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Photograph: (THESOOTR)
BHOPAL. हमारे देश में सम्मान की परंपरा पुरानी है, लेकिन क्या सम्मान का अर्थ हमेशा झुक जाना ही होता है? क्या राजनीति में पद, उम्र और अनुभव से ऊपर किसी एक परिवार या विरासत का स्थान हो सकता है? ग्वालियर-चंबल अंचल से सामने आया एक वीडियो इन्हीं सवालों को जन्म देता है और राजनीति की आत्मा पर बहस छेड़ देता है।
ये मामला 5 जनवरी का है। शिवपुरी में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान बीजेपी के वरिष्ठ विधायक देवेंद्र जैन मंच पर केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के बेटे महाआर्यमन सिंधिया के पैर छूते नजर आ रहे हैं। यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो साधारण नहीं है, क्योंकि इसमें 73 साल के विधायक जी अपने से 43 साल छोटे युवा नेता के चरणों में झुकते नजर आ रहे हैं।
सम्मान या सियासी मजबूरी?
भारतीय संस्कृति में पैर छूना सम्मान, आदर और आशीर्वाद लेने का प्रतीक है। परिवार, गुरु, बुजुर्ग या संतों के चरण छूना सामाजिक संस्कार का हिस्सा है। सवाल तब उठता है जब यही परंपरा सत्ता और राजनीति के मंच पर इस तरह दिखाई दे। क्या यहां भावनात्मक सम्मान है या सत्ता संतुलन की मजबूरी?
देवेंद्र जैन साधारण कार्यकर्ता नहीं हैं। वह सात दशक की उम्र पार कर चुके हैं, विधायक हैं, राजनीति का लंबा अनुभव रखते हैं। उनके सामने महाआर्यमन सिंधिया हैं, जो उम्र में उनसे 43 साल छोटे हैं। राजनीति तो अभी शुरू ही हुई है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह झुकना व्यक्ति के प्रति है या उस विरासत के प्रति, जो सत्ता और प्रभाव का हिस्सा है।
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सोशल मीडिया पर लोगों ने लिखा...
राजनीति में उम्र और अनुभव का अपना महत्व होता है। विधायक देवेंद्र जैन 73 साल के हैं। महाआर्यमन सिंधिया 30 साल के। उम्र का यह फासला केवल आंकड़ा नहीं है, यह अनुभव, संघर्ष और समय का अंतर है। सवाल यह है कि क्या अब लोकतंत्र में अनुभव की जगह केवल विरासत ने ले ली है?
सोशल मीडिया पर कई लोगों ने लिखा कि यह नजारा सत्ता के केंद्र को खुश रखने की कोशिश है। कुछ ने इसे चरण वंदना की संस्कृति कहा तो कुछ ने इसे आत्मसम्मान से समझौता बताया। यह बहस केवल देवेंद्र जैन या महाआर्यमन सिंधिया तक सीमित नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक ढांचे पर सवाल उठाती है जहां वरिष्ठता, अनुभव और जनप्रतिनिधित्व गौण होता जा रहा है।
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सिंधिया परिवार और प्रभाव की राजनीति
यह भी गौर करने वाली बात है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया स्वयं देवेंद्र जैन से उम्र में छोटे हैं। सिंधिया 55 साल के हैं और देवेंद्र जैन उनसे 18 साल बड़े।
इसके बावजूद राजनीति में सिंधिया का कद बड़ा है। वह गुना-शिवपुरी से सांसद हैं। केंद्रीय मंत्री हैं और ग्वालियर-चंबल अंचल में उनका प्रभाव निर्विवाद है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह झुकाव व्यक्तिगत सम्मान से ज्यादा राजनीतिक प्रभाव का परिणाम है?
महानआर्यमन सिंधिया मध्यप्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष भी हैं। उनके पास संगठनात्मक और पारिवारिक प्रभाव है, लेकिन क्या लोकतंत्र में प्रभाव का अर्थ यह होना चाहिए कि अनुभवी जनप्रतिनिधि भी सार्वजनिक मंच पर इस तरह झुकें?
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विरासत बनाम लोकतंत्र
यह वीडियो बड़ी बहस की ओर इशारा करता है। क्या भारतीय राजनीति धीरे-धीरे वंशवाद के उस मोड़ पर पहुंच रही है, जहां नाम और परिवार अनुभव से ऊपर हो गया है? क्या युवा होना और प्रभावशाली परिवार से आना अपने आप में इतना बड़ा गुण बन गया है कि उम्र और संघर्ष गौण हो जाएं?
यह सवाल भी अहम है कि इससे समाज को क्या संदेश जाता है। जब एक वरिष्ठ विधायक इस तरह झुकता है, तो कार्यकर्ताओं, युवाओं और आम नागरिकों के मन में यह धारणा बनती है कि राजनीति में आगे बढ़ने के लिए सिद्धांत या संघर्ष नहीं, बल्कि सही व्यक्ति के चरणों में होना ज्यादा जरूरी है।
सवाल जो अनुत्तरित हैं...
- क्या यह व्यक्तिगत श्रद्धा थी या राजनीतिक संकेत?
- क्या देवेंद्र जैन ने यह कदम अपनी मर्जी से उठाया या सत्ता समीकरणों की मजबूरी थी?
- क्या राजनीति में सम्मान अब बराबरी का नहीं, बल्कि प्रभाव का पैमाना बन चुका है?
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