4 जून का इतिहास: जानें कैसे हुई पत्रकारिता का नोबेल कहे जाने वाले Pulitzer Prize की शुरुआत
Kaushiki | Jun 04, 2026, 08:00 IST
Pulitzer Prize History
पुलित्जर पुरस्कार को पत्रकारिता और साहित्य की दुनिया का सबसे बड़ा सम्मान माना जाता है। इसकी शुरुआत साल 1917 में हुई थी। भारत के भी कई बेहतरीन पत्रकारों और लेखकों ने अपनी शानदार परफॉर्मेंस के दम पर इस बड़े ग्लोबल अवॉर्ड को अपने नाम किया है।
Pulitzer Prize History: दोस्तों, आज हम एक ऐसे प्रतिष्ठित अवॉर्ड की बात करने जा रहे हैं, जिसे मीडिया जगत का नोबेल पुरस्कार कहा जाता है। इस सर्वोच्च सम्मान का नाम है पुलित्जर पुरस्कार (Pulitzer Prize)। क्या आप जानते हैं कि इस बड़े पुरस्कार की शुरुआत कब हुई थी? इसकी कहानी बहुत ही दिलचस्प है। इसकी शुरुआत साल 1917 में हुई थी। तब से लेकर आज तक, हर साल दुनियाभर के बेहतरीन काम को इसके जरिए सराहा जाता है।
ये अवॉर्ड मेनली न्यूजपेपर जर्नलिज्म, लिटरेचर, मैगजीन और म्यूजिकल कम्पोजीशन के फिल्ड में दिया जाता है। इसकी नींव एक ऐसे इंसान ने रखी थी, जिसने खुद मीडिया की दुनिया में बड़ा बदलाव लाया था। उनका नाम था जोसेफ पुलित्जर। जोसेफ अमेरिका के एक बहुत ही बड़े समाचार पत्र प्रकाशक थे। उन्होंने अपनी वसीयत में इस पुरस्कार को शुरू करने की इच्छा जताई थी। आइए इस पुरस्कार के पीछे की पूरी कहानी जानें...
![जोसेफ पुलित्जर]()
पुलित्जर पुरस्कार के पीछे छिपे इतिहास को समझने के लिए हमें जोसेफ पुलित्जर के जीवन को जानना होगा। जोसेफ का जन्म हंगरी में हुआ था, लेकिन बाद में वे अमेरिका चले गए। अमेरिका जाकर उन्होंने मीडिया बिजनेस में अपनी एक अलग और बहुत मजबूत पहचान बनाई। वे न्यूयॉर्क वर्ल्ड नाम का एक बहुत ही फमस अखबार चलाते थे। उन्होंने अपने काम से खोजी पत्रकारिता (Investigative Journalism) को एक नई दिशा दी।
जोसेफ पुलित्जर का मानना था कि समाज को सही रास्ते पर रखने के लिए एक ईमानदार प्रेस का होना बहुत जरूरी है। वे चाहते थे कि जो पत्रकार देश में अच्छा काम कर रहे हैं, उन्हें मोटिवेट किया जाए। इसी सोच के साथ उन्होंने साल 1904 में अपनी वसीयत लिखी थी। उन्होंने अपनी संपत्ति का एक बहुत बड़ा हिस्सा कोलंबिया यूनिवर्सिटी को दान कर दिया था।
उन्होंने यूनिवर्सिटी से कहा था कि इस पैसे से एक जर्नलिज्म स्कूल खोला जाए। साथ ही हर साल प्रतिभावान लोगों को पुरस्कृत किया जाए। जोसेफ की मृत्यु साल 1911 में हो गई थी। इसके ठीक छह साल बाद यानी 4 जून 1917 को पहली बार पुलित्जर पुरस्कारों की घोषणा की गई। पहली बार यह पुरस्कार सिर्फ चार श्रेणियों में ही दिया गया था, लेकिन आज इसकी चमक पूरी दुनिया में फैल चुकी है।
