डिंडौरी में रोज कट रहे 565 पेड़, 1.50 लाख पेड़ों की कटाई का टारगेट, सामने आई बड़ी वजह
Amresh Kushwaha | Oct 03, 2026, 10:38 IST
जंगल पर साल बोरर कीट का खतरा बढ़ा।
डिंडौरी जिले में साल के जंगल पर बड़ा संकट मंडरा रहा है। साल बोरर कीट का प्रकोप बढ़ने से वन विभाग बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई कर रहा है। इससे करीब 30 हजार हेक्टेयर के जंगल में डेढ़ लाख पेड़ प्रभावित हैं। विभाग इन्हें 31 दिसंबर तक काटना चाहता है। आठ दिन में सिर्फ 4516 पेड़ कटे। रोज करीब 1364 पेड़ काटने होंगे।
डिंडौरी साल बोरर का खतरा
विभाग के मुताबिक दो साल में प्रभावित पेड़ों की संख्या तेजी से बढ़ी है। पिछले साल करीब पांच से छह हजार पेड़ों पर निशान लगाए गए थे। इस बार यह संख्या करीब डेढ़ लाख तक पहुंच गई है।
रोज कितने पेड़ काटने जरूरी
डीएफओ (District Forest Officer) भारती ठाकरे ने रफ्तार पर जवाब दिया। उनके मुताबिक दो मजदूर डेढ़ से दो घंटे में एक पेड़ काटते हैं। विभाग का एक अनुमान डेढ़ से ढाई घंटे का भी है। बारिश में काम बंद करना पड़ता है। इससे रफ्तार और धीमी हो जाती है। इसी वजह से तय समय में लक्ष्य पूरा करना चुनौती भरा दिख रहा है।
मौके पर कैसे चल रहा काम
काम सिर्फ पेड़ गिराने तक सीमित नहीं है। मजदूरों को टहनियां काटनी पड़ती हैं। उन्हें पेड़ की छाल भी उतारनी पड़ती है। घने जंगल में जंगली घास और वनस्पति है। मजदूरों के मुताबिक यहां अकसर सांप भी दिखाई देते हैं। इसलिए यह काम जोखिम भरा है।
मजदूरों की सुरक्षा पर सवाल
जंगल में पीने के पानी की व्यवस्था भी नहीं है। प्यास लगने पर मजदूर 200 से 250 मीटर दूर झिर तक जाते हैं। बारिश में उस झिर में मटमैला पानी आने की बात भी उन्होंने कही।
डीएफओ ने क्या जवाब दिया
फंड को लेकर उन्होंने कहा कि पेड़ कटाई के लिए अलग से फंड नहीं रहता। इसके लिए टेंडर भी नहीं निकाला जाता। कटाई मजदूरी दर पर कराई जा रही है। लकड़ी को डिपो तक ले जाने के लिए टेंडर प्रक्रिया में है।
डीएफओ के मुताबिक प्राथमिक इलाज की किट वनरक्षक के पास रहती है। मजदूरों का संबल योजना में पंजीकरण रहता है। विभाग ने अलग से बीमा नहीं कराया है। स्टाफ से कहा गया है कि सभी का पंजीकरण संबल योजना में हो। पेयजल के सवाल पर डीएफओ ने कोई जवाब नहीं दिया।
फील्ड में पांच डीएफओ की ड्यूटी लगाई गई है। दो ट्रेनी आईएफएस (Indian Forest Service) अधिकारी भी तैनात हैं। इनके साथ दो एसडीओ (Sub Divisional Officer) भी हैं। रेंजर, वनपाल और वनरक्षक की ड्यूटी भी लगी है।
साल के जंगल और पुराना प्रकोप
विशेषज्ञों के अनुसार साल बोरर का प्राकृतिक चक्र करीब 30 साल का होता है। डिंडौरी में 1997-98 में भी इसका बड़ा प्रकोप सामने आया था। तब 1.42 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में 22 लाख 15 हजार पेड़ काटने पड़े थे। उस दौरान एक करोड़ 39 लाख कीट नष्ट किए गए थे।
देश में साल के जंगल करीब एक लाख पांच हजार 790 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले हैं। इसमें से 26,041.78 वर्ग किमी हिस्सा मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में है। यह देश के साल वन क्षेत्र का करीब 25 फीसदी है। रिपोर्ट के मुताबिक आजादी से पहले 1905 में बालाघाट में प्रकोप दर्ज हुआ था। 1923 से 1928 के बीच मंडला वन क्षेत्र में 70 लाख पेड़ प्रभावित हुए। 1996 से 2001 के बीच मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 40 लाख पेड़ प्रभावित हुए। यह असर करीब तीन लाख हेक्टेयर क्षेत्र में दिखा था।
कीट फैलने की वजह क्या रही
वन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार महामारी उन जंगलों में तेजी से फैली। जहां मानव बस्तियां हैं। पशु चराने और ईंधन के लिए पेड़ काटने से भी हालात बिगड़े। कुल्हाड़ी के घाव से निकलने वाले तरल पदार्थ ने कीट के पनपने में मदद की। ये बातें डॉ. एन. रायचौधुरी की रिपोर्ट में कही गई हैं। वे जबलपुर के उष्ण कटिबंधीय वन अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक हैं। रिपोर्ट के साथ भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद का नाम भी जुड़ा है। मानसून से पहले टूटी टहनियां और खराब पेड़ हटते, तो शुरू में ही काबू मिलता।
एक्सपर्ट की राय क्या है
रिटायर्ड अपर वनमंडल अधिकारी आरएलएस परस्ते भी इस पर राय रखते हैं। उनके मुताबिक साल बोरर को पूरी तरह खत्म करना संभव नहीं है। लेकिन वैज्ञानिक तरीके से इसके प्रकोप को नियंत्रित किया जा सकता है। उनका कहना है कि सिर्फ पेड़ काटना स्थायी समाधान नहीं है। इसके लिए लंबे समय की माइक्रो प्लानिंग जरूरी होगी।
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