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NEWS IN SHORT
- दुर्ग नगर निगम कमिश्नर पर अधीनस्थ कर्मचारी से निजी काम कराने का आरोप।
- फिल्म टिकट, चावल, फल और बंगले के वाई-फाई रिचार्ज की मांग के आरोप।
- पीड़ित कर्मचारी ने वॉट्सएप चैट को सबूत बनाकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
- हाईकोर्ट ने निगम की कार्रवाई पर रोक लगाते हुए जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए।
- मामले की अगली सुनवाई 23 फरवरी को तय, राज्य शासन और कमिश्नर से जवाब तलब।
NEWS IN DETAIL
छत्तीसगढ़ के दुर्ग नगर निगम के कमिश्नर सुमित अग्रवाल से जुड़ा एक मामला इन दिनों प्रशासनिक गलियारों से लेकर न्यायिक मंच तक चर्चा का विषय बना हुआ है। आरोप है कि निगम कमिश्नर ने अपने ही अधीनस्थ कर्मचारी से निजी काम कराया। फिल्म की टिकट बुक कराने से लेकर चावल, फल और बंगले के वाई-फाई का रिचार्ज की डिमांड की।
आरोप है कि “खिदमत” नहीं होने पर कर्मचारी को सेवा से बाहर करने की प्रक्रिया शुरू कर दी। पीड़ित कर्मचारी ने कार्रवाई के खिलाफ छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में वॉट्सएप चैट के सबूतों के साथ याचिका दायर की है। हाईकोर्ट ने मामले में निगम की कार्रवाई पर रोक लगाते हुए राज्य शासन और कमिश्नर से जवाब मांगा है।
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गवाहों से पूछताछ नहीं
मामले में हाईकोर्ट ने जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए और कहा कि कर्मचारी पर कार्रवाई से पहले किसी की गवाही नहीं हुई है। रिपोर्ट में सीधे दंड दे दिया गया, इसके आधार पर कोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ चल रही कार्रवाई पर रोक लगा दी है। मामले की अगली सुनवाई 23 फरवरी को तय की गई है।
WhatsApp चैट बने सबूत
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याचिकाकर्ता ने याचिका के साथ कमिश्नर सुमित अग्रवाल और अपने बीच हुए वॉट्सएप चैट की फोटो कॉपी संलग्न की है। इन चैट्स में “लाल अंगूर”, “धुरंधर मूवी की टिकट चाहिए, वो भी थिएटर की कॉर्नर वाली सीट”, “10 किलो जवाफूल चावल”, और “बंगले के वाई-फाई का रिचार्ज करवा दो” का जिक्र है। एक चैट में कमिश्नर द्वारा एमआईसी (मेयर-इन-काउंसिल) की बैठक कैंसिल करने को लेकर भी सवाल पूछा गया है। एक अन्य संदेश में किसी कर्मचारी को “समझा देने” की बात लिखी गई है, यह कहते हुए कि “हटा दूंगा”।
नियुक्ति-पदोन्नति विवाद भी जुड़ा
याचिकाकर्ता के अनुसार, उसकी नियुक्ति 8 अगस्त 2014 को दुर्ग नगर निगम में चपरासी के पद पर हुई थी। 21 नवंबर 2019 को उसे सहायक ग्रेड-तृतीय के पद पर पदोन्नति मिली। सेवा अवधि के दौरान 31 जुलाई 2025 को निगम आयुक्त ने उसे कारण बताओ नोटिस जारी कर आरोप लगाया कि कुछ कर्मचारियों की नियुक्ति और पदोन्नति अवैध तरीके से की गई।
याचिकाकर्ता ने जवाब में स्पष्ट किया कि वह केवल चपरासी (प्रभारी क्लर्क) के रूप में फाइलें सक्षम प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करता था, नियुक्ति या पदोन्नति का निर्णय उसका नहीं था। इसके बावजूद उसे निलंबित कर दिया गया।
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