![गोबिंद बिहारी लाल]()
जब भी पुलित्जर पुरस्कार का जिक्र होता है, तो हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। इसका कारण यह है कि भारत के कई जांबाज पत्रकारों ने इस विदेशी धरती पर जाकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। इस लिस्ट में सबसे पहला और ऐतिहासिक नाम आता है गोविंद बिहारी लाल का। गोविंद बिहारी लाल जी ये प्रतिष्ठित सम्मान पाने वाले पहले भारतीय और पहले एशियाई व्यक्ति थे।
गोविंद बिहारी लाल एक स्वतंत्रता सेनानी और बहुत ही शानदार पत्रकार थे। वे भारत की आजादी के लिए काम करने वाली गदर पार्टी के सक्रिय सदस्य भी रहे थे। बाद में वे पढ़ाई और काम के सिलसिले में अमेरिका चले गए थे। अमेरिका में उन्होंने साइंस जर्नलिज्म के क्षेत्र में बहुत ही बेहतरीन काम किया। वे कठिन वैज्ञानिक बातों को आम भाषा में लिखते थे।
![जानिए गोविंद बिहारी लाल, प्रतिष्ठित पुलित्जर पुरस्कार जीतने वाले पहले भारतीय - Moneycontrol.com]()
साल 1937 में उनके इसी बेहतरीन काम के लिए उन्हें पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्होंने सैन फ्रांसिस्को एक्जामिनर अखबार के लिए कई शानदार साइंस आर्टिकल्स लिखे थे। गोविंद बिहारी लाल ने यह साबित कर दिया था कि भारतीय पत्रकारों में वैश्विक स्तर पर बदलाव लाने की पूरी क्षमता है। उनका यह अवॉर्ड आज भी हर युवा पत्रकार के लिए एक बड़ी प्रेरणा है।
गोविंद बिहारी लाल के बाद भारत की कई अन्य प्रतिभाओं ने भी इस अवॉर्ड पर अपना कब्जा जमाया। साल 2000 में भारतीय मूल की मशहूर लेखिका झुंपा लाहिड़ी को यह सम्मान मिला। झुंपा लाहिड़ी को उनकी पहली ही किताब 'इंटरप्रेटर ऑफ मैलाडीज' (Interpreter of Maladies) के लिए पुलित्जर पुरस्कार दिया गया था। यह उनकी कहानियों का एक बहुत ही खूबसूरत कलेक्शन था।
![झुंपा लाहिड़ी]()
झुंपा लाहिड़ी ने फिक्शन कैटेगरी में यह अवॉर्ड जीतकर पूरी दुनिया को अपनी लेखन शैली का दीवाना बना दिया। उनकी कहानियों में भारतीय प्रवासियों के जीवन के संघर्ष और उनकी भावनाओं को बहुत करीब से दिखाया गया था। इसके बाद साल 2003 में एक और भारतीय नाम ग्लोबल मीडिया में गूंजा, वो नाम था गीता आनंद का। गीता आनंद एक बेहतरीन खोजी पत्रकार हैं।
![गीता आनंद]()
गीता आनंद को साल 2003 में वॉल स्ट्रीट जर्नल के अन्य साथियों के साथ संयुक्त रूप से यह पुरस्कार मिला था। उन्होंने कॉरपोरेट जगत और सरकारी विभागों में होने वाले भ्रष्टाचार को उजागर किया था। उनकी इस कमाल की रिपोर्टिंग के कारण अमेरिका में कई बड़े प्रशासनिक सुधार करने पड़े थे। गीता आनंद ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खोजी पत्रकारिता के नए मानक स्थापित किए थे।
