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NEWS IN SHORT
- धर्मांतरण कानून पर कानूनी पेंच
- छत्तीसगढ़ में नए धर्मांतरण विरोधी कानून पर अड़चन
- बजट सत्र में विधेयक पेश करने में बड़ी उलझन
- कैबिनेट सब कमेटी में हुई नए कानून पर चर्चा
NEWS IN DETAIL
नए कानून पर कानूनी पेंच :
छत्तीसगढ़ सरकार नए कानून के जरिए मतांतरण से जुड़े मामलों में सख्ती बढ़ाना चाहती है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई लंबित होने के कारण यह मामला अटक गया है।
देश के विभिन्न राज्यों में लागू मतांतरण विरोधी कानूनों की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सहित उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, झारखंड और राजस्थान को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने को कहा है।
अधिकारियों के अनुसार, चूंकि मूल कानून की वैधता ही सवालों के घेरे में है, इसलिए राज्य सरकार नए संशोधन विधेयक को लेकर फिलहाल फूंक-फूंक कर कदम रख रही है।
सरकार ने विधानसभा के शीतकालीन सत्र में इस विधेयक को लाने का ऐलान किया था लेकिन 23 फरवरी से होने वाले बजट सत्र में भी इस मसौदे को लाने पर असमंजस है।
हाल ही में इस कानून को लेकर कैबिनेट सब कमेटी की बैठक भी हुई है। उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा के अनुसार, इस मुद्दे पर मंत्रिमंडलीय उप-समिति लगातार काम कर रही है।
समिति कानून को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए सुझाव तैयार कर रही है, लेकिन विधेयक को सदन में पेश करने की कोई निश्चित तारीख अभी तय नहीं की गई है।
दो सालों में 100 शिकायतें :
राज्य में बीते दो वर्षों के दौरान मतांतरण से जुड़ी 100 से अधिक शिकायतें दर्ज होने का दावा किया जा रहा है। खासकर आदिवासी बहुल इलाकों बस्तर और सरगुजा में इस तरह की गतिविधियों को लेकर लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं।
हिंदू संगठनों का आरोप है कि इन क्षेत्रों में भोले-भाले ग्रामीणों को प्रलोभन या दबाव के जरिए धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया जा रहा है। इस मसौदे को तैयार करने में सरकार ने 2 साल का वक्त लगाया है।
इतना ही नहीं इसके लिए 50 से ज्यादा बैठकें भी की गई हैं। जिन राज्यों में इस तरह का कानून लागू है उन राज्यों में इसका पूरा अध्ययन भी किया गया है। साथ ही ये जानकारी भी जुटाई गई है कि इस कानून का कितना असर हुआ है। दूसरे राज्यों में लागू धर्म स्वातंत्र्य कानूनों के प्रमुख बिंदुओं को भी इस नए मसौदे में शामिल किया गया है।
वे घटनाएं जिन पर मचा बवाल :
घटना नंबर 1 :
1 फरवरी 2026 को राजनांदगांव के मोतीपुर में एक घर में चल रही ईसाई प्रार्थना सभा को लेकर हिंदू संगठनों ने जमकर विरोध प्रदर्शन किया। आरोप था कि वहां मतांतरण कराया जा रहा है। पुलिस के दखल के बाद मामला शांत हुआ।
घटना नंबर 2 :
29 जनवरी 2026 को सरगुजा पुलिस ने चर्च सभा की आड़ में मतांतरण कराने के आरोप में रिटायर्ड डिप्टी कलेक्टर ओमेगा टोप्पो को गिरफ्तार किया। उनके निवास पर लोग मौजूद थे, जहां कथित तौर पर मतांतरण की प्रक्रिया चल रही थी।
घटना नंबर 3 :
पांच जनवरी 2026 को कांकेर में एक प्रार्थना सभा को लेकर ग्रामीणों ने प्रदर्शन किया। उनका दावा था कि आर्थिक प्रलोभन देकर लोगों का मतांतरण कराया जा रहा है, जिससे इलाके में तनाव फैल गया।
नए कानून में कड़े प्रावधान :
- धर्म परिवर्तन से दो महीने पहले फॉर्म भरकर जिला प्रशासन को देना होगा, जिला और पुलिस प्रशासन इसकी पूरी पड़ताल करेगा जिसमें कारणों की जानकारी ली जाएगी।
- यदि ऐसा नहीं किया गया तो धर्म परिवर्तन अमान्य माना जाएगा
- किसी तरह के दबाव, लालच या धोखाधड़ी से कराया गया धर्मांतरण अवैध माना जाएगा।
- इस तरह किया गया विवाह कानूनन मान्य नहीं होगा।
- एससी या एसटी के लोगों को धर्मांतरण के बाद आरक्षण और सरकारी लाभ नहीं मिलेगा।
