MP के बड़वानी में ग्रामीणों का कमाल, बिना सरकार की मदद के बना रहे 2 KM लंबी सड़क
Anjali Dwivedi | Jun 08, 2026, 18:12 IST
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मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले में उबादगढ़ के ग्रामीणों ने सरकारी उदासीनता से हारकर खुद फावड़ा उठा लिया। करीब 250 लोगों ने चंदा जुटाया, JCB मंगवाई और पहाड़ काटकर 2 किमी कच्ची सड़क बनाना शुरू किया। एक हफ्ते में आधा किमी बन चुकी है।
मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले की ग्राम पंचायत उबादगढ़ के खोड़ी फलास फलिया गांव की यह कहानी दशरथ मांझी की याद दिलाती है। सरकार से बार-बार गुहार लगाई, लेकिन इसके बाद भी सड़क नहीं बनी। थककर ग्रामीणों ने खुद फावड़ा उठाया, घर-घर से चंदा जुटाया, JCB मंगवाई और पहाड़ काटकर 2 किलोमीटर लंबी सड़क बनाने का काम शुरू कर दिया। एक हफ्ते में करीब आधा किलोमीटर सड़क बन चुकी है।
बड़वानी के पाटी ब्लॉक से लेकर जिला प्रशासन तक कई बार आवेदन दिए गए। कलेक्टर की जनसुनवाई में भी मदद की गुहार लगाई गई, लेकिन नेताओं और अफसरों ने सिर्फ खोखले वादे ही किए। हर बार की तरह इस बार भी कोई नतीजा नहीं निकला। सालों तक मिले इस आश्वासन और थकान के बाद, आखिरकार गांव के आदिवासी ग्रामीणों ने तय किया कि, अब वे किसी के भरोसे नहीं बैठेंगे और अपनी किस्मत खुद बदलेंगे।
ग्रामीणों ने एक दिन बैठक बुलाई। सबने मिलकर तय किया कि खुद सड़क बनाएंगे। चंदा जुटाने की मुहिम शुरू हुई। सक्षम लोगों ने दस-दस हजार रुपए दिए। बाकियों ने अपनी क्षमता के अनुसार योगदान दिया। इस तरह कुल 35 परिवारों और 250 लोगों का चंदा इकट्ठा हुआ। यह जनभागीदारी और हौसले की मिसाल बन गई।
चंदे से JCB मंगवाई गई, रास्ते की सफाई, समतलीकरण और बड़े-बड़े पत्थर हटाने का काम शुरू हुआ। ग्रामीण खुद फावड़े और कुदाल लेकर श्रमदान कर रहे हैं। युवाओं की दो टीमें बनाई गई हैं। रोज 35 से 40 ग्रामीण बारी-बारी काम पर आते हैं। महिलाएं भी पीछे नहीं हैं। वे पानी और भोजन की व्यवस्था संभाल रही हैं।
काम की रफ्तार देख सभी दंग हैं। मात्र एक हफ्ते के श्रमदान में करीब आधा किलोमीटर कच्ची सड़क तैयार हो गई है। अब लक्ष्य पूरे दो किलोमीटर की सड़क बनाने का है जो मुख्य सड़क को गांव से जोड़ेगी। गांव वाले रुकने वाले नहीं हैं।
यह सड़क इस गांव के लिए जीवन रेखा जैसी है। मुख्य सड़क को जोड़ने वाला यह रास्ता बारिश में मिट्टी-पानी से भर जाता था। गांव का संपर्क पूरी तरह टूट जाता था। बच्चों का स्कूल जाना बंद हो जाता था। किसानों को अपनी उपज बाजार तक नहीं पहुंचा पाते थे। मरीजों को अस्पताल ले जाना मुश्किल हो जाता था। यही तकलीफ ग्रामीणों को इस जज्बे तक ले आई।
