डॉक्टर से IAS तक.... निलेश कुमार महादेव क्षीरसागर की प्रेरक कहानी
Harrison Masih | Aug 27, 2026, 18:14 IST
आईएएस निलेश कुमार क्षीरसागर
BAMS डॉक्टर से IAS अफसर बनने तक निलेश कुमार महादेव क्षीरसागर का सफर बेहद प्रेरणादायक है। नौकरी के साथ UPSC की तैयारी करते हुए पहले ही प्रयास में 78वीं रैंक हासिल कर IAS बने। जानिए उनकी सफलता की कहानी...
कुछ लोग अपने करियर की राह पहले से तय करके चलते हैं, लेकिन कुछ की कहानी रास्ते बदलते हुए मंजिल तक पहुंचने की होती है। छत्तीसगढ़ कैडर के 2011 बैच के आईएएस अधिकारी निलेश कुमार महादेव क्षीरसागर की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। विज्ञान के विद्यार्थी रहे, मेडिकल की पढ़ाई की, बीएएमएस डॉक्टर बने, फिर प्रशासनिक सेवा की तरफ कदम बढ़ाया।
महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग में पहले ही प्रयास में चौथी रैंक हासिल कर डिप्टी कलेक्टर बने और इसके बाद यूपीएससी की परीक्षा दी तो वहां भी पहले ही प्रयास में 78वीं रैंक हासिल कर आईएएस बन गए। आज निलेश कुमार महादेव क्षीरसागर छत्तीसगढ़ में अर्बन एडमिनिस्ट्रेशन एंड डेवलपमेंट के संचालक की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। इस मुकाम तक पहुंचने की उनकी कहानी सिर्फ प्रतियोगी परीक्षा पास करने की कहानी नहीं है, बल्कि परिस्थितियों के बीच रास्ता तलाशने और लगातार खुद को नए लक्ष्य के लिए तैयार करने की कहानी है।
निलेश कुमार महादेव क्षीरसागर का जन्म 1984 को महाराष्ट्र के पुणे जिले के चाकन में हुआ। चाकन पुणे से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित है। माता-पिता की सरकारी नौकरी के कारण निलेश का बचपन महाराष्ट्र के अलग-अलग शैक्षणिक माहौल में बीता। उनकी शुरुआती पढ़ाई पुणे से करीब 35 किलोमीटर दूर शिकरापुर गांव के सरकारी स्कूल में हुई। यहां उन्होंने पहली से चौथी कक्षा तक पढ़ाई की। इसके बाद उनका दाखिला महाराष्ट्र के चर्चित प्रबोधिनी स्कूल में हुआ। इस स्कूल में प्रवेश आसान नहीं था। दाखिले के लिए प्रवेश परीक्षा होती थी और महाराष्ट्र के बड़ी संख्या में विद्यार्थी इसमें शामिल होते थे। निलेश के लिए भी यह जीवन की पहली बड़ी प्रतियोगी परीक्षा थी। उन्होंने इसे पार किया और बारहवीं तक की पढ़ाई इसी संस्थान से पूरी की।
![आईएएस निलेश कुमार महादेव क्षीरसागर]()
दसवीं के बाद निलेश ने 11वीं और 12वीं में फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स जैसे विषय चुने। शिक्षक पिता की सलाह पर उन्होंने बायोलॉजी को अतिरिक्त विषय के तौर पर लिया और बारहवीं पूरी की। दिलचस्प बात यह रही कि मुख्य विषय गणित होने के बावजूद निलेश ने इंजीनियरिंग का रास्ता नहीं चुना। उन्होंने मेडिकल प्रवेश परीक्षा दी और एमबीबीएस में दाखिले की कोशिश की। सरकारी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश नहीं मिला, जबकि निजी कॉलेज में एमबीबीएस का विकल्प उपलब्ध था, लेकिन निलेश ने निजी कॉलेज में जाने के बजाय सरकारी संस्थान से पढ़ाई करने का फैसला किया। इसके बाद उन्होंने बीएएमएस यानी बैचलर ऑफ आयुर्वेदिक मेडिसिन एंड सर्जरी की पढ़ाई की। यहीं से उनके जीवन की दिशा एक बार फिर बदलने लगी।
बीएएमएस पूरा करने के बाद निलेश ने डॉक्टर के रूप में करियर आगे बढ़ाने के बजाय यूपीएससी की तैयारी करने का निर्णय लिया। उनका लक्ष्य प्रशासनिक सेवा में जाना था। यूपीएससी की तैयारी के लिए वे दिल्ली जाना चाहते थे, लेकिन उस समय परिवार की आर्थिक परिस्थितियां इसकी इजाजत नहीं दे रही थीं। ऐसे में उन्होंने दिल्ली जाने के बजाय घर पर रहकर ही तैयारी करने का फैसला किया। यह निर्णय आसान नहीं था। यूपीएससी जैसी कठिन परीक्षा के लिए दिल्ली जाकर तैयारी करने का चलन उस समय भी काफी मजबूत था, लेकिन निलेश ने उपलब्ध संसाधनों में ही तैयारी करने की ठानी। इसी दौरान उन्होंने महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग की परीक्षा भी दी।
