लोकमाता हासी देवी की जयंती पर 200 का सिक्का जारी करेंगी राष्ट्रपति, बस्तर के मुरिया दरबार में भी होंगी शामिल
Arun Tiwari | Oct 22, 2026, 11:23 IST
छत्तीसगढ़ के दौरे पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू
Raipur. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू दो दिवसीय छत्तीसगढ़ दौरे पर हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर और बस्तर अंचल के लिए यह एक ऐतिहासिक मौका है। इस दो दिवसीय विशेष प्रवास के दौरान राष्ट्रपति रायपुर में शदाणी दरबार की पंचम पीठाधीश, महान आध्यात्मिक संत और लोकमाता के रूप में पूजनीय माता साहिब हासी देवी की 200वीं जयंती के अवसर पर एक विशेष स्मारक सिक्का और डाक टिकट जारी करेंगी।
इसके साथ ही, वे अगले दिन जगदलपुर पहुंचकर बस्तर की अनूठी संस्कृति और प्राचीन लोकतांत्रिक परंपरा के प्रतीक 'मुरिया दरबार' में भी शामिल होंगी।
माता साहिब हासी देवी सिंधी समाज की एक महान आध्यात्मिक संत, तपस्विनी और रायपुर स्थित प्रसिद्ध 'शदाणी दरबार' की पंचम पीठाधीश्वर थीं। उनका जन्म वर्ष 1826 में सिंध प्रांत के खानपुर महर में हुआ था। उनका प्रारंभिक जीवन ही ईश्वर की भक्ति, परोपकार और मानव सेवा के प्रति समर्पित था।
सन् 1852 में मात्र 26 वर्ष की आयु में वे शदाणी दरबार की पहली महिला पीठाधीश्वर बनीं और लगभग 57 वर्षों तक इस पद पर रहते हुए समाज को सही दिशा दिखाई। माता हासी देवी को त्याग, तपस्या और सेवा की प्रतिमूर्ति माना जाता है। उन्होंने अपना पूरा जीवन भजन-कीर्तन, जरूरतमंदों की सहायता और समाज में नैतिक मूल्यों के प्रसार के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने शिक्षा और संस्कारों के महत्व को समझते हुए हिंदी, संस्कृत और संगीत शिक्षा के विकास में विशेष योगदान दिया।
सिंधी समाज और उनके अनुयायियों के बीच माता हासी देवी को लेकर गहरी आस्था है। इतिहास और लोकमान्यताओं के अनुसार, उनके जीवनकाल में कई ऐसे प्रसंग आए, जब उन्होंने अकाल और संकट के दौर में गरीबों और बेसहारा लोगों की भरपूर सहायता की। उनके आशीर्वाद से जुड़े कई संस्मरण आज भी श्रद्धालुओं के बीच प्रेरणा के स्रोत हैं। 30 अप्रैल 1909 को उन्होंने महाप्रयाण किया, लेकिन उनकी दी हुई शिक्षाएं आज भी मानवता का मार्ग प्रशस्त कर रही हैं।
उनकी इस द्विशताब्दी जयंती पर केंद्र सरकार द्वारा 35 ग्राम वजनी 200 रुपये का विशेष स्मारक सिक्का जारी करना उनके महान कार्यों को राष्ट्रीय स्तर पर सच्ची श्रद्धांजलि है। इस सिक्के में 50 प्रतिशत चांदी, 40 प्रतिशत तांबा, 5 प्रतिशत निकल और 5 प्रतिशत जस्ता शामिल है।
रायपुर के कार्यक्रमों के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू बस्तर संभाग के मुख्यालय जगदलपुर जाएंगी, जहां वे विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरे के ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण हिस्से माने जाने वाले 'मुरिया दरबार' में हिस्सा लेंगी।
बस्तर दशहरा देश का सबसे लंबा, यानी लगभग 75 दिनों तक चलने वाला अनूठा पर्व है, जो रावण वध की बजाय मां दंतेश्वरी और स्थानीय देवी-देवताओं की आराधना को समर्पित होता है। इसी बस्तर दशहरे का एक अत्यंत विशिष्ट और गौरवशाली अंग मुरिया दरबार है।
मुरिया दरबार की परंपरा रियासत काल से चली आ रही है। यह एक ऐसा पारंपरिक और अनूठा मंच है, जो राजा और प्रजा के बीच सीधे संवाद तथा लोकतंत्र की प्राचीन भारतीय भावना का परिचायक है। ऐतिहासिक रूप से, इस दरबार में बस्तर रियासत के राजा विभिन्न परगनों के मांझी, चालकी, पा, मेनिया और आदिवासी समुदायों के प्रमुख प्रतिनिधियों व अन्य लोगों से सीधा संवाद करते थे। ग्रामीण अपने इलाके की समस्याओं, जनता की जरूरतों, खेती-किसानी और समुदाय से जुड़े मुद्दों को खुलकर राजा के सामने रखते थे। राजा और प्रशासक मिलकर उनका समाधान निकालते थे।
समय बदलने के साथ राजशाही व्यवस्था समाप्त हो गई, किंतु बस्तर की यह लोक-परंपरा आज भी पूरी जीवंतता के साथ कायम है। आज के समय में इस दरबार में जनप्रतिनिधि, जिला प्रशासन के अधिकारी और बस्तर के दूर-दराज के अंचलों से आए आदिवासी समाज के प्रतिनिधि तथा मांझी-चालकी एकत्र होते हैं। यहां बस्तर के पारंपरिक विकास, उसकी संस्कृति के संरक्षण और क्षेत्रीय समस्याओं पर गंभीर चर्चा होती है। जगदलपुर के ऐतिहासिक सिरहासार भवन में आयोजित होने वाला यह मुरिया दरबार इस बात का जीवंत उदाहरण है कि बस्तर के मूल निवासी अपनी संस्कृति, परंपरा और लोकतांत्रिक भागीदारी के प्रति कितने सजग हैं।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का इन दोनों आयोजनों में शामिल होना खास है। एक ओर आध्यात्मिक संत माता साहिब हासी देवी की 200वीं जयंती पर स्मारक सिक्का और डाक टिकट जारी किया जाएगा, तो दूसरी ओर वे बस्तर की आदिवासी संस्कृति के केंद्र मुरिया दरबार में शामिल होंगी। ये दोनों आयोजन देश की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विविधता को और अधिक मजबूती प्रदान करते हैं।
कौन थीं माता साहिब हासी देवी?
