इस मगरमच्छ की मौत पर रोया पूरा गांव, अब देश के बच्चे पढ़ेंगे गंगाराम की कहानी
Harrison Masih | Jul 24, 2026, 21:12 IST
बेमेतरा का मगरमच्छ गंगाराम 2026
छत्तीसगढ़ के बेमेतरा के मशहूर मगरमच्छ गंगाराम की अनोखी कहानी अब NCERT की स्कूली किताबों में पढ़ाई जाएगी। 30 वर्षों तक ग्रामीणों के साथ बिना किसी हमले के रहने वाले गंगाराम को दुर्लभ माना जाता है।
छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के बावा मोहतरा गांव में मगरमच्छ गंगाराम और ग्रामीणों की दोस्ती की कहानी अब स्कूली बच्चे पढ़ेंगे। NCERT (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद) ने इसे नए पाठ्यक्रम में शामिल किया है। गंगाराम करीब तीन दशक तक गांव के तालाब में ग्रामीणों और मवेशियों के साथ बिना किसी हमले के रहा। उसकी मौत साल 2019 में हुई थी। अब उसकी कहानी देश भर के बच्चों को वन्यजीव संरक्षण का पाठ पढ़ाएगी।
बेमेतरा जिले का छोटा सा गांव बावा मोहतरा दशकों से इंसान और मगरमच्छ के अनोखे रिश्ते का गवाह रहा है। गांव के मुख्य तालाब में रहने वाला गंगाराम कोई साधारण मगरमच्छ नहीं था।
वह पूरे गांव का एक सम्मानित सदस्य बन चुका था। उसकी कहानी अब सिर्फ गांव तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पूरे देश के बच्चों तक पहुंचेगी।
गांव के लोग रोजाना उसी तालाब में नहाते थे और पीने का पानी भी वहीं से भरते थे। वे वहीं कपड़े और ट्रैक्टर भी धोते थे। मवेशियों को पानी पिलाने के लिए भी लोग उसी तालाब में आते थे।
बच्चे घंटों गंगाराम के आसपास तालाब में तैरते रहते थे। इसके बावजूद गंगाराम ने कभी किसी ग्रामीण या मवेशी को नुकसान पहुंचाने की कोशिश नहीं की। ग्रामीण उसे अपने हाथों से खाना भी खिलाया करते थे।
![मगरमच्छ गंगाराम]()
आमतौर पर मगरमच्छों को बेहद हिंसक और आक्रामक माना जाता है। वे अपने इलाके में किसी भी हलचल को शिकार समझकर हमला कर देते हैं।
लेकिन वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक गंगाराम के शांत व्यवहार के पीछे अनुकूलन और नियमित भोजन की उपलब्धता सबसे बड़ी वजह थी। जब कोई जंगली जानवर बचपन से इंसानों की मौजूदगी देखता है और उसे कोई खतरा महसूस नहीं होता, तो उसकी आक्रामकता धीरे-धीरे कम हो जाती है।
ग्रामीणों का लगातार सम्मान और नियमित भोजन ने गंगाराम में सुरक्षा का भाव भर दिया। इसी आपसी विश्वास ने उसे एक शांत जीव बना दिया।
गंगाराम की प्राकृतिक मौत साल 2019 में हुई थी। कहा जाता है कि उसकी उम्र काफी अधिक थी, हालांकि इसे लेकर अलग-अलग अनुमान बताए जाते हैं।
उसकी मौत की खबर मिलते ही बावा मोहतरा गांव में मातम छा गया। उस दिन गांव के कई घरों में चूल्हा तक नहीं जला। पांच सौ से ज्यादा ग्रामीणों ने रोते हुए उसकी शवयात्रा निकाली। पूरे रीति-रिवाज और धार्मिक सम्मान के साथ उसका अंतिम संस्कार किया गया।
ग्रामीणों ने गंगाराम की स्मृति को हमेशा के लिए जिंदा रखने का फैसला किया। उन्होंने तालाब के किनारे ही उसका एक मंदिर बनवाया, जहां उसकी प्रतिमा स्थापित है।
आज भी गांव के लोग रोजाना उस मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं। बाहर से आने वाले पर्यटकों को भी गांव वाले गर्व से गंगाराम की गाथा सुनाते हैं।
स्कूली किताबों में गंगाराम की कहानी शामिल करने का मुख्य मकसद नई पीढ़ी में वन्यजीवों के प्रति संवेदनशीलता जगाना है। इसके जरिए सह-अस्तित्व की भावना भी सिखाई जाएगी।
आमतौर पर वन्यजीवों और इंसानों के बीच संघर्ष की खबरें ही ज्यादा सामने आती हैं। बावा मोहतरा का यह उदाहरण सिखाता है कि प्रकृति और जीवों के आवास का सम्मान करने पर बिना हिंसा के भी साथ रहा जा सकता है।
हालांकि वन विभाग और विशेषज्ञ यह सावधानी बरतने की सलाह भी देते हैं कि गंगाराम का मामला बेहद दुर्लभ और अपवाद स्वरूप उदाहरण है। सामान्य परिस्थितियों में जंगली जानवरों से सुरक्षित दूरी बनाए रखना ही समझदारी है।
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बेमेतरा जिले का छोटा सा गांव बावा मोहतरा दशकों से इंसान और मगरमच्छ के अनोखे रिश्ते का गवाह रहा है। गांव के मुख्य तालाब में रहने वाला गंगाराम कोई साधारण मगरमच्छ नहीं था।
वह पूरे गांव का एक सम्मानित सदस्य बन चुका था। उसकी कहानी अब सिर्फ गांव तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पूरे देश के बच्चों तक पहुंचेगी।
तालाब में साथ नहाते थे इंसान
बच्चे घंटों गंगाराम के आसपास तालाब में तैरते रहते थे। इसके बावजूद गंगाराम ने कभी किसी ग्रामीण या मवेशी को नुकसान पहुंचाने की कोशिश नहीं की। ग्रामीण उसे अपने हाथों से खाना भी खिलाया करते थे।
मगरमच्छ गंगाराम
आखिर इतना शांत क्यों था गंगाराम?
