सरकार समय पर पेमेंट नहीं करती, इसलिए महंगा पड़ा गुड़ खरीदना

VINAY VERMA | Aug 19, 2026, 19:23 IST
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गुड़ खरीदी विवाद
गुड़ खरीदी विवाद

बस्तर की मधुर गुड़ योजना में महंगी सरकारी खरीदी को लेकर सवाल उठ रहे हैं। खाद्य विभाग करीब 18 हजार टन गुड़ 65 रुपए किलो की दर से खरीदने की तैयारी में है, जबकि बाजार भाव करीब 50 रुपए बताया जा रहा है।

बस्तर में लोगों को एनीमिया से बचाने के लिए चल रही मधुर गुड़ योजना अब सवालों में है। खाद्य विभाग 50 रुपए किलो वाला गुड़ करीब 65 रुपए किलो में खरीदने की तैयारी में है। टैक्स जोड़ें तो कीमत करीब 69 रुपए पहुंच जाएगी। 18 हजार टन की खरीदी में सरकार पर करीब 30 से 35 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।

बस्तर में एनीमिया दूर करने के नाम पर गुड़ खरीदी का खेल चल रहा है। खाद्य विभाग निजी कंपनियों को बाजार भाव से कहीं ज्यादा दाम चुका रहा है। चौंकाने वाली बात यह है कि मंत्री इस महंगी खरीदी को सरकार की मजबूरी बता रहे हैं। खाद्य मंत्री दयाल दास बघेल का तर्क है कि सरकार ठेकेदारों को 7-8 महीने बाद भुगतान करती है। इसलिए बाजार से महंगे दाम पर गुड़ खरीदना पड़ रहा है। यानी सरकारी भुगतान में देरी का बोझ भी जनता की जेब पर डाला जा रहा है।

बस्तर संभाग में चावल, शक्कर और नमक के साथ गुड़ भी बांटा जाता है। इसकी खरीदी नागरिक आपूर्ति निगम के जरिए होती है। विभाग गुड़ 65 रुपए किलो में खरीद रहा है, जबकि छत्तीसगढ़ के बाजार में यही गुड़ खुदरा में अधिकतम 50 रुपए किलो तक मिल रहा है।

मंत्री का तर्क, सरकार की प्रक्रिया पर सवाल

महंगे गुड़ पर खाद्य मंत्री दयाल दास बघेल का तर्क और भी चौंकाने वाला है। उनका कहना है कि बाजार में 50 रुपए किलो का भाव नकद भुगतान पर है। सरकार ठेकेदारों को 7 से 8 महीने बाद भुगतान करती है। इसलिए ज्यादा कीमत में खरीदी करनी पड़ती है। ऊपर से गुड़ बस्तर तक पहुंचाना है।

यानी सरकारी भुगतान में देरी को महंगी खरीदी का आधार बनाया जा रहा है। सवाल यही है कि अगर सरकार समय पर भुगतान नहीं कर सकती तो इसका बोझ जनता के खजाने पर क्यों डाला जाए? मंत्री का यह तर्क गड़बड़ी पर पर्दा डालने से ज्यादा सरकारी खरीद की पूरी प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े करता है।

बाजार में 50, खरीद 65 रुपए

नागरिक आपूर्ति निगम यानी नान बस्तर संभाग के लिए करीब 18 हजार टन गुड़ खरीदने वाला है। बाजार में थोक भाव करीब 50 रुपए किलो बताया जा रहा है। इसके मुकाबले नान 65 रुपए की दर से खरीदी करेगा। टैक्स के बाद यह कीमत करीब 69 रुपए तक जा सकती है।

पिछले साल नान ने 21 हजार टन गुड़ 54.41 रुपए किलो की दर से खरीदा था। इस बार कीमत सीधे 65 रुपए तक पहुंच गई। यानी खरीद कम होने के बावजूद भाव बढ़ गया।

टेंडर की शर्तें, खेल यहीं से शुरू?

