20 लाख पेड़ निकले लाख के 20 पेड़, इसी गफलत में लटक गई जलाशय परियोजना
Arun Tiwari | Jun 05, 2026, 11:45 IST
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छत्तीसगढ़ के गरियाबंद में अधिकारियों द्वारा लाख के 20-25 पेड़ों को 20 लाख पेड़ समझने की तकनीकी गफलत के कारण 45 साल पुरानी सल्फ जलाशय सिंचाई परियोजना अधूरी लटकी हुई है।
RAIPUR : एक गफलत कितनी भारी पड़ सकती है, इसका उदाहरण छत्तीसगढ़ में देखने को मिलता है। लाख के 20-25 पेड़ों को 20 लाख पेड़ समझ लिया गया और 45 साल पुरानी सिंचाई परियोजना अटैक गई। गरियाबंद जिले के आदिवासी अंचल मैनपुर में पिछले करीब 45 वर्षों से अधूरी पड़ी सल्फ जलाशय परियोजना एक बार फिर सुर्खियों में है।
क्षेत्र के किसानों और ग्रामीणों का दावा है कि जिस परियोजना से हजारों किसानों की किस्मत बदल सकती थी, वह महज 20 से 25 पेड़ों को लेकर उठे विवाद के कारण आज तक पूरी नहीं हो सकी। दूसरी ओर पर्यावरणीय नियमों और वन संरक्षण के सवालों ने भी इस महत्वाकांक्षी योजना को बार-बार अटका दिया।
मैनपुर से लगभग 7 किलोमीटर दूर स्थित सल्फ जलाशय परियोजना की शुरुआत वर्ष 1979-80 में मध्यम सिंचाई परियोजना के रूप में की गई थी। दो पहाड़ियों के बीच मिट्टी और पत्थरों से बने बांध के जरिए क्षेत्र में सिंचाई सुविधा विकसित करने का सपना देखा गया था।
शुरुआती वर्षों में निर्माण कार्य तेजी से आगे बढ़ा और परियोजना का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा पूरा भी हो गया। लेकिन मुख्य नहर और वितरण तंत्र के कुछ महत्वपूर्ण हिस्से अधूरे रह गए। इसके बाद परियोजना फाइलों और विवादों के जाल में उलझती चली गई।
स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि परियोजना से जुड़े निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने मौके पर मौजूद 20-25 लाख के बड़े पेड़ों को लाखों पेड़ों के बराबर बताकर पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया को जटिल बना दिया। ग्रामीणों का कहना है कि वास्तव में प्रभावित क्षेत्र में सीमित संख्या में पेड़ थे, लेकिन भाषा और तकनीकी शब्दावली की गलत व्याख्या के कारण मामला बड़ा बन गया।
इसके बाद पर्यावरणीय आपत्तियां बढ़ीं और परियोजना पर रोक जैसी स्थिति निर्मित हो गई। हालांकि पर्यावरण संरक्षण से जुड़े पक्षों का तर्क है कि किसी भी परियोजना में वन क्षेत्र और जैव विविधता के प्रभाव का आकलन जरूरी होता है। इसलिए मंजूरी की प्रक्रिया को केवल पेड़ों की संख्या तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। लेकिन किसानों का मानना है कि नियमों और कागजी प्रक्रियाओं के बीच उनकी सिंचाई की उम्मीदें लगातार कुचलती रही हैं।
यदि सल्फ जलाशय परियोजना पूरी हो जाती है तो इसका सबसे बड़ा लाभ मैनपुर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों को मिलेगा। अनुमान है कि करीब 2000 हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा उपलब्ध हो सकेगी। इससे फूलझर, मैनपुरकला, हरदीभाठा, गोहरापदर, जिड़ार और आसपास के कई गांवों के किसानों को फायदा पहुंचेगा।
वर्तमान में अधिकांश किसान वर्षा आधारित खेती पर निर्भर हैं। बारिश कम होने या समय पर नहीं होने की स्थिति में फसलें प्रभावित होती हैं और किसानों को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है। परियोजना पूरी होने पर धान के साथ-साथ दलहन, तिलहन और सब्जियों की खेती का दायरा बढ़ सकता है। इससे किसानों की आय में वृद्धि होने की संभावना है।
स्थायी सिंचाई साधनों की मांग को लेकर क्षेत्र के किसान लंबे समय से आंदोलन करते रहे हैं। ज्ञापन, धरना और जनप्रतिनिधियों के माध्यम से वे लगातार सरकार का ध्यान इस अधूरी परियोजना की ओर आकर्षित करते रहे हैं। किसानों का कहना है कि जलाशय बनने से खेती की तस्वीर बदल सकती है और पलायन जैसी समस्याओं पर भी अंकुश लगेगा।
