निकाय चुनाव से पहले सरकार का बड़ा दांव, हाईकोर्ट में केविएट दाखिल
VINAY VERMA | Sept 14, 2026, 17:09 IST
छत्तीसगढ़ निकाय चुनाव
छत्तीसगढ़ में दिसंबर 2026 और जनवरी 2027 में प्रस्तावित नगरीय निकाय चुनाव से पहले सरकार ने कानूनी तैयारी शुरू कर दी है। वार्ड परिसीमन और आरक्षण को लेकर संभावित विवाद के मद्देनजर राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में केविएट दाखिल की है।
छत्तीसगढ़ में नगरीय निकाय चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन सरकार ने इसकी तैयारी में कानूनी मोर्चा पहले ही खोल दिया है। दिसंबर 2026 और जनवरी 2027 में प्रस्तावित निकाय चुनाव से पहले राज्य सरकार ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में केविएट दाखिल कर दी है। सीधा मतलब है कि सरकार को पहले से अंदेशा है कि वार्डों के परिसीमन और आरक्षण को लेकर कोई नाराज पक्ष अदालत पहुंच सकता है। सरकार अब नहीं चाहती कि उसकी बात सुने बिना कोर्ट से कोई अंतरिम रोक लग जाए।
दरअसल, चुनाव से पहले वार्डों की सीमाएं तय करने और अलग-अलग वर्गों के लिए सीटें आरक्षित करने की प्रक्रिया चल रही है। यही दोनों मुद्दे चुनाव के दौरान सबसे ज्यादा विवाद खड़ा करते हैं। सरकार की ओर से दाखिल केविएट में कहा गया है कि 15 बाकी नगरीय निकायों और दो नए नगर पंचायतों में चुनाव कराए जाने प्रस्तावित हैं। इसके लिए वार्ड परिसीमन और आरक्षण की प्रक्रिया संबंधित कानूनों के तहत की जा रही है।
केविएट दाखिल करने के पीछे सरकार की रणनीति साफ है। अगर परिसीमन या आरक्षण से असंतुष्ट कोई व्यक्ति हाईकोर्ट पहुंचता है और तुरंत स्टे मांगता है, तो सरकार को अपनी बात रखने का मौका मिले। सरकार ने कोर्ट से आग्रह किया है कि उसके पक्ष को सुने बिना कोई एकतरफा अंतरिम आदेश जारी न किया जाए। यानी पहले सरकार की दलील सुनी जाए, फिर रोक पर फैसला हो।
प्रस्तावित चुनावों की सूची में भिलाई, रिसाली, भिलाई-चरौदा और बीरगांव जैसे बड़े नगर निगम शामिल हैं। इनके अलावा जामुल, सारंगढ़, खैरागढ़, बैकुण्ठपुर और शिवपुर-चरचा समेत कई नगर पालिका परिषद और नगर पंचायतों में भी चुनाव की तैयारी हो रही है। दो नए नगर पंचायत तमनार और बड़ी करेली भी इस चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बताए गए हैं।
किसी फैसले को लेकर विवाद होने पर संबंधित पक्ष सीधे हाईकोर्ट में याचिका लगा सकता है। अगर याचिकाकर्ता तत्काल राहत या रोक मांगता है तो अदालत शुरुआती स्तर पर उस पर विचार कर सकती है। यही स्थिति सरकार के लिए परेशानी खड़ी कर सकती है। परिसीमन या आरक्षण पर स्टे मिलने से चुनावी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इसी संभावना को देखते हुए सरकार ने पहले से अदालत को अपना पक्ष बताने की तैयारी कर ली है।
निकाय चुनाव में वार्ड की सीमा और सीट का आरक्षण सीधे उम्मीदवारों की उम्मीदवारी और राजनीतिक समीकरण बदल देता है। इसलिए इन दोनों प्रक्रियाओं पर विवाद की संभावना हमेशा बनी रहती है। सरकार की केविएट को इसी संभावित कानूनी लड़ाई की तैयारी के तौर पर देखा जा रहा है। अब अगर कोई पक्ष हाईकोर्ट पहुंचता है तो सरकार को अपना पक्ष रखने का मौका मिलना तय होगा।
इस कदम से एक बात साफ है कि सरकार चुनावी प्रक्रिया में किसी भी कानूनी अड़चन से बचने के लिए पहले ही तैयारी कर रही है। परिसीमन और आरक्षण को लेकर अगर मामला कोर्ट पहुंचा तो सरकार सीधे जवाब देने के लिए तैयार रहेगी।
यानी चुनाव की तारीख घोषित होने से पहले ही सरकार ने कोर्ट में अपना बचाव खड़ा कर दिया है। अब असली लड़ाई वार्डों की सीमा और आरक्षण पर होगी, क्योंकि यही तय करेगा कि चुनावी मैदान में किसके लिए रास्ता खुलेगा और किसके लिए बंद।
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परिसीमन पर विवाद की आशंका
सरकार ने पहले ही रास्ता रोक दिया
इन शहरों में चुनाव की तैयारी
केविएट क्यों जरूरी समझी?
चुनावी प्रक्रिया पर नजर
सरकार नहीं चाहती अचानक ब्रेक
यानी चुनाव की तारीख घोषित होने से पहले ही सरकार ने कोर्ट में अपना बचाव खड़ा कर दिया है। अब असली लड़ाई वार्डों की सीमा और आरक्षण पर होगी, क्योंकि यही तय करेगा कि चुनावी मैदान में किसके लिए रास्ता खुलेगा और किसके लिए बंद।
FAQ
- छत्तीसगढ़ में नगरीय निकाय चुनाव कब होंगे?
छत्तीसगढ़ में नगरीय निकाय चुनाव दिसंबर 2026 और जनवरी 2027 में प्रस्तावित हैं। - केविएट का मतलब क्या है?
केविएट का मतलब है कि यदि किसी मामले में कोई व्यक्ति कोर्ट पहुंचकर तत्काल राहत या स्टे मांगता है, तो अदालत संबंधित पक्ष को भी सुनने का मौका दे। - छत्तीसगढ़ सरकार ने हाईकोर्ट में केविएट क्यों दाखिल की है?
वार्ड परिसीमन और आरक्षण को लेकर संभावित विवाद से निपटने के लिए सरकार ने पहले ही केविएट दाखिल की है, ताकि अदालत कोई अंतरिम आदेश देने से पहले सरकार का पक्ष भी सुने।
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