MP की राजधानी में बन रहे थे आतंकवादियों के पासपोर्ट: दो अफसरों समेत 4 को जेल

Amresh Kushwaha | Jul 01, 2026, 12:33 IST
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MP की राजधानी में बन रहे थे आतंकवादियों के पासपोर्ट
MP की राजधानी में बन रहे थे आतंकवादियों के पासपोर्ट

भोपाल में एक आतंकी के लिए फर्जी पासपोर्ट बनाने वाले दो अफसरों, एक क्लर्क और एक एजेंट को कोर्ट ने तीन साल की सजा दी है। यह मामला 2002 में दर्ज हुआ था। वहीं, 24 साल बाद फैसला आया है।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • भोपाल में आतंकी के लिए फर्जी पासपोर्ट बनाया गया था।
  • इस मामले में दो पासपोर्ट अफसर शामिल थे।
  • कोर्ट ने चार लोगों को तीन साल की सजा दी है।
  • यह केस 2002 में दर्ज हुआ था।
  • 24 साल बाद कोर्ट का फैसला आया है।
भोपाल की एक अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। एक आतंकी के लिए फर्जी पासपोर्ट बनाने वाले चार लोगों को जेल भेजा गया है। इनमें दो पासपोर्ट अफसर, एक क्लर्क और एक एजेंट शामिल हैं। कोर्ट ने सभी को तीन-तीन साल की सश्रम कारावास की सजा दी है। यह फैसला मंगलवार को आया है। यह मामला पूरे 24 साल पुराना है।

फर्जी पासपोर्ट कैसे बना

यह पूरा मामला नवाब खान से जुड़ा है। नवाब खान को समीर और सलमान के नाम से भी जाना जाता था। वह आतंकी गतिविधियों में शामिल था। उसने एक पुलिस जवान की हत्या की थी। हत्या के बाद वह फरार हो गया था। पहचान छिपाने के लिए वह शाजापुर आ गया था। वहां वह एक नई पहचान बनाकर रहने लगा।

शाजापुर में उसे अबू बकर नाम के एजेंट से मदद मिली थी। अबू बकर ने सुभाष व्यास के जरिए फर्जी दस्तावेज तैयार कराए। इन दस्तावेजों में राशन कार्ड और अंक सूची शामिल थी। मूल निवासी प्रमाण पत्र भी फर्जी तरीके से बनाया गया। इन्हीं दस्तावेजों के सहारे 1997 में भोपाल पासपोर्ट कार्यालय में आवेदन किया गया। कुछ महीनों में ही फर्जी पासपोर्ट बनवा लिया गया था।

2002 में दर्ज हुआ केस

नवाब खान फर्जी पासपोर्ट के सहारे भारत से भाग गया था। इसी वजह से पूरा मामला उजागर हुआ। सीआईडी (CID - Crime Investigation Department) पुलिस ने इसकी जांच शुरू की थी। जांच के बाद 2002 में मामला दर्ज किया गया था। इसमें तत्कालीन कार्यवाहक पासपोर्ट अधिकारी तुलसीदास शर्मा को आरोपी बनाया गया था। तुलसीदास शर्मा अभी मुंबई में तैनात हैं।

इसके साथ ही तत्कालीन पासपोर्ट प्रदाता अधिकारी देवेंद्र जैन को भी आरोपी बनाया गया था। कार्यालय क्लर्क सुनील कुमार राजक का नाम भी शामिल किया गया है। एजेंट अबू बकर को भी आरोपी बनाया गया था। सुभाष व्यास को भी सह-आरोपी बनाया गया था। सुभाष पर फर्जी दस्तावेज बनाने में मदद का आरोप था। हालांकि कोर्ट में उनका दोष साबित नहीं हो सका। इसी वजह से उन्हें बरी कर दिया गया।

पाकिस्तान भागा आतंकी

फर्जी पासपोर्ट मिलने के बाद नवाब खान ने वीजा बनवाया। इसके बाद 1998 में वह पाकिस्तान भाग गया। वहां उसने आईएसआई (ISI - Inter-Services Intelligence) की मदद ली। आईएसआई से उसने हथियार चलाने की ट्रेनिंग ली। वीजा की अवधि खत्म होने के बाद वह नेपाल के रास्ते भारत लौटा। लौटते समय उसने अपना पासपोर्ट जला दिया था। भारत आने के बाद वह गुजरात पहुंचा। गुजरात में उसने कई बम धमाकों को अंजाम दिया। इन धमाकों में कई लोग प्रभावित हुए थे। बाद में गुजरात पुलिस के साथ मुकाबले में वह मारा गया।

कैसे हुई गड़बड़ी

इस पूरे मामले में कई बड़ी अनियमितताएं सामने आई हैं। शाजापुर एसपी (SP - Superintendent of Police) ने नवाब खान की पुलिस वेरिफिकेशन रिपोर्ट नकारात्मक भेजी थी। इसका मतलब था कि पासपोर्ट नहीं बनना चाहिए था। इसके बावजूद पासपोर्ट कार्यालय के अफसरों ने मिलीभगत की। शाजापुर से आई नकारात्मक रिपोर्ट को बदल दिया गया था। उसकी जगह एक दूसरी रिपोर्ट लगा दी गई थी। नियम के मुताबिक पासपोर्ट आवेदक के घर के पते पर भेजा जाता है। वहीं, इस मामले में ऐसा नहीं हुआ। अबू बकर की मदद से पासपोर्ट सीधे हाथ में दे दिया गया था। इससे साफ है कि यह पूरी साजिश सुनियोजित थी।

कोर्ट का फैसला

यह पूरा मामला भोपाल जिला न्यायालय में चला। अपर सत्र न्यायाधीश राजेश्वरी श्रीवास्तव की कोर्ट ने इस पर फैसला सुनाया। कोर्ट ने तुलसीदास शर्मा, देवेंद्र जैन, सुनील कुमार राजक और अबू बकर को दोषी माना। कोर्ट ने चारों को तीन-तीन साल के सश्रम कारावास की सजा दी है।

सश्रम कारावास का मतलब है सजा के दौरान मेहनत का काम भी करना होगा। इस फैसले से साफ है कि सरकारी अफसरों की मिलीभगत भी उतनी ही गंभीर मानी गई है। 24 साल बाद आया यह फैसला सिस्टम की जवाबदेही की मिसाल बन गया है।

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