कवासी लखमा को छत्तीसगढ़ से बाहर रहने के मिले तीन ऑफर, क्या त्रिकोण में कटेगा वक्त

सशर्त जमानत पर जेल से बाहर आए पूर्व मंत्री कवासी लखमा अब कहां निर्वासित जीवन बिताएंगे। उन्हें छत्तीसगढ़ से बाहर रहने के लिए तीन ऑफर मिले हैं। इनमें सबसे बड़ा ऑफर तेलंगाना की मंत्री अनसुईया ने दिया है, जो सरेंडर नक्सली हैं।

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News in short

  • शराब घोटाले में फंसे कवासी लखमा को छत्तीसगढ़ से बाहर रहने के मिले तीन ऑप्शन।
  • पूर्व मंत्री कवासी लखमा को इस शर्त पर बेल मिली कि वे छत्तीसगढ़ से रहेंगे बाहर।
  • सबसे बड़ा ऑफर तेलंगाना की मंत्री दसारी अनसुईया ने दिया, जो सरेंडर नक्सली हैं।
  • दूसरा ऑफर ओडिशा के मलकानगिरी जिला कांग्रेस अध्यक्ष चिट्टी भाई ने दिया।
  • कवासी लखमा के लिए तीसरा और सबसे दिलचस्प विकल्प तेलंगाना के मरईगुड़ा गांव का।

News in Detail

राजेश लाहोटी @​ रायपुर.  छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित शराब घोटाले में नौ महीनों से सलाखों के पीछे बंद पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा आखिरकार जेल की चारदीवारी से बाहर आ गए हैं। ​बस्तर के 'टाइगर' कहे जाने वाले लखमा के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि वे आखिर रहें तो रहें कहां? क्योंकि, कोर्ट ने उन्हें जमानत तो दी, लेकिन एक ऐसी 'कठोर' शर्त के साथ कि वे छत्तीसगढ़ में नहीं रहेंगे। यह शर्त लखमा के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। अदालत ने स्पष्ट आदेश दिया है कि लखमा छत्तीसगढ़ की सीमा में कदम नहीं रखेंगे, ताकि वे केस से जुड़े सबूतों या गवाहों को प्रभावित न कर सकें।

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'शरण' के दरवाजे खुले

सवाल यह भी है कि छत्तीसगढ़ से बाहर रहकर भी कवासी लखमा अपने क्षेत्र पर पकड़ कैसे बनाए रखें? उनके करीबियों और पड़ोसी राज्यों के नेताओं ने उनके लिए 'शरण' के दरवाजे खोल दिए हैं। सूत्रों का कहना है कि लखमा के पास अभी तीन ऑप्शन सामने आए हैं, जो उनके राजनीतिक और भौगोलिक समीकरणों में फिट बैठते हैं। इनमें सबसे बड़ा ऑफर तेलंगाना की मंत्री दसारी अनसुईया ने दिया, जो सरेंडर नक्सली हैं।

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तेलंगाना का 'सुरक्षित' किला: जब पुरानी दोस्ती ने बढ़ाया हाथ

कवासी लखमा के लिए पहला और सबसे मजबूत प्रस्ताव पड़ोसी राज्य तेलंगाना से आया है। तेलंगाना की ट्राइबल वेलफेयर मिनिस्टर दसारी अनसुईया (सिटक्का) ने लखमा को भद्राचलम में रहने का न्योता दिया है। सिटक्का ने वादा किया है कि लखमा को वहां पूरी सुरक्षा और सम्मान के साथ रखा जाएगा।

​क्यों खास है यह प्रस्ताव?

अनसुईया सिटक्का की कहानी खुद में किसी फिल्म से कम नहीं है। वे एक सरेंडर नक्सली हैं, जिन्होंने मुख्यधारा में लौटकर न केवल पीएचडी (Ph.D) की डिग्री हासिल की, बल्कि राजनीति में भी बड़ा मुकाम पाया। लखमा और सिटक्का के बीच गहरा राजनीतिक रिश्ता है। 

सिटक्का की मुलुगु विधानसभा सीट छत्तीसगढ़ बॉर्डर से लगी है और बताया जाता है कि उनके पिछले तीन चुनावों में कवासी लखमा ने पर्दे के पीछे से बड़ी मदद की थी। आज जब लखमा संकट में हैं, तो सिटक्का ने 'दोस्ती का कर्ज' चुकाने के लिए अपने राज्य के द्वार खोल दिए हैं। भद्राचलम से लखमा का पुश्तैनी गांव 'नागा रास' मात्र 165 किलोमीटर दूर है।

