पत्रकारिता विवि में बैकडोर एंट्री ? SC की हरी झंडी से गई नौकरी, कुलपति बदलते ही बहाली

VINAY VERMA | Jun 05, 2026, 11:27 IST
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पत्रकारिता विश्वविद्यालय में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हटाए गए डॉ. शाहिद अली को नए कुलपति ने 'प्राकृतिक न्याय' का हवाला देकर बहाल कर दिया, जिससे बैकडोर एंट्री का बड़ा विवाद खड़ा हो गया है।

कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में डॉ. शाहिद अली की दोबारा एंट्री ने नया बवाल खड़ा कर दिया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह वापसी किसके आदेश पर हुई? छात्र, कर्मचारी और फैकल्टी पूछ रहे हैं कि क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेश से ऊपर भी कोई व्यवस्था काम कर रही है? जबकि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मनोज दयाल इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत बता रहे हैं। कुलपति का कहना है कि शाहिद अली को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए था। इसी आधार पर उन्हें सेवा में वापस लिया गया। बाहर रहते तो दस्तावेज नहीं दिखाते।

डॉ. शाहिद अली का भर्ती विवाद लंबा

डॉ. शाहिद अली की नियुक्ति लंबे समय से विवादों में रही है। उन पर फर्जी अनुभव प्रमाण पत्र और दस्तावेजों के आधार पर नौकरी हासिल करने के आरोप लगे थे। मामले की शिकायत विश्वविद्यालय के ही एक वरिष्ठ शिक्षक ने की थी। जांच और कानूनी प्रक्रिया के बाद विश्वविद्यालय ने उनकी सेवा समाप्त कर दी थी। बाद में मामला हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद विश्वविद्यालय ने सेवा समाप्ति की कार्रवाई को आगे बढ़ाया था। दस्तावेजों के आधार पर विश्वविद्यालय की तरफ से एफआईआर करने की भी अनुशंसा की गई है।

जांच के लिए दी ज्वाइनिंग

विवि के अनुसार सेवा समाप्ति के बाद शाहिद अली ने फिर हाई कोर्ट का रुख किया। जहां से उनके मामले को डिस्पोज करने का आदेश दिया गया। विवि के अनुसार इसका मतलब था, अंतिम निर्णय.. कुलपति बता रहे हैं कि मामले में दो अधिवक्ताओ से सलाह ली गई। जिसमे तय हुआ कि शाहिद अली को उनका पक्ष रखने दिया जाए। इसलिए उन्हें ज्वाइनिंग दे दी गई।

नया मेल, खुल गए कई राज

द सूत्र को वर्ष 2024 का एक महत्वपूर्ण ईमेल मिला है। ईमेल में विश्वविद्यालय की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पैरवी करने वाले अधिवक्ता और तत्कालीन कुलपति के बीच हुई बातचीत है। मेल में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के अंतिम आदेश के बाद विश्वविद्यालय शाहिद अली को सेवा से मुक्त करने या टर्मिनेट करने के लिए स्वतंत्र है। केवल एक शर्त थी कि उन्हें हाईकोर्ट से कोई नया अंतरिम संरक्षण प्राप्त न हुआ हो। यानी कानूनी सलाह साफ थी कि सेवा समाप्ति का रास्ता खुल चुका था। जिसके आधार पर उनकी सेवा समाप्ति की गई थी।

अचानक कैसे बदल गया पूरा खेल?

यहीं से पूरा मामला संदिग्ध हो जाता है। जिस व्यक्ति को हटाने के लिए विश्वविद्यालय कानूनी रूप से स्वतंत्र बताया जा रहा था, उसी व्यक्ति की कुछ समय बाद बहाली कर दी गई। इतना ही नहीं, बहाली का आदेश तत्कालीन कुलपति प्रो. मनोज दयाल के हस्ताक्षर से जारी हुआ। पुराने आदेश को निरस्त किया गया और शाहिद अली को तत्काल कार्यभार ग्रहण करने के निर्देश दे दिए गए।

