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Photograph: (the sootr)
NEWS IN SHORT
- विधायक संजय उईके ने नक्सलियों के खात्मे और माइनिंग में गहरा संबंध बताया है।
- आदिवासियों के लिए जल, जंगल और जमीन देवता समान हैं, विनाश मंजूर नहीं है।
- बॉक्साइट खनन की अनुमति में पेसा कानून और फॉरेस्ट एक्ट की अनदेखी की गई।
- सरकारी सर्वे रिपोर्ट में वन्यप्राणी कॉरिडोर और 33 हजार की आबादी को छिपाया गया।
- प्रशासन को चेतावनी दी गई कि 18 फरवरी की जनसुनवाई तुरंत रद्द की जाए।
NEWS IN DETAIL
Balaghat. मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के कांग्रेस विधायक संजय उईके ने सरकार की खनन नीति पर सवाल उठाए हैं। विधायक का कहना है कि सरकार एक तरफ तो कहती है कि वो नक्सलियों का खात्मा कर रही है। लेकिन दूसरी तरफ, जैसे ही इलाका खाली होता है, वहां माइनिंग कंपनियों को एंट्री दे दी जाती है।
यह मामला सिर्फ राजनीति का नहीं है, बल्कि जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा का भी है। विधायक उईके ने साफ कहा कि हमारे लिए जंगल सिर्फ पेड़ नहीं, बल्कि हमारे देवता के समान हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि लौंगुर से लेकर पचामादादर के बीच बॉक्साइट माइनिंग की जो परमिशन दी गई है, वो पूरी तरह से नियमों के खिलाफ है।
पेसा कानून और आदिवासियों के अधिकारों की अनदेखी
विधायक ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में बहुत ही कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया है। उनका दावा है कि सरकार ने 'फॉरेस्ट रिजर्व एक्ट' और 'पेसा कानून' को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। पेसा कानून आदिवासियों को अपनी जमीन और संसाधनों पर मालिकाना हक देता है। लेकिन विधायक का आरोप है कि यहां बिना ग्राम सभा की सही सहमति के माइनिंग का रास्ता साफ किया जा रहा है।
संजय उईके ने सरकार से पूछा कि क्या आदिवासियों का विकास सिर्फ उनकी जमीन छीनकर ही होगा? उन्होंने चेतावनी दी है कि आदिवासी समाज अपना विनाश चुपचाप बैठकर कभी नहीं देखेगा।
सरकारी सर्वे रिपोर्ट पर उठे सवाल
सबसे ज्यादा हैरानी की बात उस सर्वे रिपोर्ट को लेकर है, जिसके आधार पर माइनिंग की मंजूरी दी जा रही है। सरकारी विभाग की रिपोर्ट कहती है कि इस इलाके में कोई वन्यप्राणी नहीं रहते और न ही कोई आदिवासी निवास है। लेकिन विधायक ने इसे सफेद झूठ करार दिया है।
हकीकत यह है कि यह इलाका कान्हा और पेंच नेशनल पार्क के बीच का मुख्य कॉरिडोर है। यहां से बाघ और अन्य जानवर गुजरते हैं। इतना ही नहीं, सरकारी दस्तावेजों के ही अनुसार यहां की 14 पंचायतों के 46 गांवों में लगभग 33 हजार लोग रहते हैं। सवाल यह उठता है कि क्या 33 हजार लोग सरकार को दिखाई नहीं दे रहे?
विधानसभा से सड़क तक चलेगी लड़ाई
विधायक संजय उईके ने एक और गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने इस मुद्दे को विधानसभा में उठाना चाहा, तो उनके सवाल को जानबूझकर रोक दिया गया। सरकार चर्चा से भाग रही है, क्योंकि उनके पास आदिवासियों के सवालों का कोई जवाब नहीं है।
अब इस मामले में जिला पंचायत सदस्य मंशाराम मड़ावी ने भी मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने 18 फरवरी को होने वाली जनसुनवाई को तुरंत रोकने की मांग की है। उन्होंने प्रशासन को अल्टीमेटम दिया है कि अगर जनसुनवाई नहीं रुकी, तो तहसील मुख्यालय पर बड़ा उग्र आंदोलन किया जाएगा।
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