लेकिन वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक गंगाराम के शांत व्यवहार के पीछे अनुकूलन और नियमित भोजन की उपलब्धता सबसे बड़ी वजह थी। जब कोई जंगली जानवर बचपन से इंसानों की मौजूदगी देखता है और उसे कोई खतरा महसूस नहीं होता, तो उसकी आक्रामकता धीरे-धीरे कम हो जाती है।
ग्रामीणों का लगातार सम्मान और नियमित भोजन ने गंगाराम में सुरक्षा का भाव भर दिया। इसी आपसी विश्वास ने उसे एक शांत जीव बना दिया।
मौत पर पूरे गांव में छाया मातम
उसकी मौत की खबर मिलते ही बावा मोहतरा गांव में मातम छा गया। उस दिन गांव के कई घरों में चूल्हा तक नहीं जला। पांच सौ से ज्यादा ग्रामीणों ने रोते हुए उसकी शवयात्रा निकाली। पूरे रीति-रिवाज और धार्मिक सम्मान के साथ उसका अंतिम संस्कार किया गया।
तालाब किनारे बना है गंगाराम का मंदिर
मगरमच्छ गंगाराम
आज भी गांव के लोग रोजाना उस मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं। बाहर से आने वाले पर्यटकों को भी गांव वाले गर्व से गंगाराम की गाथा सुनाते हैं।
पाठ्यक्रम में शामिल करने का मकसद
आमतौर पर वन्यजीवों और इंसानों के बीच संघर्ष की खबरें ही ज्यादा सामने आती हैं। बावा मोहतरा का यह उदाहरण सिखाता है कि प्रकृति और जीवों के आवास का सम्मान करने पर बिना हिंसा के भी साथ रहा जा सकता है।
हालांकि वन विभाग और विशेषज्ञ यह सावधानी बरतने की सलाह भी देते हैं कि गंगाराम का मामला बेहद दुर्लभ और अपवाद स्वरूप उदाहरण है। सामान्य परिस्थितियों में जंगली जानवरों से सुरक्षित दूरी बनाए रखना ही समझदारी है।
FAQ
- गंगाराम मगरमच्छ कौन था?
गंगाराम छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के बावा मोहतरा गांव के तालाब में रहने वाला एक मगरमच्छ था। वह करीब 30 वर्षों तक ग्रामीणों और मवेशियों के बीच बिना किसी हमले के रहा और गांव में सम्मानित सदस्य की तरह माना जाता था। - NCERT ने गंगाराम की कहानी पाठ्यक्रम में क्यों शामिल की?
NCERT ने गंगाराम की कहानी नई पीढ़ी को वन्यजीव संरक्षण, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और इंसान–वन्यजीव सह-अस्तित्व (Human-Wildlife Coexistence) का संदेश देने के उद्देश्य से नए पाठ्यक्रम में शामिल किया है। - गंगाराम मगरमच्छ की मौत कब हुई थी?
गंगाराम मगरमच्छ की प्राकृतिक मौत वर्ष 2019 में हुई थी। उसकी मौत के बाद बावा मोहतरा गांव के सैकड़ों ग्रामीणों ने पूरे धार्मिक रीति-रिवाज के साथ उसका अंतिम संस्कार किया और बाद में उसकी स्मृति में तालाब किनारे एक मंदिर भी बनवाया।
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