आदिवासियों को चाहिए पहचान और मान, डीलिस्टिंग और धर्म कोड पर बंट रहा समाज
Arun Tiwari | May 29, 2026, 14:10 IST
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दिल्ली में 24 मई को हुई रैली के बाद आदिवासियों की डीलिस्टिंग और अलग धर्म कोड का मुद्दा फिर जोर पकड़ गया है। केंद्र सरकार के कदमों के तहत, ईसाई धर्म अपनाने वाले आदिवासियों को ST सूची से बाहर करने की मांग बढ़ रही है।
देश की राजधानी दिल्ली में 24 मई को हुई बड़ी रैली के बाद यह आदिवासियों की डीलिस्टिंग की चर्चा और तेज हो गई है। बात तो यहां तक की जाने लगी है कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर संसद में कोई विधेयक ला सकती है।
इस रैली में खासतौर पर गृहमंत्री अमित शाह शामिल हुए थे। मुद्दा है कि जिन आदिवासियों ने ईसाई धर्म अपना लिया है, उन्हें आदिवासी आरक्षण और उससे जुड़े अन्य संवैधानिक लाभों से बाहर किया जाए। आदिवासियों के अलग धर्म कोड का विषय पहले से ही गरमाता रहा है।
मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में बड़ी आबादी आदिवासियों की है इसलिए ये मुद्दे यहां के लिए बहुत अहम हो जाते हैं। इन मुद्दों को लेकर आदिवासी समाज बंटा हुआ नजर आ रहा है। कोई इसके पक्ष में है तो कोई इसके खिलाफ। इन मुद्दों पर राजनीतिक दल भी अलग अलग राग अलाप रहे हैं।
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि एमपी की 22 फीसदी और छत्तीसगढ़ की करीब 32 प्रतिशत आबादी आदिवासी है। यहां की राजनीति पर भी आदिवासी वर्ग बड़ा असर डालता रहा है। इन राज्यों की एक तिहाई से ज्यादा सीटों पर आदिवासी वर्ग का बड़ा असर है।
इतिहास पर नजर डालें तो आदिवासी पहचान और उनकी धार्मिक श्रेणी को लेकर लंबे समय से भ्रम की स्थिति रही है। अंग्रेजों के दौर में अलग-अलग जनगणनाओं में आदिवासियों को कभी “फॉरेस्ट ट्राइब”, कभी “एनिमिस्ट”, कभी “हिल एंड फॉरेस्ट ट्राइब” और कभी “प्रिमिटिव ट्राइब” कहा गया।
1951 की जनगणना में आदिवासियों के लिए अलग कॉलम ही समाप्त कर दिया गया, जिसके बाद बड़ी संख्या में आदिवासी हिंदू, ईसाई या प्रकृतिवादी श्रेणियों में दर्ज होने लगे। लंबे समय से चले आ रहे डीलिस्टिंग और अलग धर्म कोड के मुद्दे ने फिर जोर पकड़ लिया है।
ईसाई धर्म अपनाने वाले आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति (ST) की सूची से बाहर करने की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। लंबे समय से चल रही डी-लिस्टिंग की मांग अब दिल्ली तक पहुंच चुकी है। संविधान में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए अलग-अलग प्रावधान किए गए हैं।
संविधान के अनुच्छेद 341 और 1950 के राष्ट्रपति आदेश के तहत अनुसूचित जाति का आरक्षण मूल रूप से हिंदू समुदाय के लिए तय किया गया था। बाद में इसमें सिख और बौद्ध धर्म को भी शामिल किया गया। लेकिन यदि कोई ईसाई या इस्लाम धर्म अपनाता है तो उसे SC आरक्षण का लाभ नहीं मिलता।
