समझौते के बाद क्रिमिनल केस अनुचित, सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की CBI की FIR
VINAY VERMA | Jun 03, 2026, 15:19 IST
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छत्तीसगढ़ के कारोबारी विजय कुमार केला को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली। कोर्ट ने सीबीआई की एफआईआर, चार्जशीट और निचली अदालत की कार्रवाई रद्द कर दी। समझौते और डीआरटी मंजूरी के बाद आपराधिक मुकदमा चलाना अनुचित माना गया।
छत्तीसगढ़ के कारोबारी विजय कुमार केला को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने सीबीआई द्वारा दर्ज एफआईआर, चार्जशीट और निचली अदालत की पूरी कार्यवाही को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि जब बैंक और कर्जदार के बीच विवाद का निपटारा हो चुका हो और उस समझौते पर डेब्ट्स रिकवरी ट्रिब्यूनल (डीआरटी) की मंजूरी भी मिल चुकी हो, तब उसी मामले में आपराधिक मुकदमा चलाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुयान की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि आर्थिक और वाणिज्यिक विवादों के समाधान के बाद भी यदि आपराधिक मुकदमे जारी रखे जाएंगे तो इसका नकारात्मक असर पूरे बैंकिंग और आर्थिक तंत्र पर पड़ेगा। अदालत ने कहा कि इससे भविष्य में कर्जदार और बैंक वन टाइम सेटलमेंट जैसे विकल्पों से बचने लगेंगे, जो वित्तीय व्यवस्था के लिए नुकसानदेह होगा।
मामले के अनुसार रायपुर की फर्म मेसर्स मोहन ट्रेडर्स का संचालन विजय कुमार केला के बड़े भाई स्वर्गीय परमानंद केला करते थे। फर्म ने यूको बैंक से ऋण लिया था। वर्ष 2009 तक यह बकाया बढ़कर करीब 8 करोड़ रुपए पहुंच गया था।
इसके बदले अमलीडीह और बोरियाखुर्द की संपत्तियां गिरवी रखी गई थीं। नवंबर 2009 में परमानंद केला के निधन के बाद कारोबार प्रभावित हुआ और ऋण की किस्तें समय पर जमा नहीं हो सकीं। इसके बाद बैंक ने 31 दिसंबर 2010 को खाते को एनपीए घोषित कर दिया।
बकाया राशि की वसूली के लिए यूको बैंक ने डेब्ट्स रिकवरी ट्रिब्यूनल, जबलपुर में दावा पेश किया। मामला लंबित रहने के दौरान दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ। 6.49 करोड़ रुपए के बकाया के बदले 4.25 करोड़ रुपए में फुल एंड फाइनल सेटलमेंट तय किया गया। समझौते को डीआरटी की स्वीकृति भी मिली और खाते का निपटारा हो गया। यहीं से यह मामला खत्म माना जा रहा था।
लेकिन मामला यहीं नहीं रुका। खाते के बंद होने के करीब ढाई साल बाद फरवरी 2018 में यूको बैंक के जोनल हेड ने सीबीआई में शिकायत दर्ज कराई। आरोप लगाया गया कि लोन सीमा बढ़वाने के लिए फर्जी ऑडिट रिपोर्ट प्रस्तुत की गई थी। शिकायत में यह भी कहा गया कि बैंक अधिकारियों की मिलीभगत से मूल्यवान संपत्तियों को मुक्त कराया गया और उनकी जगह अतिक्रमण वाली जमीन गिरवी रखी गई।
सीबीआई ने शिकायत के आधार पर एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की और रायपुर की विशेष अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी। विजय कुमार केला ने इस कार्रवाई को चुनौती दी, लेकिन छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप से इनकार कर दिया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां कारोबारी ने विशेष अनुमति याचिका दायर की।
सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले को देखने के बाद कहा कि जब बैंक ने खुद समझौता मानकर पैसे ले लिए और डीआरटी (DRT) ने भी उसे मंजूरी दे दी, तो सालों बाद उसी लेन-देन को आधार बनाकर आपराधिक मुकदमा चलाना उचित नहीं है।
अदालत ने सीबीआई की कार्रवाई को निरस्त करते हुए स्पष्ट संदेश दिया है कि वाणिज्यिक विवादों के समाधान के बाद अनावश्यक आपराधिक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। यह फैसला बैंकिंग, वित्तीय संस्थानों और कारोबारी जगत के लिए दूरगामी प्रभाव वाला माना जा रहा है।
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सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
बड़े भाई की मौत के बाद बिगड़ा कारोबार
इसके बदले अमलीडीह और बोरियाखुर्द की संपत्तियां गिरवी रखी गई थीं। नवंबर 2009 में परमानंद केला के निधन के बाद कारोबार प्रभावित हुआ और ऋण की किस्तें समय पर जमा नहीं हो सकीं। इसके बाद बैंक ने 31 दिसंबर 2010 को खाते को एनपीए घोषित कर दिया।
डीआरटी में हुआ समझौता
बैंक ने लगाए फर्जी दस्तावेजों के आरोप
फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला
समझौते के बाद मुकदमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक
अदालत ने सीबीआई की कार्रवाई को निरस्त करते हुए स्पष्ट संदेश दिया है कि वाणिज्यिक विवादों के समाधान के बाद अनावश्यक आपराधिक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। यह फैसला बैंकिंग, वित्तीय संस्थानों और कारोबारी जगत के लिए दूरगामी प्रभाव वाला माना जा रहा है।
FAQ
- सुप्रीम कोर्ट ने विजय कुमार केला को राहत क्यों दी?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब बैंक और कर्जदार के बीच समझौता हो चुका हो और डीआरटी ने उसे मंजूरी दी हो, तब उसी मामले में आपराधिक मुकदमा चलाना अनुचित है। - विवाद का मूल कारण क्या था?
विजय कुमार केला की फर्म ने यूको बैंक से ऋण लिया था। बड़े भाई की मौत और बकाया न चुका पाने के कारण बैंक ने खाते को एनपीए घोषित किया। इसके बाद समझौता और फुल एंड फाइनल सेटलमेंट हुआ, लेकिन बाद में बैंक ने फर्जी दस्तावेजों का आरोप लगाते हुए सीबीआई में शिकायत की। - सुप्रीम कोर्ट का फैसला कारोबारी और बैंकिंग क्षेत्र के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
फैसले से स्पष्ट संदेश गया कि वाणिज्यिक विवादों का समाधान होने के बाद अनावश्यक आपराधिक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। इससे भविष्य में वन टाइम सेटलमेंट और वित्तीय लेन-देन में भरोसा बनेगा और कारोबारी सुरक्षित रहेंगे।
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