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Raipur. छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के सदर बाजार में होलिका दहन सिर्फ बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व नहीं, बल्कि एक अधूरी प्रेम कहानी की जीवित याद भी है। यहां करीब 200 सालों से सेठ नाथूराम की विशेष आराधना की परंपरा चली आ रही है।
सेठ नाथूराम को लोक देवता इलोजी के रूप में पूजा जाता है। यहां पर निसंतान दंपत्ति अपनी संतान की मन्नत भी मांगते हैं। ऐसी मान्यता है कि उनकी संतान की इच्छा पूरी होती है।
होलिका के प्रेमी थे इलोजी :
सदर बाजार के व्यापारी वर्ग की गहरी आस्था इस परंपरा से जुड़ी है। मान्यता है कि सेठ नाथूराम दरअसल होलिका के प्रेमी इलोजी थे। लोककथाओं के अनुसार, होलिका का विवाह इलोजी से तय था, लेकिन इससे पहले ही होलिका की मृत्यु हो गई।
जब यह समाचार इलोजी तक पहुंचा, तो वे दूल्हे के वेश में बारात लेकर निकल चुके थे। होलिका के शव को देखकर उन्होंने विलाप किया और उसकी राख को अपने शरीर पर मलकर अपने प्रेम को अमर कर दिया। इसके बाद उन्होंने जीवन भर विवाह नहीं किया।
200 साल की परंपरा :
रायपुर का सदर बाजार आज भी इस 200 साल पुरानी परंपरा को पीढ़ी दर पीढ़ी सहेजे हुए है। यहां होलिका दहन की आग में एक अधूरी लेकिन अमर प्रेम कहानी हर साल जीवित हो उठती है।
इसी प्रेम और त्याग की स्मृति में रायपुर के सदर बाजार में इलोजी को दूल्हे के स्वरूप में स्थापित कर पूजा की जाती है। विशेष बात यह है कि निसंतान दंपति संतान प्राप्ति की कामना से यहां पूजा-अर्चना करते हैं। होलिका दहन के अगले दिन धूल भरी होली खेली जाती है।
जिसमें लोग गुलाल लगाकर प्रेम और उल्लास से होली नानते हैं। यह परंपरा एकादशी से शुरू होकर पूर्णिमा तक चलती है। इस दौरान सेठ नाथूराम की बारात निकाली जाती है, पूजा होती है और होलिका दहन के दिन बारात की तरह मेहमानों के लिए विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं। इनको प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।
सेठ नाथूराम की प्रतिमाएं :
आज यहां सेठ नाथूराम की दो प्रतिमाएं हैं। एक करीब 200 साल पुरानी और दूसरी लगभग 50 साल पुरानी। आयोजन की व्यवस्था शाकद्विपीय ब्राह्मण समाज, पुष्टिकर समाज और रायपुर सर्राफा एसोसिएशन द्वारा की जाती है, जिसमें सभी समाज के लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।
इलोजी की पूजा केवल रायपुर तक सीमित नहीं है। राजस्थान के कई शहरों और गांवों में आज भी लोकदेवता इलोजी की मान्यता है। राजस्थान के पाली में इलोजी का मंदिर भी है। होली के अवसर पर वहां भी प्रतिमाएं स्थापित कर पूजा-पाठ किया जाता है।
कथाओं में यह भी जुड़ा है कि होलिका की मृत्यु का कारण उसके भाई हिरण्यकश्यप का अपने पुत्र प्रह्लाद की विष्णु भक्ति से नाराज होना था। अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठी। लेकिन चमत्कारिक रूप से प्रह्लाद बच गए और होलिका भस्म हो गई।
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