इसके पीछे तर्क यह दिया जाता है कि इन धर्मों में जाति व्यवस्था को मान्यता नहीं है। वहीं अनुसूचित जनजातियों का मामला अलग माना गया है। संविधान के अनुच्छेद 342 के अनुसार ST की पहचान धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि जनजातीय और सामाजिक पहचान के आधार पर तय होती है।
यही कारण है कि कोई आदिवासी यदि हिंदू, ईसाई, मुस्लिम या किसी अन्य धर्म को मानता है, तब भी उसकी आदिवासी पहचान समाप्त नहीं होती और उसे आरक्षण का लाभ मिलता रहता है।
डीलिस्टिंग की मांग को लेकर आदिवासी वर्ग भी बंटा हुआ नजर आ रहा है। कोई इसे आदिवासियों की बेहतरी के लिए जरुरी मानता है तो कोई इसे आदिवासियों के हक को छीनने जैसी बात करता है। बीजेपी और उससे जुड़े संगठन वर्तमान व्यवस्था में बदलाव की मांग कर रहे हैं।
उनका तर्क है कि धर्म परिवर्तन के बाद आदिवासी समुदाय की सांस्कृतिक पहचान बदल जाती है, इसलिए ऐसे लोगों को ST आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। बड़े आदिवासी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम कहते हैं कि डीलिस्टिंग जरुरी है।
इससे जो मूल आदिवासी हैं उनको ज्यादा लाभ मिल पाएगा। जिन्होंने दूसरा धर्म अपना लिया है उनको दोहरा फायदा मिलता है एक अल्पसंख्यक होने का और दूसरा आदिवासी होने का। डीलिस्टिंग से यह खत्म हो जाएगा और आदिवासियों को ज्यादा लाभ मिल पाएगा।
आदिवासी महिला नेत्री सविता साय कहती हैं कि आदिवासी तो आदिवासी है उसको अलग अलग क्या करना। डीलिस्टिंग से उन दूसरे धर्म में जाने वाले आदिवासियों का हक छिन जाएगा। आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष विक्रांत भूरिया का कहना है कि बीजेपी डीलिस्टिंग की बात कर समाज को बांटने का काम कर रही है।
यह आदिवासियों की जमीन छीनने का मसला है। आदिवासियों को धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता। आरएसएस नेता सतीश पिम्पलीकर कहते हैं कि डीलिस्टिंग बहुत ज़रूरी है।
छत्तीसगढ़ कांग्रेस के अध्यक्ष और आदिवासी नेता दीपक बैज कहते हैं कि डी-लिस्टिंग मामले में बीजेपी अवसरवादी राजनीति कर रही है। देश में बीजेपी की सरकार है, इन राज्यों में बीजेपी की सरकार है। संसद मे कानून बनाने का अधिकार इस सरकार के पास है।
तो डी-लिस्टिंग मामले में कानून बनाने से क्यों डर रहे ह।? बीजेपी आदिवासी नेताओं को बुलाकर भाषण देकर सस्ती लोकप्रियता हासिल करना चाहती है। डी-लिस्टिंग के मामले में आदिवासी समाज की पीड़ा से बीजेपी को कोई लेना देना नही है।
आदिवासियों के हितों की बीजेपी को कोई चिंता नही है। वहीं छत्तीसगढ़ के वन मंत्री और आदिवासी नेता केदार कश्यप कहते हैं कि कांग्रेस पार्टी और उसके नेता आदिवासी समाज को गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं।
कांग्रेस को न आदिवासियों की चिंता है और न ही उनके अधिकारों की रक्षा से कोई लेना-देना। कांग्रेस ने दशकों तक आदिवासी समाज के नाम पर केवल राजनीति की, उनका शोषण किया और उन्हें विकास से दूर रखा।
उन्होंने कहा कि डी-लिस्टिंग का मुद्दा किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि वास्तविक जनजातीय समाज के हित और अधिकारों की रक्षा का विषय है। कांग्रेस इस गंभीर विषय को भी वोट बैंक की राजनीति और भ्रम फैलाने का माध्यम बना रही है।