सन् 1852 में मात्र 26 वर्ष की आयु में वे शदाणी दरबार की पहली महिला पीठाधीश्वर बनीं और लगभग 57 वर्षों तक इस पद पर रहते हुए समाज को सही दिशा दिखाई। माता हासी देवी को त्याग, तपस्या और सेवा की प्रतिमूर्ति माना जाता है। उन्होंने अपना पूरा जीवन भजन-कीर्तन, जरूरतमंदों की सहायता और समाज में नैतिक मूल्यों के प्रसार के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने शिक्षा और संस्कारों के महत्व को समझते हुए हिंदी, संस्कृत और संगीत शिक्षा के विकास में विशेष योगदान दिया।
सिंधी समाज और उनके अनुयायियों के बीच माता हासी देवी को लेकर गहरी आस्था है। इतिहास और लोकमान्यताओं के अनुसार, उनके जीवनकाल में कई ऐसे प्रसंग आए, जब उन्होंने अकाल और संकट के दौर में गरीबों और बेसहारा लोगों की भरपूर सहायता की। उनके आशीर्वाद से जुड़े कई संस्मरण आज भी श्रद्धालुओं के बीच प्रेरणा के स्रोत हैं। 30 अप्रैल 1909 को उन्होंने महाप्रयाण किया, लेकिन उनकी दी हुई शिक्षाएं आज भी मानवता का मार्ग प्रशस्त कर रही हैं।
उनकी इस द्विशताब्दी जयंती पर केंद्र सरकार द्वारा 35 ग्राम वजनी 200 रुपये का विशेष स्मारक सिक्का जारी करना उनके महान कार्यों को राष्ट्रीय स्तर पर सच्ची श्रद्धांजलि है। इस सिक्के में 50 प्रतिशत चांदी, 40 प्रतिशत तांबा, 5 प्रतिशत निकल और 5 प्रतिशत जस्ता शामिल है।
बस्तर के मुरिया दरबार की ऐतिहासिक परंपरा
बस्तर दशहरा देश का सबसे लंबा, यानी लगभग 75 दिनों तक चलने वाला अनूठा पर्व है, जो रावण वध की बजाय मां दंतेश्वरी और स्थानीय देवी-देवताओं की आराधना को समर्पित होता है। इसी बस्तर दशहरे का एक अत्यंत विशिष्ट और गौरवशाली अंग मुरिया दरबार है।
मुरिया दरबार की परंपरा रियासत काल से चली आ रही है। यह एक ऐसा पारंपरिक और अनूठा मंच है, जो राजा और प्रजा के बीच सीधे संवाद तथा लोकतंत्र की प्राचीन भारतीय भावना का परिचायक है। ऐतिहासिक रूप से, इस दरबार में बस्तर रियासत के राजा विभिन्न परगनों के मांझी, चालकी, पा, मेनिया और आदिवासी समुदायों के प्रमुख प्रतिनिधियों व अन्य लोगों से सीधा संवाद करते थे। ग्रामीण अपने इलाके की समस्याओं, जनता की जरूरतों, खेती-किसानी और समुदाय से जुड़े मुद्दों को खुलकर राजा के सामने रखते थे। राजा और प्रशासक मिलकर उनका समाधान निकालते थे।
समय बदलने के साथ राजशाही व्यवस्था समाप्त हो गई, किंतु बस्तर की यह लोक-परंपरा आज भी पूरी जीवंतता के साथ कायम है। आज के समय में इस दरबार में जनप्रतिनिधि, जिला प्रशासन के अधिकारी और बस्तर के दूर-दराज के अंचलों से आए आदिवासी समाज के प्रतिनिधि तथा मांझी-चालकी एकत्र होते हैं। यहां बस्तर के पारंपरिक विकास, उसकी संस्कृति के संरक्षण और क्षेत्रीय समस्याओं पर गंभीर चर्चा होती है। जगदलपुर के ऐतिहासिक सिरहासार भवन में आयोजित होने वाला यह मुरिया दरबार इस बात का जीवंत उदाहरण है कि बस्तर के मूल निवासी अपनी संस्कृति, परंपरा और लोकतांत्रिक भागीदारी के प्रति कितने सजग हैं।
दोनों आयोजन खास
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