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Raipur.छत्तीसगढ़ के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारे गर्म हैं। इन दिनों नक्सल खात्मे की चर्चा जोरों पर है क्योंकि सरकार की डेडलाइन पास आ रही है। एक बार फिर अमित शाह इस डेडलाइन पर मुहर लगा चुके हैं। ऐसे में एक माननीय को पुलिस ने दौरे पर जाने से रोक दिया है।
एक गोपनीय चिट्ठी विधायक के पास आई जिसमें लिखा था कि नक्सल सूचना है इसलिए उस इलाके में न जाएं। यहां पर सवाल उठाया गया कि जब नक्सल लगभग खत्म हो गया तो फिर विधायक को दौरे से क्यों रोका गया।
वहीं कुछ अफसरों में ऐसी जादूगरी होती है कि उन पर कितने ही दाग हों लेकिन उनका कुछ बिगड़ता नहीं है। छत्तीसगढ़ में ऐसे अफसरों की भरमार है। छत्तीसगढ़ के राजनीतिक प्रशासनिक गलियारों की ऐसी ही अनसुनी खबरों के लिए पढ़िए द सूत्र का साप्ताहिक कॉलम सिंहासन छत्तीसी।
आतंक पर लाल-माननीय का सवाल
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छत्तीसगढ़ में इन दिनों नक्सल खात्मे की बहुत चर्चा है। हाल ही में प्रदेश दौरे पर आए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह फिर कह गए कि 31 मार्च तक नक्सल खत्म हो जाएगा। उन्होंने ये भी कहा कि जो बचे खुचे नक्सली हैं वे भी सरेंडर कर दें। यह तो अमित शाह की बात हो गई लेकिन माननीय क्यों लाल हुए ये बताते हैं।
माननीय को पुलिस की एक चिट्ठी मिली जिससे वे लाल हो गए। दरअसल, बस्तर संभाग के एक विधायक ने प्रोटोकॉल के तहत पुलिस को अपना कार्यक्रम भेजा जिसमें लोगों से मेल मुलाकात करना था। पुलिस ने गोपनीय चिट्ठी भेज दी कि आप जिस इलाके में जा रहे हैं वहां पर नक्सली की सूचना है इसलिए अपना कार्यक्रम स्थगित कर दें।
माननीय बोले कि सच क्या है, अगर अभी भी नक्सल गतिविधियां चल रही हैं तो ख़त्म क्या हो रहा है। इससे अच्छी तो हमारी सरकार थी जब विधायक बेरोकटोक दौरा तो कर पा रहे थे। मार्च में नक्सली जड़ से खत्म होने वाले हैं, ऐसा अमित शाह कहते हैं। विधायक दौरे पर नहीं जा सकते, ऐसा भाजपा की सरकार कहती है।
तो दाग अच्छे हैं
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यदि दाग लगने के बाद भी कुछ न बिगड़े तो दाग अच्छे हैं। ऐसा ही कुछ छत्तीसगढ़ के अफसरों के साथ हो रहा है। पंचायत विभाग ऐसे ही दो दागी अफसर हैं जिनकी पांचों उंगलियां घी में और सिर कढ़ाई में हैं। जिन अफसरों पर ईओडब्ल्यू और लोक आयोग में भ्रष्टाचार के गंभीर मामले दर्ज हैं, उन्हें सजा मिलने के बजाय सरकार लगातार प्रमोशन का इनाम बांट रही है।
घोटालों में फंसे दो अफसरों पर जांच की तलवार लटक रही है लेकिन सिस्टम की ऐसी कृपा है कि दोनों बड़े पदों पर बैठकर मलाई काट रहे हैं। दोनों अफसरों को इस जांच के दौरान ही दो-दो बार पदोन्नति दे दी गई। इनकी शिकायत पीएमओ तक पहुंच गई है लेकिन इनका बाल भी बांका नहीं हुआ।
इन इंजीनियरों ने सड़क निर्माण में ऐसी इंजीनियरिंग की है कि जेब नोटों से भर गई। ईओडब्ल्यू इनके खिलाफ जांच की अनुमति मांग चुकी है लेकिन यह फाइल तो अभी घूम ही रही है।
शादी में फूफाजी बने नेताजी
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शादी हो और फूफाजी का जिक्र न हो ऐसा तो आमतौर पर होता नहीं है। और बात जब सामूहिक विवाह की हो तो वहां भी कोई न कोई फूफाजी बन ही जाता है। मुख्यमंत्री सामूहिक कन्या विवाह योजना के तहत कई जोड़ो का विवाह कार्यक्रम हुआ। सामूहिक विवाह की तैयारियों के लिए स्थानीय प्रशासन और महिला बाल विकास विभाग ने दिन दोगुनी रात चौगुनी कर दी थी।
वहीं, विवाह समारोह में उस समय हलचल मच गई जब नेताजी फूफाजी के रोल में आ गए। बीजेपी के कुछ पदाधिकारी वैवाहिक कार्यक्रम में नाराज फूफा की तर्ज पर नाराज हो गए, और मंच में जाने के बजाए नीचे लगे दर्शक दीर्घा की कुर्सियों में बैठकर विरोध जताने लगे। नेताजी की नाराजगी का कारण यह था कि आमंत्रण पत्र में उनका नाम गायब था। जैसे तैसे अधिकारियों ने मान-मनौव्वल की तब जाकर फूफाजी का गुस्सा ठंडा हुआ।
कहीं आग में दाग तो नहीं जल गए
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आबकारी दफ्तर में लगी आग कहीं दाग जलाने के लिए तो नहीं लगाई गई। यह सवाल इन दिनों छत्तीसगढ़ के राजनीतिक गलियारे में गूंज रहा है। प्रदेश में हुए शराब घोटाले में कई बड़े नाम सामने आ चुके हैं और कुछ आने की बात जांच एजेंसी कर रही है। ऐसे समय में जब महत्वपूर्ण ऑडिट की प्रक्रिया शुरू होने वाली थी, आगजनी की घटना का सामने आना संदिग्ध गतिविधियों से जोड़कर देखा जा रहा है।
कई विभागीय सूत्र दावा कर रहे हैं, कि आबकारी भवन में बिजली-पानी और CCTV व्यवस्था पर सालाना लाखों रूपये खर्च किए जाते हैं, यही नहीं जिस कक्ष में आगजनी की घटना सामने आई है, उस स्थान पर गुणवत्तापूर्ण विद्युत सामग्री का उपयोग किया गया था।
इसका हर माह मेंटेनेंस भी किया जाता है। तो फिर शॉर्ट सर्किट कैसे हो सकता है। इस रहस्यमय घटना की वजह को लेकर प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारे में भी जमकर माथापच्ची हो रही है। शराब घोटाले से जुड़े एवं अन्य दस्तावेजों को आग के हवाले होने का मामला काफी गंभीर बताया जा रहा है।
चर्चा यह भी है, कि कई जरूरी दस्तावेजों के स्वाहा होने से कई लोगों ने राहत की सांस ली है। इस घटना में हुए नुकसान का कोई आधिकारिक ब्यौरा भी आबकारी अमले ने पेश नहीं किया है। हालांकि सरकार ने कह दिया है कि कोई दस्तावेज नहीं जले हैं, बस कंप्यूटर को ही नुकसान हुआ है।
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आखिर वह कौन सी चिट्ठी आई है, जिसने एक मंत्री को मुश्किल में डाल दिया है और क्यों पुलिस कमिश्नरी की चमक फीकी पड़ गई?
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