सिद्धार्थ मुखर्जी और
![लेखक सिद्धार्थ मुखर्जी]()
साल 2011 में भारतीय मूल के अमेरिकी डॉक्टर और लेखक सिद्धार्थ मुखर्जी ने यह अवॉर्ड जीता। उन्हें उनकी बेहतरीन किताब 'द एम्परर ऑफ ऑल मैलाडीज: अ बायोग्राफी ऑफ कैंसर' के लिए यह पुरस्कार मिला था। इस किताब में उन्होंने कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के इतिहास और उसके इलाज के संघर्ष को बहुत ही सरल तरीके से दुनिया के सामने रखा था।
इसके बाद नाम आता है फोटो जर्नलिज्म की दुनिया के बेताज बादशाह दानिश सिद्दीकी का। दानिश सिद्दीकी को एक नहीं बल्कि दो बार पुलित्जर पुरस्कार से नवाजा गया। पहली बार उन्हें साल 2018 में रोहिंग्या शरणार्थी संकट की मर्मस्पर्शी तस्वीरें खींचने के लिए यह अवॉर्ड मिला था। उनकी तस्वीरों ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया था।
![दानिश सिद्दीकी]()
इसके बाद साल 2022 में दानिश सिद्दीकी को मरणोपरांत (Posthumously) दूसरी बार पुलित्जर पुरस्कार दिया गया। उन्हें यह सम्मान भारत में कोरोना महामारी के दौरान खींची गई तस्वीरों के लिए मिला था। दानिश सिद्दीकी की साल 2021 में अफगानिस्तान में कवरेज के दौरान मौत हो गई थी। उनकी खींची हर एक तस्वीर समाज का एक कड़वा और सच्चा आईना दिखाती थी।
![Pulitzer Prize 2022: भारत के अमित दवे, दानिश सिद्दिकी समेत कई पत्रकारों को मिला पुलित्जर अवॉर्ड, देखिए पूरी लिस्ट - pulitzer prize 2022 amit dave danish siddiqui and other ...]()
साल 2022 का पुलित्जर पुरस्कार भारत के लिए बेहद खास रहा था। इस साल दानिश सिद्दीकी के साथ-साथ तीन अन्य भारतीय फोटोग्राफर्स को भी इस सर्वोच्च सम्मान से नवाजा गया था। इन विजेताओं के नाम अदनान आबिदी, सना इर्शाद मट्टू और अमित दवे हैं। इन सभी को फीचर फोटोग्राफी कैटेगरी में यह अवॉर्ड दिया गया था।
इन सभी फोटोग्राफर्स ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स के लिए काम करते हुए भारत में कोविड-19 संकट की कवरेज की थी। उन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए अस्पतालों और श्मशान घाटों की जमीनी हकीकत को कैमरे में कैद किया था। सना इर्शाद मट्टू कश्मीर की रहने वाली हैं और उन्होंने वहां के जमीनी हालातों को पूरी दुनिया के सामने रखा था। इन युवा पत्रकारों के काम ने यह साबित किया कि भारतीय मीडिया कर्मी किसी भी विपरीत परिस्थिति में सच सामने लाने से पीछे नहीं हटते।
![Pulitzer Prize - Wikipedia]()
क्या ये अवॉर्ड सिर्फ अमेरिकियों को मिलता है
![Pulitzer News | The Pulitzer Prizes]()
कब और कैसे चुने जाते हैं विजेता?
