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छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो हार मान चुके लोगों के रगों में जोश भर देगी। यूपीएससी 2025 (UPSC 2025) के नतीजे घोषित हो चुके हैं। इसमें बेलटुकरी गांव के संजय डहरिया ने 946वीं रैंक हासिल की है। यह सिर्फ एक रिजल्ट नहीं, बल्कि मौत को मात देकर सफलता के शिखर तक पहुंचने की कहानी है।
चार बार कैंसर को हराया
संजय डहरिया की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है। यूपीएससी की तैयारी शुरू करने से पहले उन्होंने सात सालों तक कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जंग लड़ी। साल 2012 से 2018 के बीच वह चार बार कैंसर की चपेट में आए। अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए उन्होंने कई बार भगवान से जीवन को लेकर शिकायतें कीं, लेकिन हौसला नहीं डगमगाया। साल 2018 में जब वह पूरी तरह स्वस्थ हुए, तब उन्होंने अपने पुराने सपने को धूल झाड़कर फिर से जिंदा किया।
अधिकारी बनने का सपना कैसे जगा
आईएएस संजय डहरिया का बचपन घोर अभावों में बीता। महासमुंद के छोटे से गांव के सरकारी स्कूल से पढ़ाई शुरू करने वाले संजय बताते हैं कि, एक वक्त ऐसा था जब घर में खाने को दाने नहीं थे। उनकी मां अक्सर खुद भूखी रह जाती थीं ताकि अपने चारों बच्चों का पेट भर सकें।
गरीबी के इसी दंश ने संजय के भीतर कुछ बड़ा करने की आग सुलगाई। कक्षा 10वीं में उन्होंने पहली बार एक आईएएस अधिकारी (IAS Officer) को देखा था और वहीं से उनकी आंखों में नीली बत्ती वाली गाड़ी का सपना बस गया।
एक कमरे से तय किया का सफर
कैंसर से उबरने के बाद साल 2022 में संजय ने UPSC की तैयारी शुरू की। इसके लिए वह रायपुर आ गए और चौबे कॉलोनी में महज 100 स्क्वायर फीट के एक छोटे से किराए के कमरे में रहने लगे।
संसाधनों की कमी थी, इसलिए वह नालंदा परिसर स्थित लाइब्रेरी में घंटों बैठकर पढ़ाई करते थे। चार सालों की कड़ी तपस्या और संघर्ष के बाद आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई और उन्होंने 2025 की परीक्षा में सफलता का परचम लहरा दिया।
मेडिकल ग्राउंड पर मिल सकता है IAS का पद
संजय डहरिया का कहना है कि उनकी वर्तमान रैंक और मेडिकल ग्राउंड के आधार पर उन्हें आईएएस कैडर मिलने की पूरी उम्मीद है। वह कहते हैं, आईएएस तो पक्का है।
संजय अब प्रशासनिक अधिकारी बनकर समाज के उस तबके के लिए काम करना चाहते हैं, जहां से वह खुद निकलकर आए हैं। उनके पिता लखन डहरिया और माता रेशम डहरिया के लिए यह पल भावुक कर देने वाला है, जिन्होंने बेटे के इलाज के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी।
सरकारी स्कूल से UPSC तक का सफर
संजय की शुरुआती शिक्षा गांव के सरकारी स्कूल में हुई, जिसके बाद उनका चयन नवोदय विद्यालय के लिए हो गया। वहां से 12वीं करने के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह उन युवाओं के लिए एक जीती-जागती मिसाल बन गए हैं, जो छोटी-छोटी परेशानियों से घबराकर डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं। संजय ने साबित कर दिया कि अगर इरादे फौलादी हों, तो कैंसर जैसी बीमारी भी मंजिल का रास्ता नहीं रोक सकती।
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