- परिजन धर्मांतरण पर आपत्ति लेकर एफआईआर दर्ज करा सकते हैं।
- महिलाओं,नाबालिगों और अनुसूचित जाति,जनजाति के लोगों का अवैध धर्म परिवर्तन कराने पर दो से 10 साल तक की सजा और 25 हजार रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
- सामूहिक धर्म परिवर्तन पर 3 से 10 साल तक की जेल और 50 हजार तक जुर्माना लगाया जाएगा।
- कोर्ट पीड़ित को 5 लाख तक मुआवजा देने का आदेश दे सकता है।
- धर्म परिवर्तन वैध है या नहीं इसको साबित करने की जिम्मेदारी धर्म परिवर्तन कराने वाले की होगी।
छत्तीसगढ़ में क्यों है इसकी जरुरत :
छत्तीसगढ़ में बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन हो रहा है। इसको लेकर संघ खासतौर पर चिंता जता चुका है। संघ इस तरह के धर्मांतरण को रोकने के लिए काम भी कर रहा है।
इसके अलावा जूदेव परिवार भी घर वापसी अभियान चला रहा है। सरकार से जुड़े जानकार कहते हैं कि धर्म परिवर्तन के मामले बहुत कम दर्ज किए जाते हैं लेकिन असल में इसकी संख्या अब लाखों में पहुंच गई है।
धर्म परिवर्तन का ये जाल अब बस्तर के सुदूर अंचलों से प्रदेश के बड़े शहरों तक पहुंच गया है।
Knowledge:
छत्तीसगढ़ मे धर्मांतरण एक बड़ा मुद्दा है। चंगाई सभा जैसा आयोजन असल में धर्म परिवर्तन के लिए ही किया जाता है। छत्तीसगढ़ में छोटे बड़े 900 से ज्यादा चर्च हैं जहां पर इस तरह की बातें सामने आती रही हैं।
छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में खासकर बस्तर, जशपुर, रायगढ़ क्षेत्र में बड़े पैमाने पर आदिवासियों को ईसाई धर्म में लिया जा रहा है। यह विवाद का विषय बना हुआ है।
बस्तर के नारायणपुर क्षेत्र में तो यह गुटीय संघर्ष में तब्दील हो चुका है। कांकेर जिले में धर्म परिवर्तन की घटनाओं के बाद अब कई गांवों में पास्टर और पादरियों के प्रवेश पर बैन लगा दिया गया।
अब आगे क्या :
अब सरकार सुप्रीम कोर्ट के पेंच को सुलझाने में जुट गई है। सब कमेटी सदस्य स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक, संवैधानिक और धर्मनिरपेक्ष देश है, जहां सभी धर्मों को समान सम्मान और प्रचार का अधिकार है।
लेकिन किसी भी व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाकर, लोभ या जबरदस्ती से धर्म परिवर्तन कराना गलत है। इसी उद्देश्य से समिति ने विधेयक के हर पहलू पर गहन मंथन किया है, ताकि कोर्ट में चुनौती की स्थिति में सरकार का पक्ष मजबूत रहे।
important points :
.छत्तीसगढ़ सरकार का मतांतरण विरोधी संशोधन विधेयक सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों के कारण फिलहाल अटका हुआ है।
. छत्तीसगढ़ सहित 10 से अधिक राज्यों के मतांतरण विरोधी कानूनों की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है और राज्यों से जवाब मांगा गया है।
. पिछले दो वर्षों में राज्य में मतांतरण से जुड़ी 100 से अधिक शिकायतें दर्ज हुई हैं, जिनमें बस्तर और सरगुजा जैसे आदिवासी इलाकों से ज्यादा मामले सामने आए हैं।
.प्रस्तावित संशोधन में जबरन या प्रलोभन से मतांतरण पर 10 साल तक की कैद, जुर्माना बढ़ाने और 60 दिन पहले प्रशासन को सूचना देने जैसे प्रावधान शामिल हो सकते हैं।
. राजनांदगांव, सरगुजा और कोंडागांव में प्रार्थना सभाओं को लेकर हुए विवाद और गिरफ्तारियों ने मतांतरण के मुद्दे को प्रदेश की राजनीति के केंद्र में ला दिया है।
निष्कर्ष :
छत्तीसगढ़ सरकार की लंबे समय से चली आ रही धर्मांतरण को लेकर नए और सख्त कानून बनाने की कवायद पूरी हो गई है। सरकार ने कानून का नया मसौदा तैयार कर लिया है।
लेकिन अब इसमें कानूनी अड़चन आ गई है। सरकार को लगता है कि नए कानून से छत्तीसगढ़ में मतांतरण पर अंकुश लग सकेगा। सब कमेटी की बैठक में इस बात पर भी विशेष जोर दिया गया कि इस तरह के कानूनों को अक्सर अदालतों में चुनौती दी जाती है, इसलिए विधेयक को पूरी तरह संवैधानिक दायरे में मजबूत और तर्कसंगत बनाया जाएगा।
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