हर साल दिसंबर और जनवरी के बीच इस अवॉर्ड के लिए एंट्रीज भेजी जाती हैं। कोलंबिया यूनिवर्सिटी द्वारा अलग-अलग क्षेत्रों के एक्सपर्ट्स की ज्यूरी बनाई जाती है।
यह ज्यूरी हर कैटेगरी में से टॉप 3 नामों को चुनती है। आखिरी फैसला पुलित्जर प्राइज बोर्ड लेता है। हर साल अप्रैल या मई के महीने में इन विजेताओं के नामों की घोषणा की जाती है।
समय के साथ कैसे बदला पुलित्जर
![Three alumni win Pulitzer Prizes, five others named finalists | Yale News]()
शुरुआत में ये केवल कुछ ही कैटेगरीज में दिया जाता था। लेकिन वक्त के साथ इसमें कई नए डिपार्टमेंट्स भी जोड़ दिए गए। आज यह पूरी दुनिया में सच्चाई और निष्पक्ष पत्रकारिता का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुका है।
पुलित्जर पुरस्कार आज भी दुनियाभर के पत्रकारों के लिए एक सपना जैसा है। ये अवॉर्ड हमें सिखाता है कि कलम और कैमरे की ताकत से दुनिया को बदला जा सकता है। भारत के इन सभी विजेताओं ने देश का नाम इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज करा दिया है।
आज का इतिहास मेंहर दिन का अपना एक अलग महत्व होता है। 04 जून का दिन भी इतिहास (आज की यादगार घटनाएं) में कई महत्वपूर्ण घटनाओं के लिए दर्ज है। इस दिन दुनिया में कई ऐसी घटनाएं हुईं, जिन्होंने इतिहास की दिशा बदल दी।
आइए जानते हैं 04 जून (आज की तारीख का इतिहास) को भारत और विश्व में घटी कुछ प्रमुख घटनाओं के बारे में, जो आपके सामान्य ज्ञान को बढ़ा सकती हैं- हिंदी भाषा सम्मान होल्कर साम्राज्य
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ये अवॉर्ड मेनली न्यूजपेपर जर्नलिज्म, लिटरेचर, मैगजीन और म्यूजिकल कम्पोजीशन के फिल्ड में दिया जाता है। इसकी नींव एक ऐसे इंसान ने रखी थी, जिसने खुद मीडिया की दुनिया में बड़ा बदलाव लाया था। उनका नाम था जोसेफ पुलित्जर। जोसेफ अमेरिका के एक बहुत ही बड़े समाचार पत्र प्रकाशक थे। उन्होंने अपनी वसीयत में इस पुरस्कार को शुरू करने की इच्छा जताई थी। आइए इस पुरस्कार के पीछे की पूरी कहानी जानें...
जोसेफ पुलित्जर
कौन थे जोसेफ पुलित्जर
जोसेफ पुलित्जर का मानना था कि समाज को सही रास्ते पर रखने के लिए एक ईमानदार प्रेस का होना बहुत जरूरी है। वे चाहते थे कि जो पत्रकार देश में अच्छा काम कर रहे हैं, उन्हें मोटिवेट किया जाए। इसी सोच के साथ उन्होंने साल 1904 में अपनी वसीयत लिखी थी। उन्होंने अपनी संपत्ति का एक बहुत बड़ा हिस्सा कोलंबिया यूनिवर्सिटी को दान कर दिया था।
उन्होंने यूनिवर्सिटी से कहा था कि इस पैसे से एक जर्नलिज्म स्कूल खोला जाए। साथ ही हर साल प्रतिभावान लोगों को पुरस्कृत किया जाए। जोसेफ की मृत्यु साल 1911 में हो गई थी। इसके ठीक छह साल बाद यानी 4 जून 1917 को पहली बार पुलित्जर पुरस्कारों की घोषणा की गई। पहली बार यह पुरस्कार सिर्फ चार श्रेणियों में ही दिया गया था, लेकिन आज इसकी चमक पूरी दुनिया में फैल चुकी है।
गोबिंद बिहारी लाल
भारत का नाम ग्लोबल स्टेज पर चमकाने वाले पहले भारतीय
गोविंद बिहारी लाल एक स्वतंत्रता सेनानी और बहुत ही शानदार पत्रकार थे। वे भारत की आजादी के लिए काम करने वाली गदर पार्टी के सक्रिय सदस्य भी रहे थे। बाद में वे पढ़ाई और काम के सिलसिले में अमेरिका चले गए थे। अमेरिका में उन्होंने साइंस जर्नलिज्म के क्षेत्र में बहुत ही बेहतरीन काम किया। वे कठिन वैज्ञानिक बातों को आम भाषा में लिखते थे।
