न्याय की रफ्तार बढ़ाने की कोशिश: सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम का बड़ा फैसला
Neel Tiwari | Feb 04, 2026, 11:34 IST
allahabad hc ad hoc judges appointment sc collegium
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में पांच रिटायर्ड जजों की एड-हॉक नियुक्ति की है। यह कदम लंबित मामलों को तेजी से निपटाने और न्याय व्यवस्था में सुधार के लिए उठाया गया है।
देश की न्याय व्यवस्था पर बढ़ते दबाव और लाखों लंबित मामलों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने एक जरूरी कदम उठाया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के पांच रिटायर्ड जजों को दो साल के लिए एड-हॉक (तदर्थ) जज के तौर पर फिर से नियुक्त किया जाएगा।
इसका मकसद हाईकोर्ट के कामकाज को तेज करना और सालों से अटके मामलों का जल्द निपटारा करना है। ये फैसला 3 फरवरी 2026 को हुई कॉलेजियम की बैठक में लिया गया है।
यह नियुक्तियां भारतीय संविधान के अनुच्छेद 224-A के तहत की जा रही हैं। इसके अंतर्गत रिटायर्ड जजों की सेवाएं सीमित अवधि के लिए दोबारा ली जा सकती हैं। कॉलेजियम ने जिन नामों को स्वीकृति दी है, उनमें जस्टिस मोहम्मद फैज आलम खान, जस्टिस मोहम्मद असलम, जस्टिस सैयद आफताब हुसैन रिजवी, जस्टिस रेनू अग्रवाल और जस्टिस ज्योत्स्ना शर्मा शामिल हैं। कॉलेजियम की संस्तुति अब अंतिम औपचारिकताओं के लिए कानून मंत्रालय को भेजी जाएगी।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट देश के सबसे बड़े और व्यस्त कोर्ट्स में से एक माना जाता है। यहां मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जबकि जजों की कमी काफी समय से एक बड़ी समस्या बन चुकी है।
सेवानिवृत्त और अनुभवी जजों की एड-हॉक नियुक्ति से न सिर्फ कोर्ट की कार्यक्षमता में सुधार होगा, बल्कि पुराने और जटिल मामलों के निपटारे में भी तेजी आने की उम्मीद है।
हाईकोर्ट एरियर कमेटी की रिपोर्ट इस समस्या की असली वजह को साफ करती है। रिपोर्ट के मुताबिक, लंबित मामलों के बढ़ने का सबसे बड़ा कारण जजों की नियुक्ति में लगातार हो रही देरी है।
कमेटी का कहना है कि अगर समय रहते जजों की संख्या नहीं बढ़ाई गई, तो मामलों का बैकलाग खत्म करने में कुछ साल नहीं, बल्कि कई दशक लग सकते हैं।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आंकड़े इस चेतावनी को और भी गंभीर बना देते हैं। जबलपुर (मुख्यपीठ), इंदौर और ग्वालियर की खंडपीठों में जजों की संख्या 42 से बढ़ाकर 75 या 85 करना जरूरी है। अगर ऐसा नहीं होता है तो 4 लाख 80 हजार लंबित मामलों का निपटारा करने में 40 साल से भी ज्यादा वक्त लग सकता है।
इसी वजह से हाईकोर्ट ने अपनी स्वीकृत संख्या 53 से बढ़ाकर 85 जजों की अनुशंसा की है। फिलहाल यह सिफारिश केंद्र और राज्य सरकार के पास लंबित है।
ताजा आंकड़ों के मुताबिक, अगस्त 2025 के बाद एमपी हाईकोर्ट में जजों की संख्या 42-43 तक पहुंची है। यह पिछले दो दशकों के औसत से बेहतर है। इसका असर यह हुआ कि अगस्त 2025 से अब तक 84 हजार 455 नए मामले दर्ज हुए हैं।
इस दौरान 90 हजार 045 मामलों का निपटारा किया गया है। इससे लंबित मामलों में 5 हजार 590 की कमी आई है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि यही गति बनी रही, तो बैकलाग खत्म करने में 39-40 साल लग सकते हैं।
संवैधानिक जिम्मेदारी और
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 39-ए के तहत राज्य का दायित्व है कि वह हर नागरिक को न्याय तक समान और प्रभावी पहुंच सुनिश्चित करे। वहीं, जब न्याय में दशकों का समय लगने लगे, तो यह संवैधानिक वादा कमजोर पड़ने लगता है।
सुप्रीम कोर्ट भी इस पर चिंता जता चुका है। 2024 में इंदौर बनाम कर्नाटक राज्य मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि न्याय तक पहुंच तभी सार्थक है, जब न्याय त्वरित हो। वरना यह अधिकार सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाता है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट में पांच रिटायर्ड जजों की एड-हॉक नियुक्ति को एक जरूरी कदम माना जा रहा है। हालांकि यह स्थायी समाधान नहीं है। यह दिखाता है कि जजों की नियुक्ति और विशेष बेंचों के गठन पर गंभीरता से काम किया जाए, तो न्याय व्यवस्था पर दबाव कम हो सकता है।
अब सबकी नजरें सरकार पर हैं कि वह नियुक्ति प्रक्रिया में तेजी लाकर न्यायपालिका को मजबूत करे। ताकि न्याय केवल आदर्श न बने, बल्कि समय पर मिलने वाला वास्तविक अधिकार बने।
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इसका मकसद हाईकोर्ट के कामकाज को तेज करना और सालों से अटके मामलों का जल्द निपटारा करना है। ये फैसला 3 फरवरी 2026 को हुई कॉलेजियम की बैठक में लिया गया है।
संविधान का सहारा, अनुभव का उपयोग
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इलाहाबाद हाईकोर्ट पर बढ़ता बोझ
सेवानिवृत्त और अनुभवी जजों की एड-हॉक नियुक्ति से न सिर्फ कोर्ट की कार्यक्षमता में सुधार होगा, बल्कि पुराने और जटिल मामलों के निपटारे में भी तेजी आने की उम्मीद है।
एरियर कमेटी की चेतावनी
कमेटी का कहना है कि अगर समय रहते जजों की संख्या नहीं बढ़ाई गई, तो मामलों का बैकलाग खत्म करने में कुछ साल नहीं, बल्कि कई दशक लग सकते हैं।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की स्थिति: एक गंभीर उदाहरण
इसी वजह से हाईकोर्ट ने अपनी स्वीकृत संख्या 53 से बढ़ाकर 85 जजों की अनुशंसा की है। फिलहाल यह सिफारिश केंद्र और राज्य सरकार के पास लंबित है।
आंकड़ों में छिपी उम्मीद, लेकिन रास्ता लंबा
इस दौरान 90 हजार 045 मामलों का निपटारा किया गया है। इससे लंबित मामलों में 5 हजार 590 की कमी आई है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि यही गति बनी रही, तो बैकलाग खत्म करने में 39-40 साल लग सकते हैं।
संवैधानिक जिम्मेदारी और सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट भी इस पर चिंता जता चुका है। 2024 में इंदौर बनाम कर्नाटक राज्य मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि न्याय तक पहुंच तभी सार्थक है, जब न्याय त्वरित हो। वरना यह अधिकार सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाता है।
अस्थायी समाधान, लेकिन सही दिशा में कदम
अब सबकी नजरें सरकार पर हैं कि वह नियुक्ति प्रक्रिया में तेजी लाकर न्यायपालिका को मजबूत करे। ताकि न्याय केवल आदर्श न बने, बल्कि समय पर मिलने वाला वास्तविक अधिकार बने।
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