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Nes in short
- 23 सितंबर 2009 को कोरबा में बालको चिमनी कांड हुआ था।
- बालको चिमनी में दफन 41 जिंदगियां हो गई थीं।
- कोरबा की स्पेशल कोर्ट में इस मामले की सुनवाई चल रही है।
- आदेश के बाद भी घटना के जिम्मेदार चीनी अधिकारी नहीं आए।
- तर्क दिया कि भारत के लिए सीधी फ्लाइट नहीं, अनुमति नहीं मिली।
News In detail
​23 सितंबर 2009 की वह मनहूस शाम आज भी छत्तीसगढ़ के पावर हब कोरबा की हवाओं में चीखें बनकर तैरती है। निर्माणाधीन चिमनी का मलबा जब शांत हुआ, तो नीचे दब चुकी थीं 41 जिंदगियां। आज 16 साल बीत जाने के बाद भी उन मजदूरों के परिवारों की आंखों में आंसू और हाथ में सिर्फ कोर्ट की तारीखें हैं।
विडंबना देखिए जिस हादसे ने 41 घरों के चिराग बुझा दिए उसके मुख्य आरोपी चीनी अधिकारी अब भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने फ्लाइट नहीं मिलने जैसा बचकाना बहाना बना रहे हैं।
​अदालत में 'ड्रैगन' की चाल: नहीं मिली सीधी उड़ान?
कोरबा की विशेष अदालत में इस मामले की सुनवाई चल रही है। आरोपी चीनी कंपनी सेप्को (SEPCO) के तीन बड़े अधिकारियों वू चुनान, लियु गैक्सन और वॉन वेगिंग कोर्ट की सुनवाई में गैर हाजिर रहे। कोर्ट के कड़े आदेश के बावजूद ये तीनों आरोपी व्यक्तिगत रूप से पेश नहीं हुए।
बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि चीन से भारत के लिए सीधी उड़ान सेवा उपलब्ध नहीं है। इन्हें भारत आने की अनुमति नहीं मिल पा रही है। इसलिए आरोपी उपस्थित होने में असमर्थ हैं। यह दलील न केवल हास्यास्पद लगती है, बल्कि उन 41 परिवारों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसी है, जो डेढ़ दशक से सजा का इंतजार कर रहे हैं।
​खुलासा: मौत की वह मीनार ही 'अवैध' थी
​इस मामले में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब नगर एवं ग्राम निवेश विभाग (टीएंडसीपी) के अधिकारी जगदीश चंद्र निदारिया ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए गवाही दी। उनकी गवाही ने यह साबित कर दिया कि 41 मजदूरों की मौत महज एक हादसा नहीं, बल्कि एक सुनियोजित लापरवाही थी। ​
बिना अनुमति का निर्माण
जिस जमीन पर 1200 मेगावाट की परियोजना के तहत चिमनी बनाई जा रही थी, उसके लिए कभी कोई एनओसी (अनापत्ति प्रमाणपत्र) जारी ही नहीं किया गया था।
नियमों की उड़ी धज्जियां
चिमनी का निर्माण कोरबा विकास योजना के प्रावधानों के विपरीत था। विभाग से किसी भी प्रकार की विकास अनुमति नहीं ली गई थी। जिस जमीन पर इतनी विशालकाय संरचना खड़ी कर दी गई, उसके मालिकाना हक के दस्तावेज तक स्पष्ट नहीं थे।
यह गवाही बालको प्रबंधन चीनी कंपनी सेप्को और पेटी ठेकेदार जीडीसीएल (GDCL) के उस गठजोड़ को बेनकाब करती है, जिसने मुनाफे के चक्कर में सुरक्षा मानकों और कानूनी प्रक्रियाओं को रद्दी की टोकरी में डाल दिया था।
23 सितंबर 2009 की वो काली शाम
बालकोनगर स्थित संयंत्र परिसर में उस दिन बारिश हो रही थी। करीब 240 मीटर ऊंची प्रस्तावित चिमनी का काम चल रहा था। शाम के वक्त अचानक एक गड़गड़ाहट हुई और देखते ही देखते कंक्रीट का वह ढांचा ताश के पत्तों की तरह ढह गया। मलबे के नीचे दबे मजदूरों को निकालने में कई दिन लग गए। मरने वाले अधिकांश मजदूर बिहार के सारण जिले के थे जो रोजगार के लिए छत्तीसगढ़ आए थे लेकिन वापस लौटे तो कफन में लिपटे हुए।
पुलिस ने अपराध क्रमांक 377/2009 दर्ज कर चीनी नागरिकों को गिरफ्तार तो किया। बाद में उन्हें जमानत मिल गई। तब से लेकर आज तक यह केस फाइलों और दलीलों के बीच झूल रहा है।
​सिस्टम पर सवाल: कब थमेगा तारीखों का सिलसिला?
बालको चिमनी कांड केवल एक तकनीकी विफलता नहीं थी बल्कि यह प्रशासनिक भ्रष्टाचार और कॉर्पोरेट लापरवाही का जीता-जागता स्मारक है।
​अगर अनुमति नहीं थी, तो प्रशासन ने निर्माण क्यों नहीं रुकवाया?
​क्या 41 मजदूरों की जान की कीमत इतनी कम है कि आरोपी 16 साल तक अनुमति और फ्लाइट का बहाना बनाकर बचते रहें? ​क्या भारत और चीन के कूटनीतिक संबंधों के बीच इन अपराधियों को वापस लाने की प्रक्रिया सुस्त पड़ गई है?
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