चुनाव आयोग ने वोटर फॉर्म 6 से SIR डिक्लेरेशन हटाया, आयुक्तों के विरोध के बाद बदला फैसला
Aman Vaishnav | Nov 04, 2026, 10:36 IST
चुनाव आयोग ने वोटर फॉर्म 6 से SIR डिक्लेरेशन हटाया, आयुक्तों के विरोध के बाद बदला फैसला
आप नया वोटर आईडी कार्ड बनवाने के लिए ऑनलाइन फॉर्म 6 भरने जा रहे हैं, तो आपके लिए यह जानना बहुत जरूरी है। भारतीय चुनाव आयोग ने उन राज्यों के लिए एक बड़ा बदलाव किया है जहां अभी SIR का काम चल रहा है। आयोग ने नए वोटर रजिस्ट्रेशन के ऑनलाइन फॉर्म 6 से SIR से जुड़ा डिक्लेरेशन कॉलम अब पूरी तरह से हटा दिया है।
अब नए आवेदकों को फॉर्म 6 भरते समय इस डिक्लेरेशन को उसी फॉर्म के अंदर भरने की मजबूरी नहीं होगी। आयोग ने इसे अब पोर्टल पर एक अलग दस्तावेज के रूप में रख दिया है।
दरअसल नया वोटर बनने के लिए हर किसी को फॉर्म 6 भरना पड़ता है। चुनाव आयोग ने जुलाई के महीने में इस फॉर्म के सेक्शन J और K के बीच SIR से जुड़ा एक अतिरिक्त डिक्लेरेशन जोड़ दिया था।
इस डिक्लेरेशन में नए आवेदक को तीन में से किसी एक विकल्प को चुनना ही पड़ता था।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयोग के भीतर ही इस कदम का भारी विरोध हुआ था। दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस पर गंभीर सवाल खड़े किए थे।
इस पूरे मामले में पिछले छह हफ्तों के दौरान चुनाव आयोग का रुख लगातार बदलता रहा है।
26 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए गए एक हलफनामे में चुनाव आयोग ने अपनी स्थिति साफ की। आयोग का कहना था कि उसने यह डिक्लेरेशन आवेदकों की सुविधा के लिए ही फॉर्म 6 में एक साथ रखा था।
दोनों फॉर्म अलग-अलग होते, तो आवेदक को दो बार अलग-अलग ओटीपी डालने पड़ते। साथ ही दो बार ई-साइन करने पड़ते। दोनों को साथ रखने से एक ही ओटीपी और एक ही डिजिटल साइन से काम पूरा हो रहा था।
हालांकि आयोग ने अदालत में यह बात भी स्वीकार की कि ऑनलाइन पोर्टल पर जिस तरीके से इसे दिखाया गया था, उससे लोगों को यह भ्रम हो सकता था कि मूल फॉर्म 6 में ही बदलाव कर दिया गया है। आयोग ने यह भी साफ माना कि फॉर्म 6 के फॉर्मेट में कोई भी बदलाव केवल केंद्र सरकार ही कर सकती है।
फॉर्म 6 में क्या था वह विवादित SIR डिक्लेरेशन?
इस डिक्लेरेशन में नए आवेदक को तीन में से किसी एक विकल्प को चुनना ही पड़ता था।
- क्या उनका नाम 2000 के दशक की शुरुआत में हुए पिछले SIR की वोटर लिस्ट में था?
- क्या उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम उस पुरानी वोटर लिस्ट में दर्ज था?
- क्या न तो उनका और न ही उनके माता-पिता का नाम उस लिस्ट में शामिल था?
दो चुनाव आयुक्तों ने क्यों उठाया था कड़ा ऐतराज?
चुनाव आयुक्त विवेक जोशी का रुख: उन्होंने 16 मई को ही इस पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। उनका साफ कहना था कि नियमों में बिना किसी कानूनी बदलाव के फॉर्म 6 में ऐसा कोई नया कॉलम नहीं जोड़ा जा सकता है।चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू का कड़ा विरोध: इसके बाद 13 अगस्त को उन्होंने इस फैसले को अनऑथराइज्ड और पूरी तरह गैर-कानूनी करार दिया था। उन्होंने इसे तुरंत वापस लेने की मांग की। संधू ने याद दिलाया कि फॉर्म 6 का पूरा ढांचा रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स 1960 (Registration of Electors Rules 1960) के तहत तय होता है। इसे बदलने का कानूनी अधिकार सिर्फ और सिर्फ केंद्र सरकार के पास है।
छह हफ्तों में आयोग ने कैसे बदले तीन बार अपने बयान?
- 23 सितंबर को पहला बयान: जब मीडिया में यह खबर सामने आई, तब आयोग ने कहा कि उसके सारे फैसले कानून के तहत हैं। बीते एक साल के सभी बड़े फैसले पूरे आयोग की आपसी सहमति से हुए हैं।
- 26 सितंबर को दूसरा बयान: फुल कमीशन की बैठक के बाद आयोग ने दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म 6 के साथ जोड़े गए इस डिक्लेरेशन को सही ठहराया है। वहीं 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति साफ करते हुए कहा कि उसने बदले हुए फॉर्म 6 को न तो कोई मंजूरी दी थी और न ही खारिज किया था।
- 21 अक्टूबर को तीसरा और अंतिम फैसला: आखिरकार 21 अक्टूबर को चुनाव आयोग के इलेक्टोरल रोल डिवीजन ने डिक्लेरेशन फॉर्म को फॉर्म 6 से अलग करने का फैसला कर लिया।
चुनाव आयोग ने पहले इसे क्यों जोड़ा था?
दोनों फॉर्म अलग-अलग होते, तो आवेदक को दो बार अलग-अलग ओटीपी डालने पड़ते। साथ ही दो बार ई-साइन करने पड़ते। दोनों को साथ रखने से एक ही ओटीपी और एक ही डिजिटल साइन से काम पूरा हो रहा था।
हालांकि आयोग ने अदालत में यह बात भी स्वीकार की कि ऑनलाइन पोर्टल पर जिस तरीके से इसे दिखाया गया था, उससे लोगों को यह भ्रम हो सकता था कि मूल फॉर्म 6 में ही बदलाव कर दिया गया है। आयोग ने यह भी साफ माना कि फॉर्म 6 के फॉर्मेट में कोई भी बदलाव केवल केंद्र सरकार ही कर सकती है।
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