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News In Short
- एम्स भोपाल में पहली बार फेफड़ों की सफाई कर मरीजों की जान बचाई।
- स्टोन क्रशर में काम करने वाले मजदूर के फेफड़ों में धूल जम गई थी।
- सांस की नली में ट्यूमर के बावजूद Y-शेप्ड स्टेंट डालकर फेफड़े चालू किए।
- डॉ. अभिनव चौबे और डॉ. अल्केश खुराना ने इस जटिल सर्जरी को पूरा किया।
- अब एमपी में ही लंग्स कैंसर जैसे रोगों का इलाज संभव हो सकेगा।
News In Detail
Bhopal: मध्य प्रदेश के एम्स भोपाल के पल्मोनरी मेडिसिन विभाग ने चिकित्सा के क्षेत्र में एक नई इबारत लिखी है। यहां के डॉक्टरों ने दो ऐसे मरीजों को नई जिंदगी दी है, जो लगभग अपनी अंतिम सांसें गिन रहे थे। एम्स की टीम ने उन जटिल प्रक्रियाओं को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है, जो अब तक देश के बड़े और चुनिंदा अस्पतालों में ही मुमकिन थीं।
कैसे निकली फेफड़ों में जमी धूल
इस सफलता की सबसे पहली कहानी एक मजदूर की है, जो स्टोन क्रशर में काम करता था। लंबे समय तक पत्थर की धूल के संपर्क में रहने के कारण उसके फेफड़ों में धूल की मोटी परत जमा हो गई थी। इससे उसे पल्मोनरी एल्वियोलर प्रोटिनोसिस नामक गंभीर बीमारी हो गई। फेफड़ों की वायु थैलियां एक गाढ़े पदार्थ से भर चुकी थीं, जिससे ऑक्सीजन का आदान-प्रदान लगभग रुक गया था।
डॉ. अभिनव चौबे और डॉ. अल्केश खुराना की टीम ने इस चुनौती को स्वीकार किया। उन्होंने होल लंग लैवेज तकनीक का सहारा लिया। इस प्रक्रिया में फेफड़ों की गहराई से सफाई की जाती है। सफाई के बाद मरीज के ऑक्सीजन लेवल में जादुई सुधार देखने को मिला और वह अब स्वस्थ है।
कैंसर मरीज को मिली राहत
दूसरी सफलता श्वसन मार्ग के कैंसर से जूझ रहे एक मरीज से जुड़ी है। ट्यूमर इस कदर बढ़ गया था कि उसने मुख्य सांस नली को ही ब्लॉक कर दिया था, जिसके कारण मरीज का एक फेफड़ा पूरी तरह निष्क्रिय (Inactive) हो गया था। डॉक्टरों ने पहले ब्रोंकोस्कोपिक डिबल्किंग के जरिए ट्यूमर को हटाया। इसके बाद, सांस लेने का रास्ता खुला रखने के लिए एक विशेष Y-शेप्ड मेटल स्टेंट डाला गया। इस सटीक प्रक्रिया के बाद मरीज का फेफड़ा फिर से काम करने लगा।
टीम वर्क और मध्य प्रदेश के लिए नई उम्मीद
इन दोनों जटिल ऑपरेशनों में एनेस्थीसिया और सीटीव्हीएस विभाग के डॉक्टरों का भी कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग रहा। एम्स भोपाल के इस सफल प्रयोग ने मध्य प्रदेश और आसपास के राज्यों के मरीजों के लिए उम्मीद की नई किरण जगाई है। अब सिलिकोसिस और श्वसन मार्ग के कैंसर के मरीजों को इलाज के लिए दिल्ली या मुंबई जैसे बड़े शहरों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।
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