लिव-इन रिलेशनशिप पर दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला, बालिगों को साथ रहने का पूरा अधिकार
Manya Jain | Mar 09, 2026, 16:19 IST
delhi high court live in relationship judgement rights protection
दिल्ली हाईकोर्ट ने लिव-इन जोड़ों की सुरक्षा पर कड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि दो बालिग अपनी मर्जी से साथ रह सकते हैं और परिवार उनकी निजी जिंदगी में दखल नहीं दे सकता।
भारत का संविधान सबको आजादी से रहने देता है। दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में बड़ा फैसला सुनाया। यह फैसला लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़ा हुआ है। दो बालिग लोग अब साथ रह सकते हैं। कोर्ट ने उनकी सुरक्षा के कड़े निर्देश दिए।
दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला है किपरिवार अब उनकी निजी जिंदगी में दखल नहीं देगा। बालिग जोड़े अपनी मर्जी से साथ रह सकेंगे। जाति या धर्म के आधार पर रोकना गलत है। सामाजिक मान्यताओं के नाम पर परेशान करना गैरकानूनी है। यह फैसला नए दौर के रिश्तों को सुरक्षा देगा।
आइए जानतें हैं दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को...
जस्टिस सौरभ बनर्जी की बेंच (Bench of Justice Saurabh Banerjee) ने एक सुरक्षा याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने कहा कि बालिग होने के बाद किसी भी व्यक्ति को यह चुनने की पूरी आजादी है कि वह किसके साथ रहना चाहता है।
कोर्ट ने अपने आदेश में भारत के संविधान के दो जरूरी आर्टिकल को बताया
यह मामला साल 2024 से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे एक युवक और युवती से जुड़ा है। याचिकाकर्ता युवती ने अदालत को बताया कि वे दोनों बालिग हैं और अपनी मर्जी से साथ रह रहे हैं। उन्होंने बाकायदा 17 फरवरी 2026 को एक 'लिव-इन रिलेशनशिप अनुबंध' (Live-in Relationship Contract) भी किया है।
याचिका में आरोप लगाया गया कि युवती के पिता और रिश्तेदार इस रिश्ते के खिलाफ हैं। उन्हें जान से मारने की धमकियां दी जा रही थीं और अलग होने के लिए दबाव डाला जा रहा था। इन परिस्थितियों को देखते हुए, अदालत ने मामले की गंभीरता को समझा और जोड़े को तुरंत पुलिस सुरक्षा (Police Protection) मुहैया कराने का आदेश दिया।
सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि हालांकि लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी रूप से 'विवाह' (Marriage) का दर्जा प्राप्त नहीं है, लेकिन कई मायनों में यह विवाह के समान (Equivalent to Marriage) है।
न्यायमूर्ति बनर्जी ने कहा कि भारत में विवाह की सार्थकता तब है जब वह दो सहमति देने वाले व्यक्तियों के बीच हो। चाहे उनकी जाति, पंथ, रंग, धर्म या आस्था कुछ भी क्यों न हो, उनकी आपसी सहमति ही कानून की नजर में सबसे बड़ी है। इसी आधार पर, जोड़े को अपनी पसंद के साथी के साथ गरिमा के साथ जीने का अधिकार है।
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दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला है किपरिवार अब उनकी निजी जिंदगी में दखल नहीं देगा। बालिग जोड़े अपनी मर्जी से साथ रह सकेंगे। जाति या धर्म के आधार पर रोकना गलत है। सामाजिक मान्यताओं के नाम पर परेशान करना गैरकानूनी है। यह फैसला नए दौर के रिश्तों को सुरक्षा देगा।
आइए जानतें हैं दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को...
परिवार का हस्तक्षेप सही नहीं
आर्टिकल 19 और 21 का हवाला
- आर्टिकल 19 (Article 19): यह आर्टिकल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है।
- आर्टिकल 21 (Article 21): यह जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करता है।
क्या है पूरा मामला?
धमकियों और सुरक्षा का खतरा
लिव-इन रिलेशनशिप और भारतीय कानून भारत में लिव-इन रिलेशनशिप को 'घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005' (Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005) के तहत मान्यता प्राप्त है। यदि कोई जोड़ा लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहता है, तो महिला को भरण-पोषण (Maintenance) और सुरक्षा का कानूनी अधिकार मिलता है।
लिव-इन रिश्ता भी शादी जैसा
पसंद के साथी के साथ जीने है अधिकार
याचिकाकर्ताओं को पुलिस की सुरक्षा
- सुरक्षा का कवच: आप अपने इलाके के थानेदार (SHO) से मिलें। बीट कांस्टेबल से भी आप मदद मांग सकते हैं। पुलिस का फर्ज है कि वह आपको सुरक्षा दे। वे आपको पूरी सुरक्षा और सुरक्षा का भरोसा देंगे।
- तुरंत होगी कार्रवाई: अगर आपको कोई डराता या धमकाता है। या फिर कोई आपको नुकसान पहुँचाना चाहता है। तो ऐसी स्थिति में पुलिस तुरंत एक्शन लेगी। वे आपकी शिकायत पर बिना देरी किए कार्रवाई करेंगे।
- घर बदलने की जानकारी: अगर आप सुरक्षा के लिए घर बदल रहे हैं। तो इसकी जानकारी 3 दिन में पुलिस को दें। नए पते के बारे में पुलिस को बताना जरूरी है। इससे नई जगह पर भी आप सुरक्षित रह पाएंगे।
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