बीजेपी नेता आलोक के अवैध लोक पर आरोपों का घेरा,तहसीलदार के साथ मिलकर किया खरीद फरोख्त का खेला

Arun Tiwari | Aug 29, 2025, 17:17 IST
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रायपुर : बीजेपी नेता आलोक दुबे के 117 एकड़ जमीन पर कब्जे में कई पेंच हैं। रेवेन्यू बोर्ड के कोर्ट में लगी रिव्यू पिटीशन में इस जमीन को लेकर कई खुलासे किए गए हैं।

रायपुर : बीजेपी नेता आलोक दुबे के 117 एकड़ जमीन पर कब्जे में कई पेंच हैं। रेवेन्यू बोर्ड के कोर्ट में लगी रिव्यू पिटीशन में इस जमीन को लेकर कई खुलासे किए गए हैं। याचिकाकर्ता ने तो यहां तक कहा है कि तहसीलदार के साथ मिलकर बीजेपी नेता ने सरकारी जमीन में प्लाट और फ्लैट बेचे हैं।

यह ज़मीन सरकारी घोषित होने के बाद भी यहां पर निर्माण कार्य चलता रहा। इसी याचिका पर राजस्व कोर्ट ने इस 117 एकड़ जमीन को राजस्व लैंड घोषित किया। अभी तक हमने आपको कानून पर भारी रसूख के 2 भाग दिखाए हैं। आइये अब आपको दिखाते हैं इस सीरीज का तीसरा भाग।

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300 करोड़ का ज़मीन घोटाला :

यह अंबिकापुर में ज़मीन घोटाले का बड़ा मामला है। राजस्व मंडल कोर्ट में दाखिल की गई रिव्यू पिटीशन में कहा गया कि अधिकारियों की मिलीभगत से सरकारी और आदिवासी परिवारों की लगभग 300 करोड़ रुपए मूल्य की भूमि को अवैध रूप से गैर-आदिवासी व्यक्तियों के नाम दर्ज कर दिया गया। यह विवाद करीब 117 एकड़ भूमि से जुड़ा हुआ है।

दस्तावेज़ों से यह स्पष्ट है कि राजस्व अभिलेखों में हेराफेरी कर इस जमीन पर कब्ज़ा किया गया। राजस्व मंडल बिलासपुर ने भी मामले में गंभीर अनियमितताओं की पुष्टि की है।आलोक दुबे और उनके परिजनों के पास इस जमीन के मालिकाना हक का कोई दस्तावेज नहीं है। जो दस्तावेज दिखाए जाने का दावा किया जा रहा है उनका कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है। कब्जाधारी इस जमीन को 1957-58 से अपने पास होना बता रहे हैं। कब्जाधारियों ने जो खसरा नंबर 423, 424/1, 425/1, 427,430 बताया वो फर्जी है।

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ऐसे हुआ घोटाला :

याचिका के अनुसार वर्ष 1957-58 से ही भूमि के अभिलेखों में हेराफेरी शुरू हो गई थी। उस समय पटवारी, आरआई और तहसील स्तर के अधिकारियों ने कूट रचना कर खसरा नंबर 423, 427, 424, 425 की भूमि को निजी व्यक्तियों के नाम दर्ज कर दिया। यह ज़मीन सरकारी रिकॉर्ड में आदिवासियों की थी, लेकिन अधिकारियों की मिलीभगत से कागज़ात बदलकर उसे बेच दिया गया। इसका वर्तमान मूल्य लगभग 300 करोड़ रुपए आँका गया है। यह भूमि विवाद 1960 के दशक से चल रहा है विवादित ज़मीन की खरीदी-बिक्री पर रोक लगाई गई है।

अनुसूचित जनजाति अधिनियम का उल्लंघन कर आदिवासी ज़मीन गैर-जनजातीय लोगों के नाम दर्ज की गई। इस रोक के बाद भी इस जमीन पर निर्माण कार्य और खरीद फरोख्त चलती रही। याचिकाकर्ता अनिल श्रीवास्तव का कहना है कि आलोक दुबे ने तहसीलदार के साथ मिलकर ज़मीन का पूरा खेल किया। यहां पर प्लॉट और फ्लैट बनाकर लोगों को बेचे गए। पहले ये फॉरेस्ट लैंड थी जहां आदिवासी रहते थे। इसके बाद सरकार ने इसे रेवेन्यू लैंड घोषित कर दिया। इसके बाद भी यहां कब्जा जमा रहा। एक बार फिर रेवेन्यू मंडल कोर्ट ने इसे रेवेन्यु लैंड घोषित कर दिया गया।

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यह सरकारी जमीन रैवेन्यू लैंड :

इस वन भूमि को 1972 में रेवेन्यू लैंड घोषित किया गया। उसके बाद भी दुबे परिवार का इस पर कब्ज़ा बना रहा। मामला जब अपर कलेक्टर की कोर्ट में पहुंचा तो रिव्यू याचिका को खारिज कर दुबे परिवार के पक्ष में ही फैसला सुना दिया गया। 2014 में यह मामला राजस्व मंडल कोर्ट में पहुंचा। इस कोर्ट ने रिव्यू पिटीशन को स्वीकार करते हुए अपर कलेक्टर कोर्ट के फैसले को खारिज कर दिया और इस पूरी 117 एकड़ जमीन को राजस्व भूमि घोषित कर दिया। इसके बाद भी आलोक दुबे का यह अवैध लोक बरकरार है। अब तक दोषियों पर कोई कार्रवाई नहीं हो पाई है।

अंबिकापुर जमीन घोटाला | CG News | ambikapur

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