जानिए गोविंद बिहारी लाल, प्रतिष्ठित पुलित्जर पुरस्कार जीतने वाले पहले भारतीय - Moneycontrol.com
साल 1937 में उनके इसी बेहतरीन काम के लिए उन्हें पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्होंने सैन फ्रांसिस्को एक्जामिनर अखबार के लिए कई शानदार साइंस आर्टिकल्स लिखे थे। गोविंद बिहारी लाल ने यह साबित कर दिया था कि भारतीय पत्रकारों में वैश्विक स्तर पर बदलाव लाने की पूरी क्षमता है। उनका यह अवॉर्ड आज भी हर युवा पत्रकार के लिए एक बड़ी प्रेरणा है।
झुंपा लाहिड़ी और गीता आनंद
झुंपा लाहिड़ी
झुंपा लाहिड़ी ने फिक्शन कैटेगरी में यह अवॉर्ड जीतकर पूरी दुनिया को अपनी लेखन शैली का दीवाना बना दिया। उनकी कहानियों में भारतीय प्रवासियों के जीवन के संघर्ष और उनकी भावनाओं को बहुत करीब से दिखाया गया था। इसके बाद साल 2003 में एक और भारतीय नाम ग्लोबल मीडिया में गूंजा, वो नाम था गीता आनंद का। गीता आनंद एक बेहतरीन खोजी पत्रकार हैं।
गीता आनंद
गीता आनंद को साल 2003 में वॉल स्ट्रीट जर्नल के अन्य साथियों के साथ संयुक्त रूप से यह पुरस्कार मिला था। उन्होंने कॉरपोरेट जगत और सरकारी विभागों में होने वाले भ्रष्टाचार को उजागर किया था। उनकी इस कमाल की रिपोर्टिंग के कारण अमेरिका में कई बड़े प्रशासनिक सुधार करने पड़े थे। गीता आनंद ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खोजी पत्रकारिता के नए मानक स्थापित किए थे।
सिद्धार्थ मुखर्जी और दानिश सिद्दीकी
लेखक सिद्धार्थ मुखर्जी
साल 2011 में भारतीय मूल के अमेरिकी डॉक्टर और लेखक सिद्धार्थ मुखर्जी ने यह अवॉर्ड जीता। उन्हें उनकी बेहतरीन किताब 'द एम्परर ऑफ ऑल मैलाडीज: अ बायोग्राफी ऑफ कैंसर' के लिए यह पुरस्कार मिला था। इस किताब में उन्होंने कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के इतिहास और उसके इलाज के संघर्ष को बहुत ही सरल तरीके से दुनिया के सामने रखा था।
इसके बाद नाम आता है फोटो जर्नलिज्म की दुनिया के बेताज बादशाह दानिश सिद्दीकी का। दानिश सिद्दीकी को एक नहीं बल्कि दो बार पुलित्जर पुरस्कार से नवाजा गया। पहली बार उन्हें साल 2018 में रोहिंग्या शरणार्थी संकट की मर्मस्पर्शी तस्वीरें खींचने के लिए यह अवॉर्ड मिला था। उनकी तस्वीरों ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया था।
दानिश सिद्दीकी
इसके बाद साल 2022 में दानिश सिद्दीकी को मरणोपरांत (Posthumously) दूसरी बार पुलित्जर पुरस्कार दिया गया। उन्हें यह सम्मान भारत में कोरोना महामारी के दौरान खींची गई तस्वीरों के लिए मिला था। दानिश सिद्दीकी की साल 2021 में अफगानिस्तान में कवरेज के दौरान मौत हो गई थी। उनकी खींची हर एक तस्वीर समाज का एक कड़वा और सच्चा आईना दिखाती थी।
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साल 2022 के अन्य भारतीय विजेता
इन सभी फोटोग्राफर्स ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स के लिए काम करते हुए भारत में कोविड-19 संकट की कवरेज की थी। उन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए अस्पतालों और श्मशान घाटों की जमीनी हकीकत को कैमरे में कैद किया था। सना इर्शाद मट्टू कश्मीर की रहने वाली हैं और उन्होंने वहां के जमीनी हालातों को पूरी दुनिया के सामने रखा था। इन युवा पत्रकारों के काम ने यह साबित किया कि भारतीय मीडिया कर्मी किसी भी विपरीत परिस्थिति में सच सामने लाने से पीछे नहीं हटते।
