छत्तीसगढ़ के स्कूलों को नहीं मिल रहे हिंदी और संस्कृत के मास्साब

छत्तीसगढ़ स्कूल एजुकेशन सिस्टम की गाड़ी सरकार की लाख कोशिशों के बाद भी पटरी पर नहीं आ पा रही है। सरकार ने युक्ति तो बहुत लगाई लेकिन वो ज्यादा काम नहीं आई।

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Arun Tiwari
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Raipur. छत्तीसगढ़ स्कूल एजुकेशन सिस्टम की गाड़ी सरकार की लाख कोशिशों के बाद भी पटरी पर नहीं आ पा रही है। सरकार ने युक्ति तो बहुत लगाई लेकिन वो ज्यादा काम नहीं आई। स्कूलों में शिक्षकों की कमी तो है ही लेकिन द सूत्र की पड़ताल में एक और हैरान करने वाली जानकारी सामने आई है।

हिंदी प्रदेश होने के बाद भी छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा हिंदी शिक्षकों की कमी है। संस्कृत भी इसी श्रेणी में आती है। छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में सबसे ज्यादा हिंदी और संस्कृत के मास्साबों की कमी है। फिजिक्स,कैमिस्ट्री,मैथ्स के टीचर्स की स्थिति हिंदी और संस्कृत के मुकाबले अच्छी है।

छत्तीसगढ़ में 50 हजार शिक्षकों की कमी है, वर्तमान में जो पोस्ट हैं उनमें 33 हजार शिक्षकों की कमी है इसके बाद भी भर्ती सिर्फ 5 हजार टीचर्स की हो रही है। 

स्कूलों में कम होते मास्साब :

छत्तीसगढ़ के स्कूलों में लगातार मास्साब की कमी हो रही है। इस समय स्कूलों में 32 हजार 962 शिक्षकों के पद खाली हैं। इनमें शिक्षा की रीढ़ माने जाने वाले सहायक शिक्षकों की संख्या 23444 है। बाकी शिक्षकों की संख्या 9518 है। यह तो सिर्फ वो संख्या है जो पद तो स्वीकृत हैं लेकिन वे खाली पड़े हैं।

 इसका दूसरा पहलू बताते हैँ। पिछले सात माह में ही राज्य के सरकारी स्कूलों के रिटायरमेंट और अन्य वजहों से 6 हजार से ज्यादा शिक्षकों की कमी हो गई है। इसकी वजह से राज्य में शिक्षकों के खाली पदों की संख्या बढ़ गई है।

पिछले 7 माह में खाली पदों की संख्या में 6,434 पदों का इजाफा हुआ है। प्रदेश में कुल 51,663 शिक्षकों की जरुरत है। खाली पदों में सहायक शिक्षक से लेकर प्राचार्य तक के पद शामिल हैं। हालांकि, शिक्षकों की कमी को दूर करने के लिए राज्य सरकार ने पहल की है, लेकिन रिक्त पदों की तुलना में भर्ती के पद काफी कम हैं इसलिए रिक्त पदों की संख्या में कमी आने की बजाए लगातार वृद्धि हो रही है।

राज्य में स्कूली शिक्षकों की नियुक्ति के लिए लगभग 5 हजार पदों पर भर्ती की प्रक्रिया शुरू हुई है। लेकिन ये सिर्फ उंट के मुंह में जीरा के समान हैं। 

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हिंदी,संस्कृत के मिल नहीं रहे शिक्षक : 

छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। हालात ऐसे हैं कि कहीं हिंदी टीचर की कुर्सी खाली है, तो कहीं संस्कृत पढ़ाने वाला कोई नहीं। भाषा जैसे जरुरी विषयों में भी शिक्षकों की भारी कमी ने स्कूलों की पढ़ाई पर सीधा असर डालना शुरू कर दिया है।

द सूत्र की पड़ताल में सामने आया है कि प्रदेश में जिन विषयों के शिक्षकों की सबसे ज्यादा कमी है उनमें हिंदी और संस्कृत जैसे विषय शामिल हैं। इनकी तुलना में फिजिक्स,कैमिस्ट्री,मैथ्स जैसे विषयों के शिक्षकों के खाली पदों की संख्या कम है। प्रदेश के कई जिलों के स्कूलों में हिंदी और संस्कृत के पद वर्षों से खाली पड़े हैं।

नतीजा यह है कि जिन विषयों से भाषा, संस्कृति और बुनियादी समझ विकसित होती है, वही सबसे ज्यादा उपेक्षित हो गए हैं। कई स्कूलों में दूसरे विषयों के शिक्षक हिंदी या संस्कृत की कक्षाएं लेने को मजबूर हैं, जबकि उन्हें खुद अपने विषय का पूरा बोझ संभालना पड़ रहा है।

इस विषय के इतने पद खाली : 

हिंदी - 1535
इतिहास,राजनीति - 1087                            
अर्थशास्त्र, भूगोल - 1044
संस्कृत - 973
भौतिकी - 766
कॉमर्स - 743
गणित - 706
इंग्लिश - 676
जीव विज्ञान - 592
रसायन - 575
एग्रीकल्चर - 207

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लंबे समय से लटक रहा मामला :

सरकार ने इस शिक्षा सत्र के पहले युक्तियुक्तकरण किया था। यानी जहां टीचर सरप्लस थे उनको ऐसे स्कूलों में पदस्थ किया गया जहां शिक्षक नहीं थे या फिर एक या दो शिक्षक थे। उन स्कूलों को भी दूसरे स्कूलों में मर्ज किया जहां पर छात्र संख्या इक्का दुक्का ही थी। लेकिन यह युक्ति भी काम नहीं आई।

2024-25 के बजट सत्र में तत्कालीन स्कूल शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने प्रदेश में 33 हजार शिक्षकों की सीधी भर्ती की घोषणा की थी। इसमें व्याख्याता के 2524 पद, शिक्षक के 8194 पद और सहायक शिक्षक के 22,341 पद शामिल थे। लेकिन उनके सांसद बनने के बाद यह घोषणा ठंडे बस्ते में चली गई।

सरकार ने अब चरणबद्ध तरीके से भर्ती प्रक्रिया शुरू की है। पहले चरण में 5 हजार शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया चल रही है। अभी नए पांच हजार शिक्षक भर्ती नहीं हुई और छह हजार कम हो गए। सरकार के लिए यह चिंता के साथ चिंतन का भी विषय है कि हिंदी राज्य में हिंदी और संस्कृत के शिक्षक नहीं मिल पा रहे हैं।

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