स्थानीय लोगों का यह भी कहना है कि जब परियोजना का अधिकांश निर्माण कार्य पहले ही पूरा हो चुका है, तब शेष कार्यों को पूरा करने में प्रशासन को विशेष पहल करनी चाहिए। उनका तर्क है कि दशकों से खर्च किए गए संसाधनों का लाभ तभी मिलेगा जब परियोजना पूरी तरह चालू हो।
क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों का मानना है कि सल्फ जलाशय केवल सिंचाई परियोजना नहीं, बल्कि पूरे वनांचल के विकास की आधारशिला बन सकती है। उनका कहना है कि जल संरक्षण, कृषि उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए इस परियोजना का पूरा होना जरूरी है। उन्होंने सरकार से लंबित अनुमतियों और तकनीकी अड़चनों को जल्द दूर करने की मांग की है।
करीब साढ़े चार दशक से अधूरी पड़ी सल्फ जलाशय परियोजना आज भी हजारों किसानों के लिए उम्मीद का प्रतीक बनी हुई है। अब सवाल यह है कि क्या 45 साल का इंतजार खत्म होगा और खेतों तक पानी पहुंचेगा, या फिर यह परियोजना आने वाले वर्षों में भी फाइलों और विवादों के बीच भटकती रहेगी।
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क्षेत्र के किसानों और ग्रामीणों का दावा है कि जिस परियोजना से हजारों किसानों की किस्मत बदल सकती थी, वह महज 20 से 25 पेड़ों को लेकर उठे विवाद के कारण आज तक पूरी नहीं हो सकी। दूसरी ओर पर्यावरणीय नियमों और वन संरक्षण के सवालों ने भी इस महत्वाकांक्षी योजना को बार-बार अटका दिया।
यह है परियोजना:
शुरुआती वर्षों में निर्माण कार्य तेजी से आगे बढ़ा और परियोजना का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा पूरा भी हो गया। लेकिन मुख्य नहर और वितरण तंत्र के कुछ महत्वपूर्ण हिस्से अधूरे रह गए। इसके बाद परियोजना फाइलों और विवादों के जाल में उलझती चली गई।
पेड़ों की संख्या को लेकर बढ़ा विवाद:
इसके बाद पर्यावरणीय आपत्तियां बढ़ीं और परियोजना पर रोक जैसी स्थिति निर्मित हो गई। हालांकि पर्यावरण संरक्षण से जुड़े पक्षों का तर्क है कि किसी भी परियोजना में वन क्षेत्र और जैव विविधता के प्रभाव का आकलन जरूरी होता है। इसलिए मंजूरी की प्रक्रिया को केवल पेड़ों की संख्या तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। लेकिन किसानों का मानना है कि नियमों और कागजी प्रक्रियाओं के बीच उनकी सिंचाई की उम्मीदें लगातार कुचलती रही हैं।
2000 हेक्टेयर कृषि भूमि को मिल सकता है पानी:
बारिश के पानी पर निर्भरता:
वर्षों से आंदोलन कर रहे किसान:
स्थानीय लोगों का यह भी कहना है कि जब परियोजना का अधिकांश निर्माण कार्य पहले ही पूरा हो चुका है, तब शेष कार्यों को पूरा करने में प्रशासन को विशेष पहल करनी चाहिए। उनका तर्क है कि दशकों से खर्च किए गए संसाधनों का लाभ तभी मिलेगा जब परियोजना पूरी तरह चालू हो।
वनांचल के विकास से जुड़ी उम्मीदें:
करीब साढ़े चार दशक से अधूरी पड़ी सल्फ जलाशय परियोजना आज भी हजारों किसानों के लिए उम्मीद का प्रतीक बनी हुई है। अब सवाल यह है कि क्या 45 साल का इंतजार खत्म होगा और खेतों तक पानी पहुंचेगा, या फिर यह परियोजना आने वाले वर्षों में भी फाइलों और विवादों के बीच भटकती रहेगी।
FAQ
- सल्फ जलाशय परियोजना किस राज्य और जिले से संबंधित है?
उत्तर: यह परियोजना छत्तीसगढ़ राज्य के गरियाबंद जिले के आदिवासी बहुल अंचल मैनपुर में स्थित है। - सल्फ जलाशय परियोजना की शुरुआत किस वर्ष हुई थी और यह किस प्रकार की परियोजना है?
उत्तर: इस मध्यम सिंचाई परियोजना की शुरुआत वर्ष 1979-80 में हुई थी। यह लगभग 45 साल पुरानी परियोजना है। - सल्फ जलाशय परियोजना के पूरी होने से कुल कितने हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई का लाभ मिलेगा?
उत्तर: इस परियोजना के पूर्ण होने से क्षेत्र की लगभग 2000 हेक्टेयर कृषि भूमि को स्थायी सिंचाई सुविधा उपलब्ध हो सकेगी।
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