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ओडिशा का 'घर जैसा' अहसास: मलकानगिरी का विकल्प

दूसरा विकल्प ओडिशा से आया है। ओडिशा के मलकानगिरी जिला कांग्रेस अध्यक्ष चिट्टी भाई ने लखमा के प्रति अपनी निष्ठा जाहिर की है। उन्होंने उनके लिए अपना एक आवास खाली करने का प्रस्ताव दिया है। उन्होंने कहा है कि कवासी लखमा उनके बड़े भाई जैसे हैं और वे जब तक चाहें मलकानगिरी में रह सकते हैं।

​भौगोलिक लाभ

रणनीतिक रूप से यह विकल्प लखमा के लिए मुफीद माना जा रहा है। मलकानगिरी से लखमा का घर नागा रास महज 50 किलोमीटर की दूरी पर है। इतनी कम दूरी होने के कारण वे छत्तीसगढ़ की सीमा के बेहद करीब रहेंगे और उनके कार्यकर्ता व परिजन आसानी से उनसे मुलाकात कर सकेंगे।

 'मरईगुड़ा' का दांव: वोटरों के बीच रहने की अनूठी जुगत

लखमा के लिए तीसरा और सबसे दिलचस्प विकल्प मरईगुड़ा गांव है। यह गांव कोंटा विधानसभा क्षेत्र की सीमा पर स्थित है और भौगोलिक रूप से दो हिस्सों में बंटा हुआ है। इसका एक हिस्सा छत्तीसगढ़ में आता है, जबकि दूसरा हिस्सा तेलंगाना में है, जिसे 'मरेईगुड़ा वन' कहा जाता है।

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​राजनीतिक मायने

कवासी लखमा एक साल से अपने वोटरों से दूर हैं। यदि वे तेलंगाना वाले मरईगुड़ा में ठहरते हैं, तो वे  कोर्ट की शर्त का पालन करते हुए तकनीकी रूप से छत्तीसगढ़ से बाहर रहेंगे। लेकिन, व्यवहारिक रूप से अपने क्षेत्र के मतदाताओं के इतने करीब होंगे कि वे उनसे नियमित संवाद कर पाएंगे। यह विकल्प उनके राजनीतिक अस्तित्व को बचाए रखने के लिए मास्टरस्ट्रोक साबित हो सकता है।

फरवरी को रायपुर में पेशी और फिर 'अज्ञातवास'

​जानकारी के मुताबिक, छह फरवरी को रायपुर की विशेष अदालत में कवासी लखमा की पेशी होनी है। इस पेशी के बाद वे सीधे ओडिशा के मलकानगिरी के लिए रवाना हो सकते हैं। सूत्रों का कहना है कि लखमा किसी एक जगह स्थिर रहने के बजाय एक 'त्रिकोण' (Triangle) बनाएंगे। वे मलकानगिरी, भद्राचलम और मरईगुड़ा के बीच आवाजाही करते रहेंगे, जिससे वे अपने समर्थकों के संपर्क में भी रहें और सुरक्षा के लिहाज से भी सुरक्षित रहें।

​शराब घोटाला और 279 दिनों का संघर्ष

​छत्तीसगढ़ का शराब घोटाला प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा मोड़ लेकर आया था। प्रवर्तन निदेशालय (ED) और राज्य की जांच एजेंसियों ने इस मामले में कई रसूखदारों को घेरे में लिया। इसमें पूर्व आबकारी मंत्री लखमा सबसे बड़ा चेहरा थे। जेल में बिताए 279 दिनों के दौरान लखमा ने कई बार स्वास्थ्य और राजनीतिक आधार पर जमानत मांगी, लेकिन सफलता अब जाकर मिली है।

'निर्वासन' में भी जारी रहेगी सियासत?

भले ही सुप्रीम कोर्ट ने लखमा को छत्तीसगढ़ से बाहर रहने का आदेश दिया है, लेकिन उनके पास मौजूद ये तीन विकल्प बताते हैं कि लखमा को प्रदेश की सीमा से तो बाहर किया जा सकता है, पर बस्तर की राजनीति से दूर रखना नामुमकिन है। छत्तीसगढ़, तेलंगाना और ओडिशा के सीमावर्ती जिलों में उनकी जो पैठ है, वह उन्हें 'निर्वासन' में भी पावरफुल बनाए रखेगी। ​अब देखना यह है कि 6 फरवरी की पेशी के बाद जब लखमा मलकानगिरी की ओर रुख करेंगे, तो बस्तर की राजनीति में इसकी क्या गूंज सुनाई देगी।

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