देश में धर्म कोड का मुद्दा भी सालों से चला आ रहा है। इस मुद्दे से सामाजिक बदलाव की बात की जा रही है। यह माना जा रहा है कि इससे आदिवासियों की अलग पहचान बनेगी और वे सामाजिक और आर्थिक बेहतरी की तरफ आगे बढ़ेंगे।
सर्वआदिवासी समाज की महिला विंग की अध्यक्ष सविता साय कहती हैं कि जनजाति समाज की बेहतरी के लिए अलग धर्म कोड होना जरुरी है। हिंदुओं से अलग होगा या फिर हिंदुओं में भी एक अलग कोड बनाया जाए जो आदिवासी वर्ग के लिए हो। अगर जैन और पारसी समाज के लिए अलग धर्मकोड हो सकता है तो फिर आदिवासियों के लिए क्यों नहीं हो सकता।
वे कहती हैं कि अलग धर्मकोड से आदिवासियों का धर्मांतरण रुकेगा,उन पर ज्यादा फोकस होगा और यह आदिवासियों की बेहतरी के लिए जरुरी भी है। अरविंद नेताम कहते हैं कि आदिवासियों की पहचान बनाए रखने के लिए अलग धर्म कोड होना चाहिए।
नेताम कहते हैं कि उन्होंने नागपुर में हुए संघ के कार्यक्रम में भी यही बात कही थी। यदि दूसरे धर्म को इसमें मान्यता मिलती है तो फिर आदिवासियों को अलग धर्म कोड क्यों नहीं मिलना चाहिए। नेताम कहते हैं कि धर्म कोर्ड से बहुत ज्यादा बदलाव हो या न हो लेकिन जनजाति वर्ग की आइडेंटिटी बनी रहेगी नहीं तो इस वर्ग की पहचान ही खत्म हो जाएगी।
विक्रांत भूरिया कहते हैं कि अलग धर्म कोड का होना बहुत जरुरी है। अलग धर्म कोर्ड से आदिवासियों की पहचान बरकरार रहेगी और जनजाति समाज में बेहतर बदलाव आएगा। लेकिन संघ की राय इससे इतर है।
सतीश पिम्पलीकर कहते हैं कि धर्म शब्द का अर्थ ही गलत समझा जा रहा है। धर्म याने सम्प्रदाय नहीं, धर्म याने समाज की धारणा करने वाले नियम है। इस अर्थ में धर्म कोड का कोई मतलब नहीं है। सामाजिक बदलाव के लिए और भी प्रयास लंबे समय तक होना चाहिये
अलग धर्मकोड की मांग इसलिए हो रही है क्योंकि आदिवासी समूह अपनी एक अलग धार्मिक पहचान रखना चाहते हैं, क्योंकि उनकी प्रकृति पूजा और रीति-रिवाज अन्य धर्मों से भिन्न हैं। वर्तमान में जनगणना में आदिवासी समुदाय के लिए कोई अलग कॉलम नहीं है। उन्हें हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध या जैन में से कोई एक चुनना पड़ता है, या फिर 'अन्य' विकल्प का चयन करना होता है।
बहरहाल या मुद्दा ज़ोर पकड़ता जा रहा है। दिल्ली सम्मेलन के बाद इस मुद्दे को और हवा मिली है। अब देखना है कि सियासत के लिए अहम आदिवासी समाज के यह मुद्दे कब पूरे होंगे।
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रायपुर में कवासी लखमा बोले- आदिवासी जन्म से हिन्दू नहीं, आदिवासियों के लिए अलग धर्म कोड करने की मांग की
छत्तीसगढ़ में कल डीलिस्टिंग महारैली, हजारों की संख्या में लोग होंगे शामिल, धर्मपरिवर्तन कर चुके लोगों को आरक्षण न देने की मांग
इस रैली में खासतौर पर गृहमंत्री अमित शाह शामिल हुए थे। मुद्दा है कि जिन आदिवासियों ने ईसाई धर्म अपना लिया है, उन्हें आदिवासी आरक्षण और उससे जुड़े अन्य संवैधानिक लाभों से बाहर किया जाए। आदिवासियों के अलग धर्म कोड का विषय पहले से ही गरमाता रहा है।
मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में बड़ी आबादी आदिवासियों की है इसलिए ये मुद्दे यहां के लिए बहुत अहम हो जाते हैं। इन मुद्दों को लेकर आदिवासी समाज बंटा हुआ नजर आ रहा है। कोई इसके पक्ष में है तो कोई इसके खिलाफ। इन मुद्दों पर राजनीतिक दल भी अलग अलग राग अलाप रहे हैं।
मप्र और छत्तीसगढ़ के लिए क्यों अहम :
वक्त के साथ बदलती पहचान:
1951 की जनगणना में आदिवासियों के लिए अलग कॉलम ही समाप्त कर दिया गया, जिसके बाद बड़ी संख्या में आदिवासी हिंदू, ईसाई या प्रकृतिवादी श्रेणियों में दर्ज होने लगे। लंबे समय से चले आ रहे डीलिस्टिंग और अलग धर्म कोड के मुद्दे ने फिर जोर पकड़ लिया है।
Delisting and the religion Code Timeline
ये है असल मुद्दा :
संविधान के अनुच्छेद 341 और 1950 के राष्ट्रपति आदेश के तहत अनुसूचित जाति का आरक्षण मूल रूप से हिंदू समुदाय के लिए तय किया गया था। बाद में इसमें सिख और बौद्ध धर्म को भी शामिल किया गया। लेकिन यदि कोई ईसाई या इस्लाम धर्म अपनाता है तो उसे SC आरक्षण का लाभ नहीं मिलता।
इसके पीछे तर्क यह दिया जाता है कि इन धर्मों में जाति व्यवस्था को मान्यता नहीं है। वहीं अनुसूचित जनजातियों का मामला अलग माना गया है। संविधान के अनुच्छेद 342 के अनुसार ST की पहचान धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि जनजातीय और सामाजिक पहचान के आधार पर तय होती है।
यही कारण है कि कोई आदिवासी यदि हिंदू, ईसाई, मुस्लिम या किसी अन्य धर्म को मानता है, तब भी उसकी आदिवासी पहचान समाप्त नहीं होती और उसे आरक्षण का लाभ मिलता रहता है।
डीलिस्टिंग पर दो फाड़ :
उनका तर्क है कि धर्म परिवर्तन के बाद आदिवासी समुदाय की सांस्कृतिक पहचान बदल जाती है, इसलिए ऐसे लोगों को ST आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। बड़े आदिवासी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम कहते हैं कि डीलिस्टिंग जरुरी है।
इससे जो मूल आदिवासी हैं उनको ज्यादा लाभ मिल पाएगा। जिन्होंने दूसरा धर्म अपना लिया है उनको दोहरा फायदा मिलता है एक अल्पसंख्यक होने का और दूसरा आदिवासी होने का। डीलिस्टिंग से यह खत्म हो जाएगा और आदिवासियों को ज्यादा लाभ मिल पाएगा।
आदिवासी महिला नेत्री सविता साय कहती हैं कि आदिवासी तो आदिवासी है उसको अलग अलग क्या करना। डीलिस्टिंग से उन दूसरे धर्म में जाने वाले आदिवासियों का हक छिन जाएगा। आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष विक्रांत भूरिया का कहना है कि बीजेपी डीलिस्टिंग की बात कर समाज को बांटने का काम कर रही है।
यह आदिवासियों की जमीन छीनने का मसला है। आदिवासियों को धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता। आरएसएस नेता सतीश पिम्पलीकर कहते हैं कि डीलिस्टिंग बहुत ज़रूरी है।
डीलिस्टिंग पर सियासत गर्म :
