हाईमास्ट लाइट घोटाला : पूर्व विधायक जजपाल सिंह जज्जी की बढ़ेंगी मुश्किलें, लोकायुक्त फिर करेगा जांच

अशोकनगर के 68 लाख के हाईमास्ट लाइट घोटाले में कोर्ट ने लोकायुक्त की क्लोजर रिपोर्ट ठुकराई। पूर्व विधायक जजपाल सिंह जज्जी समेत 5 पर फिर लटकी जांच की तलवार।

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Sanjay Dhiman
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Highmast Light Scam Troubles for former MLA Jajpal Singh Jajji will increase

Photograph: (the sootr)

News In Short

  • 2015 के हाईमास्ट लाइट घोटाला में लोकायुक्त को दोबारा जांच के निर्देश मिले हैं।
  • नगर पालिका के अधिकारियों पर 68 लाख की लाइटों का अनुचित भुगतान करने का आरोप।
  • तत्कालीन नगर पालिका अध्यक्ष और अन्य अधिकारियों पर धोखाधड़ी का आरोप है।
  • एमपी एमएलए कोर्ट ने लोकायुक्त से साक्ष्य जुटाने के लिए खास निर्देश दिए हैं।
  • यदि साक्ष्य मिले, तो भ्रष्टाचार अधिनियम तहत आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई होगी।

News In Detail

Ashoknagar. 2015 में अशोकनगर के हाईमास्ट लाइट घोटाले में एमपी एमएलए कोर्ट ने लोकायुक्त पुलिस को दोबारा जांच करने के निर्देश दिए हैं। इस मामले में नगर पालिका के जिम्मेदारों पर कूट रचित दस्तावेज़ों का सहारा लेकर करीब 68 लाख रुपए की हाईमास्ट लाइट लगवाने का आरोप है। इस मामले में तत्कालीन नगर पालिका अध्यक्ष और पूर्व विधायक जजपाल सिंह जज्जी समेत कई अन्य सरकारी अधिकारी शामिल हैं। हालांकि एक आरोपी की मौत हो चुकी है।

घोटाले का खुलासा

यह घोटाला उस समय सामने आया जब नगर पालिका के पार्षद देवेंद्र ताम्रकार ने इसकी शिकायत लोकायुक्त से की थी। शिकायत पर कार्रवाई करते हुए लोकायुक्त पुलिस ने तत्कालीन नगर पालिका अध्यक्ष और अन्य आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज किया। जांच में यह सामने आया कि इन अधिकारियों ने सरकारी दस्तावेजों में हेराफेरी की और 4 हाईमास्ट लाइट की जगह 8 हाईमास्ट लाइट लगवाकर नगर पालिका को 33.39 लाख रुपए का नुकसान पहुंचाया।

लोकायुक्त को साक्ष्य जुटाने के निर्देश

  • एमपी एमएलए कोर्ट ग्वालियर ने लोकायुक्त को जांच में साक्ष्य जुटाने के निर्देश दिए हैं:
  • निविदा जारी करने से पहले प्रशासकीय और वित्तीय स्वीकृति प्राप्त क्यों नहीं की गई?
  • कार्यादेश जारी करते समय तकनीकी विशेषज्ञ की अनुशंसा क्यों नहीं ली गई?
  • अनुबंध पत्र और स्टाम्प पेपर के कागजात में बदलाव क्यों किए गए?

जांच में मिले धोखाधड़ी के सबूत

जांच में पाया गया कि इंदौर के ठेकेदार ने अनुबंध के दस्तावेज़ों में कूट रचना की थी। राजेश शर्मा द्वारा बिना सीएमओ के हस्ताक्षर के अनुबंध को तैयार किया गया और 58.76 लाख रुपए का भुगतान किया गया। यह राशि मूल लागत से अधिक थी, जिससे नगर पालिका को भारी नुकसान हुआ।

खात्मे को किया अस्वीकार

लोकायुक्त द्वारा पेश किया गया खात्मा कोर्ट ने अस्वीकार कर दिया। कोर्ट ने साक्ष्य जुटाने के लिए लोकायुक्त को दोबारा जांच के आदेश दिए हैं। यदि साक्ष्य मिले, तो आरोपियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई की जाएगी।

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