महंगी खरीदी के पीछे टेंडर की शर्तों पर भी सवाल उठ रहे हैं। सप्लायर के पास पिछले छह वित्तीय वर्षों में किसी एक साल में सरकारी विभाग या उपक्रम को कम से कम 3 हजार टन गुड़ सप्लाई करने का अनुभव जरूरी है। इसके साथ पिछले तीन साल में किसी एक साल का 40 करोड़ रुपए का टर्नओवर भी चाहिए।

ऐसी शर्तों से छोटे कारोबारी तो बाहर हो ही जाते हैं। सवाल यह भी है कि जब कुछ चुनिंदा कंपनियां ही पात्र होंगी तो टेंडर में प्रतिस्पर्धा कैसे बढ़ेगी?

छह साल से वही कंपनियां

आरोप है कि करीब छह साल से कुछ चुनिंदा फर्में ही गुड़ सप्लाई कर रही हैं। इस बार भी वित्तीय वर्ष 2026-27 में दो बार टेंडर निकला। पहली बार केवल दो फर्मों ने आवेदन किया। यानी हजारों टन की सरकारी खरीदी के लिए मैदान में गिनती की कंपनियां। ऐसे में रेट कम होने के बजाय ज्यादा होना अपने आप में बड़ा सवाल है।

सात मिनट में तीन टेंडर

इस बार टेंडर प्रक्रिया में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है। चार फर्में बोली प्रक्रिया तक पहुंचीं और तीन क्वालिफाई हुईं। तीनों ने एक ही दिन महज सात मिनट के भीतर ऑनलाइन टेंडर अपलोड किए।

जीपी एग्रोटेक और महात्मा गांधी साल्ट मंडी ने अपने टेंडर में एक ही निर्माता कंपनी ‘फार्म्स प्राइड’ का नाम दिया। यानी सप्लायर अलग दिख रहे हैं, लेकिन उत्पाद का OEM एक ही है। इससे पूरी प्रतिस्पर्धा पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

स्टार्टअप और MSME भी बाहर

टेंडर में मधुर गुड़ योजना को स्वास्थ्य से जुड़ी संवेदनशील योजना बताया गया है। इसी आधार पर स्टार्टअप और सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों को अनुभव और टर्नओवर की शर्तों में छूट नहीं दी गई। यहां भी सरकार की नीति कटघरे में है। एक तरफ स्टार्टअप और MSME को बढ़ावा देने की बात होती है। दूसरी तरफ सरकारी टेंडर की शर्तें उन्हें मैदान में उतरने से पहले ही बाहर कर देती हैं।

सचिव ने माना, शर्तें गलत हों तो टेंडर रद्द

खाद्य विभाग की सचिव रीना बाबा साहब कंगाले ने साफ कहा है कि खुले टेंडर में ऐसी शर्तें नहीं होनी चाहिए, जिनसे दूसरे सप्लायर भाग ही न ले सकें। उन्होंने कहा कि मामले को दिखवाया जाएगा और जरूरत पड़ी तो टेंडर निरस्त किया जाएगा। यह बयान मंत्री के तर्क से बिल्कुल अलग तस्वीर दिखाता है। विभाग की सचिव जहां पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा की बात कर रही हैं, वहीं मंत्री भुगतान में देरी को महंगे गुड़ की वजह बता रहे हैं।

निजी फर्मों को ही क्यों फायदा?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि गुड़ खरीदने के लिए निजी कंपनियों पर ही निर्भरता क्यों? छत्तीसगढ़ में कई सहकारी संस्थाएं गुड़ बनाती हैं। सरकार उनसे सीधे खरीदी कर सकती थी। इससे कीमत कम हो सकती थी और स्थानीय सहकारी संस्थाओं को बाजार भी मिलता।

इसके अलावा तीन केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों को खाद्य सामग्री सप्लाई का अनुभव है। इनमें से एक PSU ने छत्तीसगढ़ सरकार और नान के MD को पत्र लिखकर 55 रुपए किलो में गुड़ देने का प्रस्ताव भी दिया है।

फिर सवाल सीधा है, जब 55 रुपए में सरकारी PSU गुड़ देने को तैयार है और बाजार में करीब 50 रुपए में उपलब्ध है, तो 65 रुपए की खरीदी क्यों? अगर वजह सिर्फ 7-8 महीने का भुगतान है तो सरकारी प्रक्रिया को सुधारने के बजाय महंगी खरीदी का रास्ता क्यों चुना गया?

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