Council unable to reach a decision
Council unable to reach a decision


पहली बार दोषी की बहाली

नियुक्ति को लेकर यह भी सवाल उठ रहा है कि आमतौर पर अधिकारी को दोषी पाए जाने पर उसे सेवा से बर्खास्त किया जाता है, ताकि वह किसी तरह से फाइल को गायब या संशोधन न कर सके, या जांच को प्रभावित न कर सके। लेकिन पहली बार ऐसा हो रहा है कि प्रबंधन किसी दोषी की सेवा बहाल कर रहा है जिससे उसका पक्ष सुना जा सके।


काउंसिल नहीं ले पाई निर्णय

उठ रहे सवालों के बाद 4 जून को विवि के एक्सक्यूटिव काउंसिल की बैठक हुई। जिसमें उनकी जांच के संबंध में निर्णय लिया जाना था। कुलपति प्रो. दयाल के अनुसार बैठक में कोई निर्णय नहीं लिया जा सका है। इसका मतलब है आगे उनकी सेवा जारी रहेगी। राजभवन को भी इसकी जानकारी नहीं दी गई है। जबकि नियमानुसार जानकारी देनी होती है। कुलपति का कहना है कि अभी अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। जबकि शाहिद अली को मई माह का वेतन भी मिल गया है।

कुलपति ने बदला कुलपति का आदेश

विश्वविद्यालय के भीतर सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की है। वर्ष 2024 में सेवा समाप्ति की कार्रवाई हुई। इसके बाद नेतृत्व बदला और कुछ समय बाद बहाली का आदेश सामने आ गया। सवाल उठ रहा है कि क्या दो वर्षों में ऐसा कौन-सा कानूनी बदलाव हुआ जिसने पूरे मामले की दिशा ही बदल दी? क्या सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला बदल दिया? क्या कोई नई न्यायिक राहत मिली? या फिर प्रशासनिक स्तर पर कोई नया रास्ता खोज लिया गया?

नोटशीट कहां है, मंजूरी किसकी है?

सबसे बड़ा विवाद प्रक्रिया को लेकर है। छात्र लगातार शाहिद अली की योग्यता पर सवाल उठा रहे हैं कि बहाली से जुड़ी नोटशीट कहां है? शासन स्तर से कौन-कौन सी स्वीकृतियां ली गईं? क्या राजभवन को इसकी जानकारी दी गई थी? विश्वविद्यालय अब तक कोई विस्तृत प्रशासनिक रिकॉर्ड सार्वजनिक नहीं कर पाया है। इसी वजह से बैकडोर एंट्री के आरोप और तेज हो गए हैं।

छात्र आंदोलन की तैयारी में

विश्वविद्यालय परिसर में इस फैसले को लेकर असंतोष बढ़ रहा है। छात्र संगठनों का कहना है कि यदि बहाली पूरी तरह नियमों के तहत हुई है तो पूरी फाइल सार्वजनिक की जाए। पिछले कई दिनों से छात्र दस्तावेज और प्रक्रिया की जानकारी मांग रहे हैं। जवाब नहीं मिलने पर आंदोलन की तैयारी शुरू हो गई है। कैंपस में चर्चा है कि यह मामला आने वाले दिनों में बड़ा विवाद बन सकता है।

शाहिद अली बोले- विवि मेरा है

इधर डॉ. शाहिद अली ने पूरे विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि कुछ लोग उनके पीछे पड़े हुए हैं। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय उनका भी है। लेकिन एक शासकीय कर्मचारी होने के कारण वह मीडिया में ज्यादा कुछ नहीं बोल सकते।

अब जवाब किसे देना है?

पूरा मामला अब सिर्फ एक कर्मचारी की बहाली तक सीमित नहीं रह गया है। सवाल विश्वविद्यालय प्रशासन की पारदर्शिता पर है। सवाल प्रक्रिया पर है। सवाल उन कानूनी रायों पर है जिनमें सेवा समाप्ति का रास्ता साफ बताया गया था। और सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद नौकरी खत्म हुई थी तो फिर उसकी वापसी किसके आदेश और किस नियम के तहत हुई? जब तक इन सवालों का जवाब सामने नहीं आता, पत्रकारिता विश्वविद्यालय में बैकडोर एंट्री का विवाद थमने वाला नहीं है।

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