निलेश ने महाराष्ट्र पीएससी की परीक्षा दी और पहले ही प्रयास में चौथी रैंक हासिल कर ली। उनका चयन डिप्टी कलेक्टर के पद पर हुआ। यह उनके लिए पहली बड़ी प्रशासनिक सफलता थी। मेडिकल की पढ़ाई के बाद सरकारी प्रशासन में प्रवेश और वह भी इतनी शानदार रैंक के साथ। यह उपलब्धि अपने आप में खास थी, लेकिन निलेश का लक्ष्य यहीं खत्म नहीं हुआ था। डिप्टी कलेक्टर के रूप में काम करते हुए उन्होंने यूपीएससी की तैयारी जारी रखी।
एक तरफ प्रशासनिक जिम्मेदारियां थीं और दूसरी तरफ देश की सबसे कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं में से एक की तैयारी। इसी दौरान उन्होंने यूपीएससी का अपना पहला प्रयास दिया।नतीजा आया तो उनकी मेहनत रंग लाई। निलेश कुमार क्षीरसागर ने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में अपने पहले ही प्रयास में 78वीं रैंक हासिल की और आईएएस के लिए चयनित हो गए। यानी जिस परीक्षा के लिए हजारों अभ्यर्थी वर्षों तक तैयारी करते हैं, उसे निलेश ने डिप्टी कलेक्टर की नौकरी करते हुए पहले प्रयास में ही पार कर लिया।
![IAS Nilesh Kumar Kshirsagar]()
यूपीएससी में चयन के बाद निलेश कुमार क्षीरसागर को छत्तीसगढ़ कैडर मिला। उनकी प्रशासनिक यात्रा की शुरुआत राजनांदगांव से हुई, जहां वे सहायक कलेक्टर के रूप में पदस्थ हुए। इसके बाद उन्होंने रायगढ़ में एसडीएम की जिम्मेदारी संभाली। फिर वे रायपुर जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी यानी सीईओ बने। प्रशासनिक करियर के शुरुआती वर्षों में उन्हें अलग-अलग स्तर पर काम करने का अनुभव मिला। फील्ड प्रशासन से लेकर विकास योजनाओं तक, उन्हें शासन की कार्यप्रणाली को जमीन पर समझने का अवसर मिला। इसके बाद उनके करियर में एक महत्वपूर्ण पड़ाव आया और वह था कलेक्टर के रूप में पहली पोस्टिंग।
निलेश कुमार महादेव क्षीरसागर की बतौर कलेक्टर पहली पोस्टिंग जशपुर जिले में हुई। जशपुर प्राकृतिक सुंदरता, आदिवासी संस्कृति और पर्यटन की संभावनाओं से भरपूर इलाका है। यहां उन्होंने प्रशासनिक कामकाज के साथ जिले की स्थानीय क्षमताओं को आगे बढ़ाने पर भी जोर दिया। पर्यटन, शिक्षा, चाय बागान, ट्राइबल टूरिज्म और खेल जैसे क्षेत्रों में उन्होंने कई पहल कीं। जशपुर में चाय की खेती और पर्यटन को बढ़ावा देने के प्रयासों ने जिले की अलग पहचान को सामने लाने में मदद की।
आदिवासी संस्कृति और प्राकृतिक संसाधनों को पर्यटन से जोड़ने की कोशिश भी उनके कार्यकाल की खास बातों में रही। खेल के क्षेत्र में भी काम किया गया, ताकि जिले के युवाओं को अपनी प्रतिभा दिखाने के बेहतर अवसर मिल सकें। उनकी कार्यशैली का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि प्रशासन को केवल सरकारी योजनाओं को लागू करने तक सीमित रखने के बजाय स्थानीय परिस्थितियों और संभावनाओं से जोड़ने की कोशिश की गई।
जशपुर के बाद निलेश कुमार महादेव क्षीरसागर ने गरियाबंद कलेक्टर के रूप में जिम्मेदारी संभाली। इसके बाद वे महासमुंद के कलेक्टर भी रहे। इन जिलों में काम करते हुए उन्हें छत्तीसगढ़ के अलग-अलग भौगोलिक और सामाजिक क्षेत्रों में प्रशासनिक चुनौतियों से निपटने का अनुभव मिला।
एक तरफ ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों की जरूरतें थीं तो दूसरी तरफ सरकारी योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने की चुनौती। कलेक्टर के रूप में उनका अनुभव लगातार व्यापक होता गया। महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव से शुरू हुआ सफर अब छत्तीसगढ़ के अलग-अलग जिलों में प्रशासनिक जिम्मेदारियों तक पहुंच चुका था।
निलेश कुमार महादेव क्षीरसागर छत्तीसगढ़ के संयुक्त मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के रूप में भी जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। यह पद प्रशासनिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि चुनावी प्रक्रिया में निष्पक्षता, पारदर्शिता और व्यवस्थागत तैयारी बेहद अहम होती है। एक डॉक्टर से प्रशासनिक अधिकारी बनने और फिर चुनावी व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी और अब अर्बन एडमिनिस्ट्रेशन एंड डेवलपमेंट के संचालक पद तक पहुंचने वाला यह सफर कई मोड़ों से होकर गुजरा है।