Pulitzer Prize - Wikipedia
पुलित्जर पुरस्कार की कुछ जरूरी बातें
- इस अवॉर्ड को लेकर अक्सर लोगों में एक भ्रम रहता है। नियम के मुताबिक, पत्रकारिता की श्रेणियों में अवॉर्ड केवल उन्हीं को मिल सकता है जिन्होंने अमेरिका के किसी अखबार, मैगजीन या डिजिटल न्यूज साइट के लिए काम किया हो, चाहे उनकी नागरिकता कोई भी हो।
- जैसे दानिश सिद्दीकी भारतीय नागरिक थे लेकिन उन्होंने अमेरिकी एजेंसी रॉयटर्स के लिए काम किया। वहीं दूसरी तरफ, साहित्य, नाटक और संगीत की श्रेणियों में अवॉर्ड पाने के लिए व्यक्ति का अमेरिकी नागरिक होना अनिवार्य है।
- सर्टिफिकेट और कैश प्राइज: पुलित्जर पुरस्कार की 22 श्रेणियों में से 21 श्रेणियों के विजेताओं को एक प्रमाण पत्र और 15 हजार अमेरिकी डॉलर (लगभग 12.5 लाख रुपए) का नकद इनाम दिया जाता है।
- पब्लिक सर्विस का गोल्ड मेडल: पत्रकारिता में सबसे बड़ा सम्मान पब्लिक सर्विस कैटेगरी को माना जाता है। इस कैटेगरी के विजेता को कैश नहीं, बल्कि एक प्रतिष्ठित गोल्ड मेडल दिया जाता है। इस मेडल पर एक तरफ बेंजामिन फ्रैंकलिन का चेहरा बना होता है।
Pulitzer News | The Pulitzer Prizes
कब और कैसे चुने जाते हैं विजेता?
हर साल दिसंबर और जनवरी के बीच इस अवॉर्ड के लिए एंट्रीज भेजी जाती हैं। कोलंबिया यूनिवर्सिटी द्वारा अलग-अलग क्षेत्रों के एक्सपर्ट्स की ज्यूरी बनाई जाती है।
यह ज्यूरी हर कैटेगरी में से टॉप 3 नामों को चुनती है। आखिरी फैसला पुलित्जर प्राइज बोर्ड लेता है। हर साल अप्रैल या मई के महीने में इन विजेताओं के नामों की घोषणा की जाती है।
समय के साथ कैसे बदला पुलित्जर
- शुरुआत: 1917 में जब यह शुरू हुआ था, तब केवल 4 श्रेणियों में अवॉर्ड दिए गए थे।
- डिजिटल मीडिया की एंट्री: पहले यह सिर्फ प्रिंट मीडिया (अखबारों) तक सीमित था। लेकिन साल 2008 से इसमें ऑनलाइन और डिजिटल जर्नलिज्म (न्यूज वेबसाइट्स) को भी शामिल कर लिया गया।
- ऑडियो जर्नलिज्म: साल 2020 में एक नई कैटेगरी 'ऑडियो रिपोर्टिंग' (Audio Reporting) जोड़ी गई, जो पॉडकास्ट और रेडियो इनवेस्टिगेशन के लिए दी जाती है।
Three alumni win Pulitzer Prizes, five others named finalists | Yale News
कुछ ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स
- मरणोपरांत अवॉर्ड (Posthumous Awards): यह अवॉर्ड किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद भी दिया जा सकता है, जैसा कि भारत के फोटो पत्रकार दानिश सिद्दीकी के साथ साल 2022 में हुआ।
- सबसे ज्यादा बार अवॉर्ड: अमेरिका के मशहूर कवि 'रॉबर्ट फ्रॉस्ट' (Robert Frost) को कविता (Poetry) के क्षेत्र में रिकॉर्ड 4 बार पुलित्जर पुरस्कार मिला है।
- स्पेशल सिटेशन (Special Citation): कभी-कभी बोर्ड किसी ऐसे व्यक्ति या संस्था को भी सम्मानित करता है जो किसी तय कैटेगरी में फिट नहीं बैठते, लेकिन उनका काम ऐतिहासिक होता है।
