सरकारी कॉलेजों में जनभागीदारी समितियां गायब, विकास रुका या राजनीतिक इंतजार?
Ramanand Tiwari | Jul 09, 2026, 20:39 IST
Photograph: (THESOOTR)
BHOPAL. मध्य प्रदेश के 473 सरकारी कॉलेज करीब एक साल से जनभागीदारी समितियों के बिना चल रहे हैं। नियुक्तियां लंबित होने से विकास कार्य, नए कोर्स और अतिथि शिक्षक नियुक्तियां प्रभावित हैं।
ऐसे समझें क्या है पूरा मामला...
- प्रदेश के 40 जिलों के करीब 473 सरकारी कॉलेजों में समितियां खाली।
- करीब एक वर्ष से अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्तियां लंबित।
- नए कोर्स, अतिथि शिक्षक और विकास कार्यों के प्रस्ताव प्रभावित।
- सरकार के कार्यकाल में अब करीब दो वर्ष का समय शेष।
- देर से होने वाली नियुक्तियों की उपयोगिता पर उठ रहे सवाल।
विकास से ज्यादा राजनीतिक नियुक्तियों की चर्चा
राजनीतिक नियुक्तियां लंबित रहने से विकास कार्यों की रफ्तार धीमी पड़ी है। वहीं भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच भी यह चर्चा तेज है कि उन्हें जिम्मेदारी आखिर कब मिलेगी।
देर से बनी समितियां कितना बदल पाएंगी हालात?
कई अहम फैसले फाइलों में अटके
फिलहाल कौन संभाल रहा व्यवस्था?
हालांकि प्रशासनिक व्यस्तताओं के कारण नियमित बैठकें नहीं हो पा रहीं। इसका असर निर्णय प्रक्रिया पर भी दिखाई दे रहा है और कई प्रस्ताव अभी तक मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं।
1997 में शुरू हुई थी जनभागीदारी व्यवस्था
समिति में सामान्य परिषद, प्रबंध समिति और वित्त समिति शामिल होती हैं। अध्यक्ष का मनोनयन शासन करता है, कलेक्टर उपाध्यक्ष और महाविद्यालय के प्राचार्य सचिव होते हैं। प्रत्येक समिति में औसतन 20 सदस्य शामिल किए जाते हैं।
कोरोना के बाद नहीं लौट सकी व्यवस्था
जनभागीदारी समिति की प्रमुख जिम्मेदारियां...
- महाविद्यालय के विकास की योजना तैयार करना।
- जनसहयोग और अन्य स्रोतों से संसाधन जुटाना।
- अतिथि शिक्षकों एवं कर्मचारियों की नियुक्ति करना।
- भवन, प्रयोगशाला और खेल सुविधाओं का विस्तार।
- स्व-वित्तपोषित पाठ्यक्रमों की फीस तय करना।
- नए कोर्स और शैक्षणिक नवाचारों को मंजूरी देना।
सबसे बड़ा सवाल
यदि निर्णय में और देरी होती है तो क्या नई समितियां वास्तव में कॉलेजों के विकास को गति दे पाएंगी, या फिर यह पूरा मामला केवल राजनीतिक नियुक्तियों तक सीमित रह जाएगा? यही सवाल अब शिक्षा जगत और राजनीतिक गलियारों दोनों में चर्चा का विषय बन गया है।
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