चरणदास महंत का रुख हो सकता है राज्यसभा की ओर, टीएस और दीपक बैज भी रेस में लगा रहे जोर
Arun Tiwari | Feb 27, 2026, 18:38 IST
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राज्यसभा की दो सीटें खाली होने जा रही हैं, जिनमें से एक कांग्रेस के खाते में आ सकती है। नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत, टीएस सिंहदेव और पीसीसी अध्यक्ष दीपक बैज रेस में बताए जा रहे हैं। वहीं बीजेपी की ओर से भी सरोज पांडेय समेत कई नाम चर्चा में हैं।
Raipur. छत्तीसगढ़ में राज्यसभा की दो सीटें खाली हो रही हैं। दोनों सीटें कांग्रेस के हिस्से की हैं लेकिन इस बार उसके हाथ एक ही सीट लगेगी। कांग्रेस में अटकलों का बाजार गर्म है।
चर्चा है कि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत राज्यसभा का रुख कर सकते हैं। वहीं पीसीसी अध्यक्ष दीपक बैज और पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव भी राज्यसभा की रेस में शामिल हैं।
इन सबके बीच सभी की निगाहें दिल्ली पर भी लगी हुई हैं। ऐसा न हो कि कहीं हर बार की तरह को पैराशूट लैंडिंग कर ले।
कांग्रेस से इस बार नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत के राज्यसभा का रुख करने की चर्चा जोरों पर है। महंत इतने सीनियर लीडर हैं कि वे कई बार विधानसभा से लेकर लोकसभा तक की सीढ़ियां चढ़ चुके हैं।
गाहे बगाहे वे राज्यसभा जाने की अपनी इच्छा बताते रहे हैं। हो सकता है महंत की इच्छा इस बार पूरी हो जाए। महंत आखिर राज्यसभा जाना क्यों चाहते हैं।
इस सवाल का जवाब कांग्रेस के अंदरखानों से आ रहा है। पार्टी की अंदरुनी राजनीति के जानकार कहते हैं कि वे अपनी राजनीतिक पारी खत्म होने से पहले अपने बेटे सूरज का राजनीतिक आसमान पर उदय करवाना चाहते हैं।
महंत यदि राज्यसभा गए तो उनकी विधानसभा सीट सक्ती से उनके पुत्र को विधानसभा के उपचुनाव में उतार दिया जाएगा। महंत इतने तो पकड़ वाले हैं कि अपने बेटे को चुनाव जितवा सकते हैं।
लोकसभा चुनाव में सारी सीटें बीजेपी के खाते में गईं लेकिन महंत अपनी पत्नी को चुनाव जितवाने में कामयाब रहे। यदि ये अटकलें हकीकत में बदलीं तो नया इतिहास बन जाएगा। पति राज्यसभा, पत्नी लोकसभा और पुत्र विधानसभा में।
टीएस सिंहदेव भी राज्यसभा की रेस में शामिल हैं। वे गांधी परिवार के नजदीक हैं लेकिन उनके साथ हर बार उनका मुकद्दर धोखा दे जाता है। बात तो तय ढाई ढाई साल तक सीएम बनने की थी लेकिन भूपेश बघेल ही पांच साल सीएम रहे।
टीएस वहां भी हाथ मलते रह गए। जब चर्चा पीसीसी अध्यक्ष बनने के लिए चली तो पार्टी के अंदर के विरोधी उनके खिलाफ में खड़े हो गए। यदि टीएस राज्यसभा गए तो फिर पीसीसी अध्यक्ष की कुर्सी उनको नहीं मिलेगी।
वहीं पीसीसी चीफ दीपक बैज भी राज्यसभा के लिए दावेदारी कर रहे हैं। लेकिन यहां भी पेंच है। यदि पीसीसी चीफ बदलना होगा तो दीपक बैज को राज्यसभा भेजा जा सकता है।
यानी इतना तय है कि पीसीसी अध्यक्ष और राज्यसभा जाने वाले सदस्य अलग अलग होंगे। बात फूलोदेवी को रिपीट करने की भी चलने लगी है। लेकिन यहां सबसे अहम बात दिल्ली के रुख की है।
छत्तीसगढ़ में राज्यसभा के लिए कांग्रेस का इतिहास बाहरी का रहा है। छत्तीसगढ़ बनने के बाद अप्रैल 2002 में राज्यसभा की दो सीटों के लिए पहला चुनाव हुआ था।
उसमें कांग्रेस से मोतीलाल वोरा और रामाधार कश्यप चुने गए थे। उसके बाद अभी तक 22 राज्यसभा सदस्यों के चुनाव हुए हैं। इसमें बीजेपी ने हमेशा लोकल को मौका दिया।
कांग्रेस ने पांच बार बाहरी प्रत्याशियों को राज्यसभा में भेजा। सबसे पहले जून 2004 में मोहसिना किदवई छत्तीसगढ़ से निर्वाचित हुई। जून 2020 में उन्हें फिर रिपीट किया गया।
उसके बाद 2018 से 2023 के बीच सबसे अधिक तीन बाहरी उम्मीदवारों को कांग्रेस ने राज्यसभा में भेजा। केटीएस तुलसी, राजीव शुक्ला और रंजीता रंजन।
मोतीलाल वोरा चूकि कद्दावर नेता रहे इसलिए वे 18 साल तक एक कोटा अपने पास रखे रहे। यही कारण है कि इस बार फिर बाहरी उम्मीदवार की चर्चा भी चलने लगी है।
