीडिया के जरिए आप ये तो जान ही चुके होंगे कि बिजली वितरण कंपनी यानी कि बिजली सप्लाई करने वाली कंपनियों के प्राइवेटाइजेशन की मांग उठने लगी है।

कैसे कभी अफसर तो कभी नेता इस निजीकरण की तरफ कंपनी को ढकेल रहे हैं और उसका आम उपभोक्ता को कैसे खामियाजा भुगतना पड़ेगा या मैं आपको आसान भाषा में और सिलसिलेवार तरीके से समझाता हूं।

निजीकरण को लेकर केंद्र सरकार के तीन ऑप्शन 

सबसे पहले बात निजीकरण की ही करते हैं। बिजली कंपनियों के प्राइवेटाइजेशन को लेकर केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को तीन अलग-अलग ऑप्शन दिए। शर्त ये रखी है कि अगर उन तीन ऑप्शन में से किसी एक को नहीं माना गया तो केंद्र जो ग्रांट देता है वो रोक देगा। यानी बिजली आपूर्ति के लिए केंद्र से जो मदद मिलती है वो बंद हो जाएगी। अब ये जानिए कि ये तीन विकल्प क्या-क्या हैं।

पहले दो ऑप्शन में बिजली कंपनियों का कुछ हिस्सा प्रायवेट कंपनियों को देने के लिए कहा गया है। ये हिस्सेदारी 26 से 51 प्रतिशत तक हो सकती है। तीसरा ऑप्शन ये दिया गया कि बिजली कंपनी को स्टॉक मार्केट की लिस्टेड कंपनी बनाया जाए। इन विकल्पों पर कुछ राज्यों के ऊर्जा मंत्री आपस में बैठक भी कर चुके हैं।

बिजली कंपनी के निजीकरण को लेकर मध्यप्रदेश सरकार का स्टेंड ये है कि फिलहाल कंपनियों को निजी हाथों में न सौंपा जाए। अधिकारियों का एक वर्ग भी इसी पक्ष में है। उनका मानना है कि साल 2028 में सिंहस्थ का आयोजन होना है। जो मध्यप्रदेश के लिए एक बड़ा आयोजन है। ऐसे समय में बिजली की कमान प्रदेश के पास ही होना चाहिए।

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बकायादार बने हुए हैं सरकार के लिए मुसीबत

बिजली कंपनी का काम निजी हाथों में न जाए इसके लिए प्रदेश सरकार काफी प्रयास भी कर रही है। सरकार या विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है। बिजली की जितनी आपूर्ति हुई है उतना ही बिल भी जमा हो सके। कई बकायादार ऐसे होते हैं जो सजा की जानकारी होने के बावजूद बिल नहीं जमा करते हैं।

ऐसे बिजली कंज्यूमर्स सरकार की मुसीबत बने हुए हैं। जिनकी वजह से बिजली का बोझ सरकार पर आ जाता है और तब ये डर सताता है कि केंद्र ने भी ग्रांट देने से हाथ खींच लिए तो काम कैसे चलेगा। बस इसी सोच के साथ सरकार ने समाधान योजना शुरू की थी। 

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वसूली के लिए बनी समाधान योजना भी हुई फेल

असल में कुछ अधिकारियों ने भी सरकार को ये सलाह दी की बिजली बिलों की बकाया रकम वसूलना आसान काम नहीं है। इसके लिए सरकार को खास प्लानिंग करनी होगी। इसके लिए बिजली विभाग ने लॉन्च की समाधान योजना। अब इसके आगे की जानकारी जरा गौर से सुनिए। तब आप समझ पाएंगे कि सरकारी अफसरों का लचर रवैया कैसे एक अच्छी खासी और जनहितैषी योजना को पानी में डुबो सकता है।

सबसे पहले ये बता दें कि जिस वक्त समाधान योजना की चर्चा हुई और ये योजना लॉन्च हुई तब करीब 7 हजार 852 करोड़ रुपए बकाया थे। ये रकम जमा करने के लिए योजना के तहत सरचार्ज माफ करने का प्रावधान किया गया। उम्मीद यही थी कि सरचार्ज माफ होने के बाद लोग बकाया बिल जमा करेंगे और उसके बाद मामले खत्म कर दिए जाएंगे।

यानी न बोझ उपभोक्ता पर पड़ेगा और न ही सरकार को इतनी बड़ी रकम का बकाया भार झेलना पड़ेगा। पर योजना के बाद भी जो नतीजे हाथ लगे उसे देखकर विभागीय मंत्री प्रद्युम्न सिंह भी हैरान रह गए। 

