छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, नियमित भर्ती वालों को मिलेगा स्थायी हक

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने नियमित चयन से नियुक्त कर्मचारियों को स्थायी हक देने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि "कॉन्ट्रैक्चुअल" शब्द से कर्मचारियों के अधिकारों को नहीं छीना जा सकता।

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Rajesh Lahoti
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News in Short

  • छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों को कॉन्ट्रैक्चुअल बताने पर निर्णय दिया।
  • नियमित चयन प्रक्रिया से आए कर्मचारियों को संविदा पर रखने की प्रथा पर प्रहार किया।
  • सरगुजा जिले के डेटा एंट्री ऑपरेटर्स को नियमित मानने का आदेश दिया।
  • अदालत ने कहा कि लेबल से कर्मचारी के अधिकार नहीं बदल सकते।
  • इस फैसले से सरकारी कर्मचारियों को स्थायी दर्जा मिलने का रास्ता खुलेगा।

News in Detail

Bilaspur. सरकारी दफ्तरों में वर्षों से चल रहे कॉन्ट्रैक्चुअल के खेल पर आज बड़ा न्यायिक प्रहार हुआ है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने साफ शब्दों में कह दिया है कि यदि किसी कर्मचारी की नियुक्ति नियमित चयन प्रक्रिया के तहत हुई है। वह स्वीकृत (sanctioned) पद पर लगातार सेवा दे रहा है, तो उसे सिर्फ नियुक्ति पत्र में कॉन्ट्रैक्चुअल लिख देने भर से नियमित दर्जे से वंचित नहीं किया जा सकता।

अदालत ने माना कि भर्ती की प्रकृति और पद की स्थिति ही असली कसौटी है, न कि नियुक्ति आदेश का लेबल। यानी अगर चयन पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया से हुआ है, पद नियमित है और कर्मचारी वर्षों से काम कर रहा है, तो सरकार या विभाग उसे संविदा बताकर उसके वैधानिक अधिकार नहीं रोक सकते।

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क्या था मामला?

यह याचिका “डेटा एंट्री ऑपरेटर्स कर्मचारियों ने दायर की थी, जिनको सरगुजा जिले में 2012-2013 में भर्ती किया गया था। इन कर्मचारियों को नियमित चयन प्रक्रिया से चुना गया, स्वीकृत पदों पर नियुक्त किया गया और लंबे समय से निरंतर सेवा दे रहे हैं। इसके बावजूद विभाग उन्हें कॉन्ट्रैक्चुअल बताकर वेतनमान, पदोन्नति, पेंशन और अन्य सेवा लाभ देने से बच रहा है।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने रिकॉर्ड खंगाले और पाया कि चयन प्रक्रिया नियमित थी, पद स्वीकृत थे और सेवा निरंतर थी। ऐसे में केवल नियुक्ति पत्र में contractual शब्द लिख देने से कर्मचारी के अधिकार खत्म नहीं हो जाते।

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अदालत की कड़ी टिप्पणी

कोर्ट ने कहा कि लेबल से हक़ नहीं बदलते। यदि व्यवस्था ने नियमित प्रक्रिया अपनाई है, तो परिणाम भी नियमित ही होंगे। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि वर्षों तक काम लेने के बाद कर्मचारियों को अस्थायी बताना प्रशासनिक मनमानी के दायरे में आ सकता है।
इस फैसले को सरकारी तंत्र में फैली उस प्रवृत्ति पर करारा झटका माना जा रहा है, जिसमें नियमित प्रकृति के काम को संविदा के नाम पर करवाया जाता है, ताकि दीर्घकालिक लाभ और सुरक्षा से बचा जा सके।

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क्या बदलेगा अब?

इस आदेश के बाद:

  • नियमित चयन से आए कर्मचारियों को स्थायी दर्जा देने का रास्ता खुलेगा।
  • विभागों पर दबाव बढ़ेगा कि वे सेवा लाभ और वेतनमान पर पुनर्विचार करें।
  • समान परिस्थितियों में काम कर रहे अन्य कर्मचारी भी अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला समानता और निष्पक्षता के सिद्धांत को मजबूत करता है। अगर पद नियमित है और भर्ती नियमित है, तो कर्मचारी को भी नियमित ही माना जाएगा। यह सिद्धांत अब न्यायिक मुहर के साथ सामने है।

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व्यापक असर

यह निर्णय केवल कुछ कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहेगा। राज्य के विभिन्न विभागों, निगमों और प्राधिकरणों में बड़ी संख्या में ऐसे कर्मचारी हैं जिन्हें वर्षों से कॉन्ट्रैक्चुअल बताकर रखा गया है, जबकि उनका चयन और काम दोनों नियमित प्रकृति का है। अदालत के इस सख्त रुख ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकारी नीतियों की आड़ में अधिकारों से समझौता नहीं होगा।

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