ग्रामीणों के इस जज्बे (ग्रामीण सड़क निर्माण) को स्थानीय लोग बिहार के दशरथ मांझी का अवतार बता रहे हैं। दशरथ मांझी ने अकेले 22 साल में पहाड़ काटकर रास्ता बनाया था। यहां 250 लोग मिलकर यही काम कर रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां एक इंसान नहीं, पूरा गांव खड़ा है।
बिहार के गया जिले के गहलौर गांव में रहने वाले दशरथ मांझी (1934-2007) एक बेहद गरीब मजदूर थे, जिन्हें दुनिया माउंटेन मैन के नाम से जानती है। अपनी पत्नी के समय पर इलाज न मिलने और असमय निधन से दुखी होकर, उन्होंने अकेले ही ठान लिया कि वे उस पहाड़ को रास्ता बनाकर रहेंगे।
बिना किसी सरकारी मदद के, उन्होंने सिर्फ एक छेनी और हथौड़े के दम पर अकेले 22 साल (1960 से 1982) तक कड़ी मेहनत की और एक विशाल पहाड़ के बीच से रास्ता बना दिया ताकि भविष्य में किसी और के साथ ऐसा हादसा न हो।
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गुहार लगाई, सुनवाई नहीं हुई
ग्रामीणों ने एक दिन बैठक बुलाई। सबने मिलकर तय किया कि खुद सड़क बनाएंगे। चंदा जुटाने की मुहिम शुरू हुई। सक्षम लोगों ने दस-दस हजार रुपए दिए। बाकियों ने अपनी क्षमता के अनुसार योगदान दिया। इस तरह कुल 35 परिवारों और 250 लोगों का चंदा इकट्ठा हुआ। यह जनभागीदारी और हौसले की मिसाल बन गई।
एक हफ्ते में आधा किमी बनी सड़क
काम की रफ्तार देख सभी दंग हैं। मात्र एक हफ्ते के श्रमदान में करीब आधा किलोमीटर कच्ची सड़क तैयार हो गई है। अब लक्ष्य पूरे दो किलोमीटर की सड़क बनाने का है जो मुख्य सड़क को गांव से जोड़ेगी। गांव वाले रुकने वाले नहीं हैं।
बारिश में कट जाता था गांव
बिहार के दशरथ मांझी की याद
दशरथ मांझी कौन हैं?
बिना किसी सरकारी मदद के, उन्होंने सिर्फ एक छेनी और हथौड़े के दम पर अकेले 22 साल (1960 से 1982) तक कड़ी मेहनत की और एक विशाल पहाड़ के बीच से रास्ता बना दिया ताकि भविष्य में किसी और के साथ ऐसा हादसा न हो।
FAQ
- बड़वानी के उबादगढ़ गांव के ग्रामीणों ने सड़क क्यों बनाना शुरू किया?
पंचायत और जिला प्रशासन से सालों तक गुहार लगाने के बाद भी सड़क नहीं बनी। बारिश में इस आदिवासी गांव का मुख्य सड़क से संपर्क टूट जाता था। थककर 250 ग्रामीणों ने खुद चंदा जुटाया और श्रमदान से 2 किलोमीटर सड़क बनाने का काम शुरू किया। - इस सड़क निर्माण में कितने लोग और कितना पैसा लगा?
ग्राम पंचायत के करीब 35 परिवारों के 250 लोगों ने घर-घर से चंदा जुटाया। सक्षम लोगों ने दस-दस हजार रुपये दिए, बाकी ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार योगदान दिया। चंदे से JCB मंगवाई गई। रोज 35 से 40 ग्रामीण श्रमदान कर रहे हैं। - अभी तक कितनी सड़क बन चुकी है?
एक हफ्ते के श्रमदान में करीब आधा किलोमीटर कच्ची सड़क बन चुकी है। लक्ष्य 2 किलोमीटर लंबी सड़क बनाने का है जो गांव को मुख्य सड़क से जोड़ेगी।
एमपी राज्यसभा चुनाव: महेश केवट ने भरा पर्चा, दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर
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