एसबीआई जनरल इंश्योरेंस के हजारों मवेशी बीमा टैग गायब, क्या यह देशव्यापी बड़े फर्जीवाड़े की आहट है?

Harrison Masih | Feb 09, 2026, 15:38 IST
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देश के पांच राज्यों में एसबीआई जनरल इंश्योरेंस कंपनी के हजारों पशु बीमा टैग रहस्यमय तरीके से गायब हो गए हैं। ये टैग मवेशियों के बीमा की पहचान का सबसे अहम सबूत होते हैं। कंपनी ने इस मामले में भोपाल समेत पंजाब, कर्नाटक और तेलंगाना में एफआईआर दर्ज कराई है।

राजेश लाहोटी @रायपुर

NEWS IN SHORT

  • पशु बीमा के हजारों टैग्स गायब, पूरी की पूरी 'सीरीज' नदारद
  • ये सभी पशु बीमा टैग्स एसबीआई जनरल इंश्योरेंस कंपनी के थे
  • कंपनी ने देश के पांच राज्यों में कराई एफआईआर, इसमें भोपाल भी
  • हजारों टैग्स का गायब होना सामान्य घटना या सोची-समझी साजिश
  • बीमा विशेषज्ञों को अंदेशा, किसी संगठित गिरोह का हाथ

NEWS IN DETAIL

देश के ग्रामीण अंचलों में पशुधन को 'एटीएम' माना जाता है, लेकिन इसी एटीएम में अब सेंधमारी का एक ऐसा तरीका सामने आया है, जिसने बीमा कंपनियों और पुलिस की नींद उड़ा दी है।

एसबीआई जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड ने हाल ही में एक सार्वजनिक सूचना जारी कर यह स्वीकार किया है कि उनके मवेशी टैग (Cattle Tags) बड़ी संख्या में खो गए हैं।

जालंधर से लेकर मैसूरु और तेलंगाना से लेकर भोपाल तक दर्ज हुई एफआरईआर इस बात की तस्दीक कर रही हैं कि यह महज 'लापरवाही' नहीं, बल्कि एक संगठित अपराध या किसी बड़े बीमा घोटाले की पटकथा हो सकती है।

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Cattle insurance tag fraud
Cattle insurance tag fraud


​क्या होता है मवेशी टैग और क्यों है यह महत्वपूर्ण?

​किसी भी मवेशी (गाय, भैंस, बैल) का बीमा करते समय उसकी पहचान के लिए उसके कान में एक प्लास्टिक का 'ईयर टैग' (Ear Tag) लगाया जाता है। इस टैग पर एक विशिष्ट पहचान संख्या (Unique ID) होती है।

यह टैग ही वह सबूत है कि अमुक जानवर का बीमा हुआ है। अगर जानवर की मृत्यु होती है, तो बीमा राशि प्राप्त करने के लिए उस टैग के साथ मृत जानवर की तस्वीर अनिवार्य होती है।

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​हजारों टैग्स का गायब होना: सामान्य घटना या सोची-समझी साजिश?

​एक-दो टैग का गुम होना सामान्य प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन जब टैग्स की पूरी की पूरी 'सीरीज' गायब हो जाए और उसके लिए देश के पांच राज्यों में FIR दर्ज करानी पड़े, तो मामला संदेहास्पद हो जाता है। जानकारों का मानना है कि यह 'फर्जी क्लेम' के एक बड़े नेटवर्क की ओर इशारा है।

​संभावित फर्जीवाड़े का तरीका (Modus Operandi):

​नकली टैगिंग: अपराधी इन खोए हुए टैग्स को उन जानवरों के कानों में लगा देते हैं, जो या तो बीमार हैं या मरने वाले हैं।
​कागजी बीमा: कंपनी के रिकॉर्ड में इन टैग्स को 'एक्टिव' दिखाकर बिना किसी वास्तविक निरीक्षण के बीमा पॉलिसी जारी करवा ली जाती है।
​क्लेम का खेल: जानवर की मृत्यु होते ही, उस टैग के आधार पर बीमा कंपनी से 50,000 से 1,00,000 रुपए तक का क्लेम वसूल लिया जाता है।
​एक ही टैग का बार-बार इस्तेमाल: कई मामलों में देखा गया है कि टैग को काटकर दूसरे मृत जानवर में लगा दिया जाता है ताकि दोबारा क्लेम लिया जा सके।

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​जालंधर से खम्मम तक फैली कड़ियां

एसबीआई जनरल इंश्योरेंस (Insurance Company) द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, पंजाब (जालंधर), कर्नाटक (मैसूरु, बेल्लारी), तेलंगाना (खम्मम) और मध्य प्रदेश (भोपाल) में मामले दर्ज हुए हैं।

भौगोलिक रूप से इतनी दूरी यह दर्शाती है कि यह किसी एक व्यक्ति का काम नहीं है। इसमें स्थानीय एजेंट, पशु चिकित्सक और बिचौलियों का एक संगठित गठजोड़ शामिल हो सकता है।

​कंपनी ने 'सार्वजनिक सूचना' क्यों जारी की?

​कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि बीमा कंपनी ने यह नोटिस अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए जारी किया है। नोटिस में साफ कहा गया है कि इन टैग्स के दुरुपयोग के लिए कंपनी जिम्मेदार नहीं होगी।

इसका मतलब है कि ​यदि भविष्य में इन टैग्स के आधार पर कोई क्लेम आता है, तो कंपनी उसे तुरंत खारिज कर देगी। यह एक चेतावनी है कि जो भी व्यक्ति इन टैग्स का उपयोग कर रहा है, वह कानूनी कार्रवाई के घेरे में आएगा।

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किसानों और सरकार का नुकसान

​मवेशी बीमा अक्सर सरकारी योजनाओं (जैसे पशुधन बीमा योजना) के तहत रियायती दरों पर किया जाता है। यदि फर्जी क्लेम के माध्यम से करोड़ों रूपए निकाले जाते हैं, तो इसका सीधा असर सरकारी खजाने और उन ईमानदार किसानों पर पड़ता है, जिन्हें वास्तव में नुकसान के समय मदद नहीं मिल पाती। बीमा कंपनियों का लॉस रेशियो बढ़ने से प्रीमियम की दरें भी महंगी हो जाती हैं।

द सूत्र व्यू:

एसबीर्आ जनरल इंश्योरेंस के इन हजारों टैग्स का खोना सिर्फ प्रशासनिक विफलता नहीं है। इसकी गहराई से जांच होनी चाहिए कि ये टैग कंपनी की कस्टडी से निकले कैसे। क्या इसमें कंपनी के भीतर के लोग शामिल हैं? पुलिस को उन सभी पॉलिसी फाइलों की समीक्षा करनी चाहिए जहां इन सीरीज के टैग्स का जिक्र है।

​जब तक बीमा प्रक्रिया में पारदर्शिता और तकनीक का कड़ाई से पालन नहीं होगा, तब तक बेजुबान जानवरों के नाम पर 'टैग' का यह काला खेल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को खोखला करता रहेगा।

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