1858 में रायपुर छावनी में फूटा विद्रोह, अफसर को मारकर हनुमान सिंह ने लिया था बदला

VINAY VERMA | Aug 15, 2026, 09:01 IST
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हनुमान सिंह
हनुमान सिंह

वीर नारायण सिंह को फांसी दिए जाने के कुछ ही हफ्तों बाद रायपुर की सैनिक छावनी में अचानक विद्रोह भड़क उठा। हनुमान सिंह ने 17 साथियों के साथ अंग्रेजी अफसर पर हमला कर दिया। आखिर उस रात रायपुर की छावनी में ऐसा क्या हुआ था, जिसने अंग्रेजी हुकूमत को हिला दिया?

1857 की क्रांति की आग जब देश के अलग-अलग हिस्सों में धधक रही थी, तब छत्तीसगढ़ भी इससे अछूता नहीं था। यहां विद्रोह की एक ऐसी कहानी लिखी गई, जिसमें फांसी का बदला लेने के लिए सैनिकों ने अंग्रेजी हुकूमत को सीधी चुनौती दे दी।

10 दिसंबर 1857, रायपुर जेल के सामने सोनाखान के जमींदार और क्रांतिकारी वीर नारायण सिंह को सार्वजनिक रूप से फांसी दी गई। उनका अपराध था अकाल के दौरान भूख से तड़प रही जनता के लिए व्यापारी के गोदाम से अनाज निकलवाना। उन्होंने इसे लूट नहीं, जनता की जान बचाने का रास्ता माना था। अंग्रेजों ने इसे बगावत माना और उन्हें मौत की सजा दे दी।

आंखों के सामने हुआ बलिदान

वीर नारायण सिंह की फांसी सिर्फ एक क्रांतिकारी की मौत नहीं थी। वहां मौजूद सैनिकों के भीतर भी गुस्सा सुलग उठा। सैनिक हनुमान सिंह राजपूत ने अपने साथियों के साथ उसी समय अंग्रेजों से बदला लेने का संकल्प लिया।

हनुमान सिंह ने तय कर लिया था कि वीर नारायण सिंह की मौत का हिसाब अंग्रेजों से लिया जाएगा। यही संकल्प कुछ ही हफ्तों बाद रायपुर की सैनिक छावनी में विद्रोह का कारण बना।

रात में छावनी बनी रणभूमि

18 जनवरी 1858 की रात रायपुर की सैन्य छावनी में अचानक विद्रोह भड़क उठा। वर्तमान का पुलिस परेड ग्राउंड उस समय अंग्रेजी सेना की गतिविधियों का अहम केंद्र था। हनुमान सिंह अपने 17 साथियों के साथ अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ उठ खड़े हुए।

हाथ में तलवार लेकर हनुमान सिंह सीधे अंग्रेज अधिकारी सिडवेल के कक्ष तक पहुंचे। हमला इतना घातक था कि अधिकारी की मौके पर ही मौत हो गई। यह कोई छिपा हुआ हमला नहीं था। हनुमान सिंह ने अंग्रेजों को खुली चुनौती दी और छावनी में विद्रोह की आग फैला दी।

छह घंटे तक चली बगावत

रायपुर की छावनी में करीब छह घंटे तक संघर्ष चला। अंग्रेजी अफसरों के लिए यह अचानक आया ऐसा हमला था, जिसने उनकी नींद उड़ा दी। विद्रोहियों को पकड़ने के लिए अंग्रेजों ने घेराबंदी शुरू की।

हनुमान सिंह अंग्रेजों की पकड़ में नहीं आए। वह वहां से निकल गए, लेकिन उनके 17 साथी अंग्रेजों के कब्जे में आ गए। अब अंग्रेजी हुकूमत ने बदले की कार्रवाई शुरू कर दी।

17 साथियों को फांसी

22 जनवरी 1858 को अंग्रेजों ने हनुमान सिंह के 17 साथियों को फांसी दे दी। इन मौतों के पीछे अंग्रेजों का मकसद सिर्फ विद्रोह दबाना नहीं था। वे रायपुर में ऐसा डर पैदा करना चाहते थे कि कोई दूसरा सैनिक उनके खिलाफ हथियार उठाने की हिम्मत न करे। लेकिन हुआ इसका उलटा। शहादत की ये कहानियां जनता के बीच पहुंचीं और अंग्रेजी राज के खिलाफ गुस्सा और गहरा हुआ।

मंगल पांडेय जैसी हुंकार

1857 की क्रांति में मंगल पांडेय का नाम सैनिक विद्रोह की पहली बड़ी हुंकार के तौर पर याद किया जाता है। छत्तीसगढ़ में हनुमान सिंह ने इसी तेवर के साथ अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी। वीर नारायण सिंह की फांसी ने जिस आग को हवा दी, उसे हनुमान सिंह ने तलवार की धार दे दी। उन्होंने अंग्रेज अफसर पर हमला कर यह संदेश साफ कर दिया कि छत्तीसगढ़ की धरती भी गुलामी स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।

Martyr
Martyr


शहादत बनी आंदोलन की ताकत

रायपुर का जयस्तंभ चौक स्वतंत्रता के बाद अस्तित्व में आया, लेकिन छत्तीसगढ़ की आजादी की लड़ाई में सार्वजनिक रूप से दी गई फांसियों की स्मृति उससे बहुत पहले की है। 1858 में फांसी पर चढ़ाए गए 17 सैनिकों की शहादत ने आने वाली पीढ़ियों को लड़ने की प्रेरणा दी।

1857-58 का यह विद्रोह भले ही अंग्रेजों को तत्काल सत्ता से हटा नहीं सका, लेकिन उसने एक बात साबित कर दी थी—छत्तीसगढ़ की धरती पर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ तलवार उठ चुकी थी। वीर नारायण सिंह की फांसी से भड़की चिंगारी हनुमान सिंह की तलवार तक पहुंची और यही चिंगारी आगे चलकर आजादी की लंबी लड़ाई का हिस्सा बनी।

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