उनकी कहानी की खास बात सिर्फ यह नहीं कि उन्होंने यूपीएससी में 78वीं रैंक हासिल की। असली दिलचस्पी इस बात में है कि उन्होंने एक के बाद एक अलग-अलग क्षेत्रों में खुद को साबित किया। मेडिकल की पढ़ाई की, सरकारी नौकरी में डिप्टी कलेक्टर बने, नौकरी के साथ यूपीएससी की तैयारी की और पहले ही प्रयास में आईएएस बन गए। यह कहानी बताती है कि करियर की शुरुआत किसी एक विषय से हो सकती है, लेकिन मंजिल हमेशा उसी रास्ते पर मिले, यह जरूरी नहीं।
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महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग में पहले ही प्रयास में चौथी रैंक हासिल कर डिप्टी कलेक्टर बने और इसके बाद यूपीएससी की परीक्षा दी तो वहां भी पहले ही प्रयास में 78वीं रैंक हासिल कर आईएएस बन गए। आज निलेश कुमार महादेव क्षीरसागर छत्तीसगढ़ में अर्बन एडमिनिस्ट्रेशन एंड डेवलपमेंट के संचालक की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। इस मुकाम तक पहुंचने की उनकी कहानी सिर्फ प्रतियोगी परीक्षा पास करने की कहानी नहीं है, बल्कि परिस्थितियों के बीच रास्ता तलाशने और लगातार खुद को नए लक्ष्य के लिए तैयार करने की कहानी है।
घर से शुरू हुआ सफर
आईएएस निलेश कुमार महादेव क्षीरसागर
मैथ्स के विद्यार्थी, लेकिन मंजिल मेडिकल की
डॉक्टर बनने के बाद प्रशासन की तैयारी
पहले प्रयास में MPSC की चौथी रैंक
एक तरफ प्रशासनिक जिम्मेदारियां थीं और दूसरी तरफ देश की सबसे कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं में से एक की तैयारी। इसी दौरान उन्होंने यूपीएससी का अपना पहला प्रयास दिया।नतीजा आया तो उनकी मेहनत रंग लाई। निलेश कुमार क्षीरसागर ने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में अपने पहले ही प्रयास में 78वीं रैंक हासिल की और आईएएस के लिए चयनित हो गए। यानी जिस परीक्षा के लिए हजारों अभ्यर्थी वर्षों तक तैयारी करते हैं, उसे निलेश ने डिप्टी कलेक्टर की नौकरी करते हुए पहले प्रयास में ही पार कर लिया।
IAS Nilesh Kumar Kshirsagar
छत्तीसगढ़ कैडर से शुरू हुआ नया अध्याय
जशपुर में दिखा अलग अंदाज
आदिवासी संस्कृति और प्राकृतिक संसाधनों को पर्यटन से जोड़ने की कोशिश भी उनके कार्यकाल की खास बातों में रही। खेल के क्षेत्र में भी काम किया गया, ताकि जिले के युवाओं को अपनी प्रतिभा दिखाने के बेहतर अवसर मिल सकें। उनकी कार्यशैली का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि प्रशासन को केवल सरकारी योजनाओं को लागू करने तक सीमित रखने के बजाय स्थानीय परिस्थितियों और संभावनाओं से जोड़ने की कोशिश की गई।
गरियाबंद और महासमुंद की जिम्मेदारी
एक तरफ ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों की जरूरतें थीं तो दूसरी तरफ सरकारी योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने की चुनौती। कलेक्टर के रूप में उनका अनुभव लगातार व्यापक होता गया। महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव से शुरू हुआ सफर अब छत्तीसगढ़ के अलग-अलग जिलों में प्रशासनिक जिम्मेदारियों तक पहुंच चुका था।
चुनावी व्यवस्था की अहम जिम्मेदारी
उनकी कहानी की खास बात सिर्फ यह नहीं कि उन्होंने यूपीएससी में 78वीं रैंक हासिल की। असली दिलचस्पी इस बात में है कि उन्होंने एक के बाद एक अलग-अलग क्षेत्रों में खुद को साबित किया। मेडिकल की पढ़ाई की, सरकारी नौकरी में डिप्टी कलेक्टर बने, नौकरी के साथ यूपीएससी की तैयारी की और पहले ही प्रयास में आईएएस बन गए। यह कहानी बताती है कि करियर की शुरुआत किसी एक विषय से हो सकती है, लेकिन मंजिल हमेशा उसी रास्ते पर मिले, यह जरूरी नहीं।
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