तो डी-लिस्टिंग मामले में कानून बनाने से क्यों डर रहे ह।? बीजेपी आदिवासी नेताओं को बुलाकर भाषण देकर सस्ती लोकप्रियता हासिल करना चाहती है। डी-लिस्टिंग के मामले में आदिवासी समाज की पीड़ा से बीजेपी को कोई लेना देना नही है।
आदिवासियों के हितों की बीजेपी को कोई चिंता नही है। वहीं छत्तीसगढ़ के वन मंत्री और आदिवासी नेता केदार कश्यप कहते हैं कि कांग्रेस पार्टी और उसके नेता आदिवासी समाज को गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं।
कांग्रेस को न आदिवासियों की चिंता है और न ही उनके अधिकारों की रक्षा से कोई लेना-देना। कांग्रेस ने दशकों तक आदिवासी समाज के नाम पर केवल राजनीति की, उनका शोषण किया और उन्हें विकास से दूर रखा।
उन्होंने कहा कि डी-लिस्टिंग का मुद्दा किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि वास्तविक जनजातीय समाज के हित और अधिकारों की रक्षा का विषय है। कांग्रेस इस गंभीर विषय को भी वोट बैंक की राजनीति और भ्रम फैलाने का माध्यम बना रही है।
धर्म कोड और सामाजिक बदलाव :
सर्वआदिवासी समाज की महिला विंग की अध्यक्ष सविता साय कहती हैं कि जनजाति समाज की बेहतरी के लिए अलग धर्म कोड होना जरुरी है। हिंदुओं से अलग होगा या फिर हिंदुओं में भी एक अलग कोड बनाया जाए जो आदिवासी वर्ग के लिए हो। अगर जैन और पारसी समाज के लिए अलग धर्मकोड हो सकता है तो फिर आदिवासियों के लिए क्यों नहीं हो सकता।
वे कहती हैं कि अलग धर्मकोड से आदिवासियों का धर्मांतरण रुकेगा,उन पर ज्यादा फोकस होगा और यह आदिवासियों की बेहतरी के लिए जरुरी भी है। अरविंद नेताम कहते हैं कि आदिवासियों की पहचान बनाए रखने के लिए अलग धर्म कोड होना चाहिए।
नेताम कहते हैं कि उन्होंने नागपुर में हुए संघ के कार्यक्रम में भी यही बात कही थी। यदि दूसरे धर्म को इसमें मान्यता मिलती है तो फिर आदिवासियों को अलग धर्म कोड क्यों नहीं मिलना चाहिए। नेताम कहते हैं कि धर्म कोर्ड से बहुत ज्यादा बदलाव हो या न हो लेकिन जनजाति वर्ग की आइडेंटिटी बनी रहेगी नहीं तो इस वर्ग की पहचान ही खत्म हो जाएगी।
विक्रांत भूरिया कहते हैं कि अलग धर्म कोड का होना बहुत जरुरी है। अलग धर्म कोर्ड से आदिवासियों की पहचान बरकरार रहेगी और जनजाति समाज में बेहतर बदलाव आएगा। लेकिन संघ की राय इससे इतर है।
सतीश पिम्पलीकर कहते हैं कि धर्म शब्द का अर्थ ही गलत समझा जा रहा है। धर्म याने सम्प्रदाय नहीं, धर्म याने समाज की धारणा करने वाले नियम है। इस अर्थ में धर्म कोड का कोई मतलब नहीं है। सामाजिक बदलाव के लिए और भी प्रयास लंबे समय तक होना चाहिये
क्या है डीलिस्टिंग और धर्मकोड :
Delisting and religion Code
निष्कर्ष:
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आदिवासी धर्म कोड का मुद्दा फिर गरमाया, उमंग सिंघार ने कहा- आदिवासी एकजुट होकर आवाज उठाएं
रायपुर में कवासी लखमा बोले- आदिवासी जन्म से हिन्दू नहीं, आदिवासियों के लिए अलग धर्म कोड करने की मांग की
छत्तीसगढ़ में कल डीलिस्टिंग महारैली, हजारों की संख्या में लोग होंगे शामिल, धर्मपरिवर्तन कर चुके लोगों को आरक्षण न देने की मांग
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