- जैसे 2021 में डार्नेला फ्रेजियर को सम्मानित किया गया था, जिन्होंने जॉर्ज फ्लॉयड की मौत का मोबाइल वीडियो रिकॉर्ड किया था, जिससे पूरी दुनिया में ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन शुरू हुआ था।
शुरुआत में ये केवल कुछ ही कैटेगरीज में दिया जाता था। लेकिन वक्त के साथ इसमें कई नए डिपार्टमेंट्स भी जोड़ दिए गए। आज यह पूरी दुनिया में सच्चाई और निष्पक्ष पत्रकारिता का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुका है।
पुलित्जर पुरस्कार आज भी दुनियाभर के पत्रकारों के लिए एक सपना जैसा है। ये अवॉर्ड हमें सिखाता है कि कलम और कैमरे की ताकत से दुनिया को बदला जा सकता है। भारत के इन सभी विजेताओं ने देश का नाम इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज करा दिया है।
4 जून की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाएं
आइए जानते हैं 04 जून (आज की तारीख का इतिहास) को भारत और विश्व में घटी कुछ प्रमुख घटनाओं के बारे में, जो आपके सामान्य ज्ञान को बढ़ा सकती हैं- हिंदी भाषा सम्मान होल्कर साम्राज्य
विश्व और भारत इतिहास की प्रमुख घटनाएं...
- 1917: पत्रकारिता के प्रतिष्ठित पुलित्जर पुरस्कार की शुरुआत हुई और यह पहली बार दिए गए।
- 2001: नेपाल के नरेश दीपेन्द्र का अस्पताल में निधन हुआ और ज्ञानेन्द्र की ताजपोशी के विरोध में हिंसा भड़की।
- 2003: डोमीनिक गणराज्य की 18 वर्षीय सुन्दरी एमीलिया वेगा 'मिस यूनीवर्स 2003' चुनी गईं।
- 2005: लालकृष्ण आडवाणी ने पाकिस्तान के कराची में मोहम्मद जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति बताया।
- 2006: यूगोस्लाविया के पूर्व गणराज्य मोंटेनेग्रो ने दुनिया के सामने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की।
- 2007: चीन के उपप्रधानमंत्री हांग चू का निधन हुआ और ब्राजील के राष्ट्रपति को नेहरू पुरस्कार मिला।
- 2008: हरियाणा सरकार ने पारिवारिक पेंशन का लाभ 25 वर्ष से कम उम्र की बेटियों को भी देने का फैसला किया।
- 2008: बराक ओबामा ने हिलेरी क्लिंटन को पछाड़ते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवारी जीती।
- 2011: गैलप के सर्वेक्षण में खुलासा हुआ कि भारतीय लोग आर्थिक वृद्धि से ज्यादा पर्यावरण रक्षा को प्राथमिकता देते हैं।
- 2011: नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री डॉ. अमर्त्य सेन ने पश्चिमी देशों को भारत और चीन से सीख लेने की सलाह दी।
- 1988: भारत के मशहूर पैरा बैडमिंटन खिलाड़ी प्रवीण भगत का जन्म हुआ था।
- 1948: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वरिष्ठ और जाने-माने नेता अनिल शास्त्री का जन्म हुआ था।
- 1946: भारतीय सिनेमा के सबसे प्रसिद्ध और दिग्गज पार्श्वगायकों में से एक एस. पी. बालासुब्रमण्यम का जन्म हुआ था।
- 1936: हिन्दी सिनेमा जगत की सबसे खूबसूरत और प्रसिद्ध अभिनेत्रियों में से एक नूतन का जन्म हुआ था।
- 2018: मॉरीशस में हिन्दी कथा साहित्य के सम्राट कहे जाने वाले साहित्यकार अभिमन्यु अनत का निधन हुआ।
- 2016: हिन्दी और मराठी फ़िल्मों की बेहतरीन भारतीय चरित्र अभिनेत्री सुलभा देशपांडे का निधन हुआ था।
- 1962: भारत में आयुर्वेदिक औषधियों के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए प्रसिद्ध अचंत लक्ष्मीपति का निधन हुआ था।
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