इस बार राज्यसभा की एक सीट बीजेपी को मिलने वाली है। इस सीट का फैसला दिल्ली से होगा इतना तय है। लेकिन लोकसभा हार चुकीं सरोज पांडेय इस सीट के लिए जोर लगा रही हैं।
हो सकता है तेज तर्रार सरोज पांडेय को बीजेपी संसद में ले जाना चाहती हो। वे लोकसभा का चुनाव महंत की पत्नी ज्योत्सना महंत के सामने लड़ीं थीं लेकिन वे बाहरी उम्मीदवार की छवि के साथ हार गईं।
यह संभावना इसलिए है क्योंकि बीजेपी लोकल लीडर को तरजीह देती रही है। हालांकि रेस में प्रेमप्रकाश पांडे और नारायण चंदेल और गुहाराम अजगले भी हैं।
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चर्चा है कि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत राज्यसभा का रुख कर सकते हैं। वहीं पीसीसी अध्यक्ष दीपक बैज और पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव भी राज्यसभा की रेस में शामिल हैं।
इन सबके बीच सभी की निगाहें दिल्ली पर भी लगी हुई हैं। ऐसा न हो कि कहीं हर बार की तरह को पैराशूट लैंडिंग कर ले।
चरणदास के महंत बनने की चर्चा क्यों :
गाहे बगाहे वे राज्यसभा जाने की अपनी इच्छा बताते रहे हैं। हो सकता है महंत की इच्छा इस बार पूरी हो जाए। महंत आखिर राज्यसभा जाना क्यों चाहते हैं।
इस सवाल का जवाब कांग्रेस के अंदरखानों से आ रहा है। पार्टी की अंदरुनी राजनीति के जानकार कहते हैं कि वे अपनी राजनीतिक पारी खत्म होने से पहले अपने बेटे सूरज का राजनीतिक आसमान पर उदय करवाना चाहते हैं।
महंत यदि राज्यसभा गए तो उनकी विधानसभा सीट सक्ती से उनके पुत्र को विधानसभा के उपचुनाव में उतार दिया जाएगा। महंत इतने तो पकड़ वाले हैं कि अपने बेटे को चुनाव जितवा सकते हैं।
लोकसभा चुनाव में सारी सीटें बीजेपी के खाते में गईं लेकिन महंत अपनी पत्नी को चुनाव जितवाने में कामयाब रहे। यदि ये अटकलें हकीकत में बदलीं तो नया इतिहास बन जाएगा। पति राज्यसभा, पत्नी लोकसभा और पुत्र विधानसभा में।
टीएस और दीपक बैज भी रेस में :
टीएस वहां भी हाथ मलते रह गए। जब चर्चा पीसीसी अध्यक्ष बनने के लिए चली तो पार्टी के अंदर के विरोधी उनके खिलाफ में खड़े हो गए। यदि टीएस राज्यसभा गए तो फिर पीसीसी अध्यक्ष की कुर्सी उनको नहीं मिलेगी।
वहीं पीसीसी चीफ दीपक बैज भी राज्यसभा के लिए दावेदारी कर रहे हैं। लेकिन यहां भी पेंच है। यदि पीसीसी चीफ बदलना होगा तो दीपक बैज को राज्यसभा भेजा जा सकता है।
यानी इतना तय है कि पीसीसी अध्यक्ष और राज्यसभा जाने वाले सदस्य अलग अलग होंगे। बात फूलोदेवी को रिपीट करने की भी चलने लगी है। लेकिन यहां सबसे अहम बात दिल्ली के रुख की है।
कांग्रेस में रहा है बाहरी का इतिहास :
उसमें कांग्रेस से मोतीलाल वोरा और रामाधार कश्यप चुने गए थे। उसके बाद अभी तक 22 राज्यसभा सदस्यों के चुनाव हुए हैं। इसमें बीजेपी ने हमेशा लोकल को मौका दिया।
कांग्रेस ने पांच बार बाहरी प्रत्याशियों को राज्यसभा में भेजा। सबसे पहले जून 2004 में मोहसिना किदवई छत्तीसगढ़ से निर्वाचित हुई। जून 2020 में उन्हें फिर रिपीट किया गया।
उसके बाद 2018 से 2023 के बीच सबसे अधिक तीन बाहरी उम्मीदवारों को कांग्रेस ने राज्यसभा में भेजा। केटीएस तुलसी, राजीव शुक्ला और रंजीता रंजन।
मोतीलाल वोरा चूकि कद्दावर नेता रहे इसलिए वे 18 साल तक एक कोटा अपने पास रखे रहे। यही कारण है कि इस बार फिर बाहरी उम्मीदवार की चर्चा भी चलने लगी है।
बीजेपी की सरोज लगा रहीं जोर :
हो सकता है तेज तर्रार सरोज पांडेय को बीजेपी संसद में ले जाना चाहती हो। वे लोकसभा का चुनाव महंत की पत्नी ज्योत्सना महंत के सामने लड़ीं थीं लेकिन वे बाहरी उम्मीदवार की छवि के साथ हार गईं।
यह संभावना इसलिए है क्योंकि बीजेपी लोकल लीडर को तरजीह देती रही है। हालांकि रेस में प्रेमप्रकाश पांडे और नारायण चंदेल और गुहाराम अजगले भी हैं।
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