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सात हजार करोड़ में से सवा तीन सौ करोड़ की वसूली 

समाधान योजना की नवंबर से दिसंबर की प्रोग्रेस रिपोर्ट ये साफ करती है कि अफसरों ने इस योजना को कुछ हद तक सफल बनाने के लिए भी कोई कोशिश नहीं की गई। हर तरह के उपभोक्ता को मिलाकर करीब 91 लाख छह हजार उपभोक्ता ऐसे हैं जिन्हें समाधान योजना के तहत अपने बिल जमा कर देने चाहिए थे।

इन उपभोक्ताओं पर सात हजार करोड़ से ज्यादा की राशि बकाया है। बिल अदा न कर पाने की वजह से इन से 3 हजार 861 करोड़ रुपए का सरचार्ज भी वसूला जाना था। पर सरचार्ज को काफी हद तक माफ कर दिया गया।

योजना के तहत 317 करोड़ रुपए से कुछ ज्यादा जमा हुए हैं। एक तरफ सात हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का बकाया और दूसरी तरफ सवा तीन सौ करोड़ रुपए के आसपास की वसूली। तराजू का एक पलड़ा इतना भारी है कि जमीन में धंसा जा रहा और दूसरा इतना हल्का है कि नीचे झुकने का नाम ही नहीं ले रहा। 

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कंपनी घाटे में दिखाना भी बड़ा सवाल खड़े करता है

ये आंकड़े सरकार के माथे पर तो बल डालने के लिए काफी हैं ही। ये भी जाहिर करते हैं कि योजना को किस लेवल पर फेल कर दिया गया। खबर तो ये भी है कि खुद विभागीय मंत्री ने भी इन बकाया और वसूली के आंकड़ों में ये फासला देखकर यही सवाल किया कि इतनी रकम के लिए योजना की क्या जरूरत थी। इतनी राशि तो अफसर ही वसूल लेते।

मंत्री का ये सवाल वाजिब भी है। जो अफसरों की मंशा पर सवाल भी उठाता है। जब बिजली कंपनी को बकाया रकम दिलाने के लिए एक कोशिश की गई थी तो उसका प्रचार प्रसार ऐसा क्यों नहीं हुआ कि बकायादार बिजली का बिल भरने की कोशिश करता।

क्या मध्यप्रदेश में बिजली कंपनी को घाटे में दिखाने की कोशिश जारी है। ताकि इसे निजी हाथों में सौंपना आसान हो जाए। क्या अफसरों ने जानबूझ कर वसूली की प्रक्रिया को ढील दी। इन सब सवालों पर विचार जरूरी है। 

निजीकरण से जोर का झटका तो आम उपभोक्ता ही खाएगा 

आखिर मध्यप्रदेश में बिजली विभाग से जुड़े अफसर या हुक्मरान चाहते क्या हैं। यहां आपको भी ये समझना जरूरी है कि निजी हाथों में बिजली जाने के बाद हो सकता है कि उसकी सप्लाई सुचारू हो जाए। अघोषित कटौती जैसी मुश्किलों से आपको न जूझना पड़े, लेकिन दूसरी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। सबसे पहला डर तो इसी बात है कि आपके फोन के कनेक्शन की तरह बिजली का कनेक्शन भी प्री पेड हालात पर ही मिलेगा। यानी जितना पैसा उतनी बिजली।

कुछ जानकारों का तो ये भी मानना है कि आम उपभोक्ता पर तो इस निजीकरण का उन्नीस बीस ही असर पड़ेगा, लेकिन किसान और दूसरे तबकों के लिए बिजली महंगी हो सकती है। जो अभी सरकार की सब्सिडी या नियमों के जरिए कम दरों पर बिजली हासिल करते हैं, जबकि निजी कंपनियां की पांचों उंगलियां घी में होंगी क्योंकि उन्हें एक तैयार सेटअप मिलेगा। 

बिजली की लाइन पूरे प्रदेश में फैली हुई हैं। उन्हें ये व्यवस्थित सेटअप लेकर काम शुरू करना है। यानी उनके लिए तो आम के आम होंगे और गुठलियों के भी पूरे दाम मिलेंगे, लेकिन बिजली का झटका जिन्हें जोर का लगेगा वो आपकी और मेरी तरह एक आम उपभोक्ता ही होगा।

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