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Photograph: (the sootr)
News in Short
- 550 करोड़ के भू-अर्जन घोटाले की फाइल बंद होने के बाद तीर्थराज अग्रवाल को आईएएस मिला।
- 2013-14 में एसडीएम रहते हुए 780 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण किया गया था।
- आरोप था कि मुआवजा वितरण फर्जी किसानों के नाम पर हुआ, 550 करोड़ की गड़बड़ी हुई।
- 2014 में मामला दर्ज होने के बाद, अग्रवाल 20 महीने तक निलंबित रहे।
- 2024 में मामले को क्लोज कर दिया गया, उन्हें दोषमुक्त कर दिया गया।
News in Detail
RAIPUR. राज्य प्रशासनिक सेवा 2008 बैच के अधिकारी तीर्थराज अग्रवाल को भारतीय प्रशासनिक सेवा में (IAS अवार्ड) प्रमोट किए जाने के बाद फिर चर्चा में आ गए हैं। केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के आदेश के तहत उन्हें IAS में प्रमोट किया गया। यह प्रमोशन उन्हें 550 करोड़ रुपए के कथित भू-अर्जन एवं मुआवजा घोटाले में शासन की क्लीन चिट मिलने के बाल मिला है।
क्या है पूरा मामला
दरअसल यह मामला रायगढ़ जिले के पुसौर विकासखंड स्थित NTPC की लारा पावर परियोजना से जुड़ा है। वर्ष 2013-14 में तीर्थराज अग्रवाल रायगढ़ में SDM के रूप में पदस्थ थे।
आरोप है कि ग्राम लारा सहित नौ गांवों झिलगीटार, देवलसुर्रा, आड़मुड़ा, बोड़ाझरिया, कांदागढ़, छपोरा, महलोई और रियापाली की लगभग 780.869 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण किया। आरोप लगा कि यह भू अधिग्रहण भू-राजस्व संहिता के प्रावधानों के पालन किए बिना हुआ।
आरोपों के मुताबिक, अधिग्रहण प्रक्रिया से पहले और उस दौरान बड़े पैमाने पर भूमि की छोटे-छोटे टुकड़ों में खरीद-बिक्री और खाता विभाजन हुआ। शिकायतों में यह भी कहा गया कि वास्तविक भूमिस्वामियों के बजाय कागजों में फर्जी किसान बनाकर मुआवजा राशि का वितरण किया गया। करीब 550 करोड़ रुपए की गड़बड़ी हुई है।
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2014 में मामला दर्ज, 20 महीने तक निलंबित
मीडिया में खबरें आने के बाद दिसंबर 2014 में पुलिस ने तीर्थराज अग्रवाल पर 420 समेत आईपीसी की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया। अगस्त 2014 में उन्हें निलंबित किया गया। अक्टूबर 2014 में आरोप पत्र जारी हुआ।
नवंबर 2014 में उन्होंने शासन को जवाब प्रस्तुत किया, जिसे असंतोषजनक माना गया। मामला अदालत पहुंचा, लेकिन लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बीच मई 2016 में शासन ने उन्हें पुनः बहाल कर दिया। वे करीब 20 महीने तक निलंबित रहे।
2020 में दोबारा सुनवाई और 2024 में फाइल बंद
मई 2020 में शासन ने पुनः मामले पर सुनवाई की। इस बार उनके जवाब को संतोषजनक मानते हुए आगे की कार्रवाई नहीं की गई। वर्ष 2024 में प्रकरण की फाइल को बंद कर दिया गया, यानी अधिकारी को विभागीय स्तर पर दोषमुक्त कर दिया गया। हालांकि यह सवाल बना रहा कि मीडिया में जिन वित्तीय अनियमितताओं की बात सामने आई थी, वह 550 करोड़ रुपए की राशि आखिर कहां गई?
कोर्ट ने भी किया दोषमुक्त
बाद में बिलासपुर हाईकोर्ट में चल रहे मामले में भी उन्हें राहत मिली। अदालत ने 13 जनवरी 2016 को आरोप तय करने के आदेश और 2 दिसंबर 2024 की चार्जशीट को निरस्त कर दिया। आदेश में कहा गया कि एसडीएम के तौर पर उनके पास कुछ अधिकार हैं। इसके अलावा उन्हें विभागीय स्तर पर चल रही जांच में दोष मुक्त कर दिया गया है।
रोक हटाने के फैसले पर उठे सवाल
रायगढ़ जिले के ग्राम बघनपुर, घनागार और कोड़ातराई में 6 जुलाई 2012 को धारा 4 के तहत अधिसूचना जारी कर जमीन की खरीद-बिक्री और खाता बंटवारे पर रोक लगाई गई थी। आरोप है कि 22 अप्रैल 2013 को तत्कालीन एसडीएम के रूप में अग्रवाल ने पत्र जारी कर इस रोक को तत्काल प्रभाव से हटा दिया।
इसके बाद प्रभावित कृषि भूमि में व्यापक स्तर पर खरीद-बिक्री और खाता विभाजन हुआ। शिकायतकर्ताओं ने इसे गलत मंशा से लिया गया निर्णय बताया। कहा गया कि इससे कुछ लोगों को अनुचित लाभ पहुंचा।
मंत्री के विशेष सहायक के रूप में दे रहे सेवाएं
वर्तमान में तीर्थराज अग्रवाल वन एवं परिवहन मंत्री केदार कश्यप के विशेष सहायक के रूप में कार्यरत हैं। आईएएस अवार्ड के बाद उनकी भूमिका और प्रभाव को लेकर भी राजनीतिक हलकों में चर्चा है।
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RTI का नहीं दे रहे जवाब
तीर्थराज अग्रवाल के जांच प्रतिवेदन की मांग करने के लिए राज्य के कई लोगों ने आरटीआई लगाया। शासन ने इसे निजी दस्तावेज बताते हुए जांच प्रतिवेदन देने से इंकार कर दिया। रायपुर के सामाजिक कार्यकर्ता प्रतीक पांडे ने इसकी शिकातय प्रधानमंत्री कार्यालय से भी की।
प्रतीक का कहना है कि वहां से आई शिकायत को भी शासन ने डस्टबीन में डाल दिया। प्रतीक पांडे का कहना है कि तीर्थ राज प्रकरण हमारी सरकार पर वह दाग है। न्याय होने तक, मेरी ये लड़ाई जारी रहेगी।
छत्तीसगढ़ वनमंत्री केदार कश्यप
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