दमोह पुलिस के विस्फोटक केस का सच, हाईकोर्ट में गवाह पलटा

Neel Tiwari | Jan 12, 2026, 23:27 IST
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damoh explosive case
Photograph: (thesootr)

दमोह विस्फोटक केस में गवाह के पलटते ही जेल से बाहर आया कैलाश सिंह ठाकुर। 8 महीने बाद हाईकोर्ट ने उसे जमानत दी, पुलिस का दावा झूठा साबित हुआ।

News in Short

  • दमोह कोतवाली पुलिस द्वारा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम में गिरफ्तार कैलाश सिंह ठाकुर को 8 माह बाद मध्यप्रदेश हाईकोर्ट से जमानत मिली।
  • पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर हथगोले बरामद करने का दावा किया था, लेकिन ट्रायल कोर्ट में राहगीर गवाह सरफराज खान पूरी तरह पलट गया।
  • गवाह के बयान से पुलिस की कहानी अदालत में बेनकाब हुई और अभियोजन का केस कमजोर पड़ गया।
  • अधिवक्ता विवेक तिवारी की पैरवी में हाईकोर्ट की तीसरी जमानत याचिका पर सुनवाई हुई, जिसमें सभी तथ्य सामने रखे गए।
  • जस्टिस प्रमोद कुमार अग्रवाल ने लंबी जेल अवधि और गवाह के बयान को आधार बनाकर कैलाश को जमानत का आदेश दिया।

News in Detail

कहते हैं पुलिस चाहे तो सच गढ़ सकती है, लेकिन अदालत में जब साक्ष्य बोलते हैं तो झूठ ज्यादा देर टिक नहीं पाता। दमोह जिले के बहुचर्चित विस्फोटक पदार्थ मामले में यही देखने को मिला।

जहां दमोह कोतवाली पुलिस द्वारा रची गई पूरी कहानी एक गवाह के बयान से अदालत में धराशायी हो गई। नतीजा यह हुआ कि करीब 8 महीने से जेल में बंद कैलाश सिंह ठाकुर को आखिरकार मध्यप्रदेश हाईकोर्ट से जमानत मिल गई।

तीसरी कोशिश में खुला जेल का दरवाजा

दमोह निवासी कैलाश सिंह ठाकुर को पुलिस ने अरबाज खान और मोनू रैकवार के साथ विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4/5 के तहत गिरफ्तार किया था। निचली अदालत से लेकर हाईकोर्ट तक कैलाश की दो जमानत याचिकाएं खारिज हो चुकी थीं।

जेल में बीतता हर दिन उसके परिवार, खासकर बुजुर्ग मां के लिए भारी पड़ रहा था। आखिरकार मां ने हाईकोर्ट के अधिवक्ता विवेक तिवारी से संपर्क किया। पूरी केस फाइल खंगालने के बाद तीसरी बार जमानत याचिका दायर की गई।

इस पर 11 जनवरी को मुख्य पीठ जबलपुर में जस्टिस प्रमोद कुमार अग्रवाल के समक्ष सुनवाई हुई। ठोस तर्कों और रिकॉर्ड पर आए तथ्यों के आधार पर अदालत ने कैलाश को जमानत पर रिहा करने का आदेश दे दिया।

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गवाह पलटा, पुलिस का पूरा केस ढह गया

दमोह विस्फोटक केस मामले की सबसे अहम कड़ी बना साक्षी नंबर-2 सरफराज खान, जिसे पुलिस ने कथित तौर पर “राह चलते गवाह” बनाया था। ट्रायल कोर्ट में गवाही के दौरान सरफराज ने साफ कह दिया कि उसने किसी प्रकार की बरामदगी नहीं देखी।

पुलिस की कोई कार्रवाई उसके सामने नहीं हुई वह आरोपियों को पहचानता तक नहीं है। गवाह के इस बयान ने पुलिस की पूरी कहानी पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया और यही तथ्य हाईकोर्ट में कैलाश की जमानत का मजबूत आधार बना।

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पुलिस ने क्या दावा किया था

दमोह कोतवाली पुलिस का कहना था कि 17 मई 2025 को मुखबिर से सूचना मिली थी कि चमड़ा फैक्ट्री के खुले मैदान में तीन लोग थैले में हथगोले लेकर किसी बड़ी वारदात की फिराक में खड़े हैं।

सूचना पर पुलिस टीम मौके पर पहुंची और तीन हथगोले बरामद कर तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। लेकिन अदालत में यही कहानी टिक नहीं पाई।



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मां की उम्मीद और वकीलों की मेहनत लाई रंग

नवंबर 2025 के अंतिम सप्ताह में दाखिल जमानत याचिका पर शीतकालीन अवकाश के कारण सुनवाई टलती रही। इस दौरान कैलाश की मां हर दिन एक ही सवाल पूछती रहीं- “बेटा कब बाहर आएगा?”

अधिवक्ता विवेक तिवारी के साथ अधिवक्ता निशांत मिश्रा और मोहसिन खान ने केस के हर पहलू पर गहन रिसर्च की, जिसका परिणाम अंततः न्याय के रूप में सामने आया।

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न्याय की जीत, सवालों के घेरे में पुलिस

कैलाश सिंह ठाकुर की रिहाई न सिर्फ एक व्यक्ति की आज़ादी है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करती है कि क्या गंभीर धाराओं में फंसाए गए मामलों की निष्पक्ष जांच हो रही है? यह मामला एक बार फिर साबित करता है कि अदालत में साक्ष्य ही अंतिम सत्य होता है, और देर से ही सही- न्याय मिलता जरूर है।



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