चुनाव आयोग के 9 फैसले: संधू-जोशी की आपत्तियों के बाद बदले नियम, फॉर्म 6 पर सवाल बरकरार
Sumit Kumar | Sootr Creatives | Sept 27, 2026, 13:17 IST
Election Commission meeting room representing the nine decisions and the ongoing form 6 dispute in India's electoral process
शनिवार को हुई बैठक में चुनाव आयोग ने नौ बड़े फैसले लिए। ये फैसले चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की करीब 10 महीने पुरानी आपत्तियों के जवाब माने जा रहे हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की अध्यक्षता में हुई बैठक में एजेंडा बांटने से लेकर आईटी सिस्टम तक कई बदलाव किए गए।
हालांकि, फॉर्म 6 में बदलाव को लेकर विवाद क्यों हुआ और पश्चिम बंगाल में मतदाता अपील का फैसला किसकी मंजूरी से हुआ, इन सवालों पर चुनाव आयोग का विवाद अभी भी बना हुआ है।
तीन दिन पहले आयोग ने इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट का जवाब दिया था। रिपोर्ट में आयोग के कामकाज पर कई सवाल उठाए गए थे।
चुनाव आयोग ने शनिवार, 26 सितंबर को नौ नए फैसले सुनाए। ये फैसले चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की आपत्तियों के बाद आए हैं। दोनों आयुक्तों ने पिछले दस महीनों में 14 बार अपनी चिंताएं सामने रखी थीं। हालांकि, फॉर्म 6 और पश्चिम बंगाल में मतदाता अपील जैसे कुछ बड़े सवाल अब भी साफ नहीं हुए हैं। आयोग आगे किस तरह काम करेगा, इसकी तस्वीर भी अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
इन नौ फैसलों के पीछे मुख्य वजह चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां ही थीं। मामला मतदाता पंजीकरण से जुड़े फैसलों का था। यानी कौन व्यक्ति वोटर बनेगा, किसका नाम हटाया जाएगा और नाम हटने या जुड़ने के बाद अपील का अधिकार किसे होगा। इन मुद्दों पर आयोग के भीतर सवाल उठाए गए थे।
आयोग ने पहले इन टिप्पणियों को सिर्फ "सुझाव" बताया था। आयोग का कहना था कि बड़े फैसले सर्वसम्मति से हुए हैं। लेकिन शनिवार की बैठक ने तस्वीर बदल दी।
बैठक के बाद चुनाव आयोग ने चार पन्नों का नोट जारी किया। इसमें आयोग के नौ नए फैसलों की जानकारी दी गई है। अब आगे से हर बैठक से पहले उसका एजेंडा सभी सदस्यों को दिया जाएगा और बैठक के बाद कार्यवृत्त यानी बैठक में क्या-क्या तय हुआ, उसका रिकॉर्ड भी जारी किया जाएगा।
इसके अलावा, अधिकारियों को विदेश यात्रा पर जाने से पहले अब चुनाव आयोग से मंजूरी लेनी होगी। चुनाव आयोग में कोई नया आईटी मॉड्यूल लागू करने से पहले उसे अधिकारियों की एक समिति जांच करेगी। वहीं, ईसीआईएनईटी (ECINET) यानी चुनाव आयोग के आईटी नेटवर्क की भी एक समिति समीक्षा करेगी।
इस समिति की कमान वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्त के हाथ में होगी। इसमें IIT या किसी दूसरे संस्थान के एक स्वतंत्र विशेषज्ञ को भी शामिल किया जाएगा। फील्ड में काम करने वाले अधिकारियों को सिस्टम इस्तेमाल करने में ज्यादा छूट मिलेगी। नोट में यह भी कहा गया है कि आयुक्तों के निर्देशों का “पूरी तरह पालन” किया जाएगा।
ये फैसले संधू और जोशी की ओर से उठाई गई कई आपत्तियों से काफी हद तक मेल खाते हैं। इसी वजह से इन फैसलों के सामने आने के बाद पूरे मामले को लेकर तस्वीर कुछ और साफ होती है।
ECINET की समीक्षा समिति और आयोग के नए फैसलों के बाद अब नजर गोवा के मामले पर है। गोवा में 97 वोटरों के नाम अंतिम सूची से गायब मिले थे। अब आयोग का कहना है कि इनमें से 81 मतदाताओं ने फॉर्म 6 भर दिया है। इन्हें वोटर लिस्ट में जोड़ने के लिए CEO को निर्देश भी दिए गए हैं।
लेकिन बाकी 16 मतदाताओं का क्या होगा, इस पर अभी स्थिति साफ नहीं है। इसके अलावा, वोटर का नाम दोबारा जोड़ने वाला सॉफ्टवेयर फीचर भी अब तक एक्टिव नहीं हुआ है। ऐसे में गोवा का मामला आयोग के फैसलों के बाद भी पूरी तरह सुलझा नहीं माना जा सकता।
फॉर्म 6 को लेकर सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि इसमें बदलाव से नए वोटर के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पर असर पड़ता है। चुनाव आयोग के ऑनलाइन पोर्टल पर फॉर्म 6 के साथ एक नया डिक्लेरेशन जोड़ा गया है। इसमें आवेदक से उसके या उसके माता-पिता के पिछले SIR के रिकॉर्ड से जुड़ी जानकारी मांगी जा रही है। यह हिस्सा फॉर्म के J और K सेक्शन के बीच जोड़ा गया है।
खास बात यह है कि इस जानकारी को भरे बिना ऑनलाइन आवेदन आगे नहीं बढ़ता। वहीं, आयोग के नौ फैसलों वाले नोट में इस नए सवाल को लेकर कोई खास चर्चा नहीं की गई है। यही वजह है कि सवाल उठ रहा है कि यह बदलाव कब और किस प्रक्रिया के तहत किया गया।
नोट में यह भी कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने SIR के लिए इस्तेमाल होने वाले डिक्लेरेशन को बरकरार रखा है। हालांकि, 27 मई 2026 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में SIR की वैधता और प्रक्रिया पर विस्तार से चर्चा है। इसलिए इस दावे और ऑनलाइन फॉर्म में जोड़े गए नए हिस्से के बीच अंतर को अलग-अलग समझना जरूरी है।
आयुक्तों की चिंता सिर्फ यह नहीं थी कि फॉर्म में एक नया सवाल जोड़ दिया गया। असली सवाल यह था कि Form 6 जैसे कानूनी फॉर्म में बदलाव बिना नियम बदले कैसे किया गया। आयुक्त विवेक जोशी ने मई में कहा था कि Form 6 में बदलाव के लिए पहले संबंधित नियमों में संशोधन करना जरूरी है। संधू ने भी इस बात पर सहमति जताई थी।
इसके बावजूद जुलाई में ऑनलाइन Form 6 में SIR से जुड़ा नया सवाल जोड़ दिया गया। 13 अगस्त को संधू ने इस बदलाव को “अनधिकृत और अवैध” बताते हुए इसे तुरंत हटाने की बात कही। लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक, इसके बाद भी यह सवाल फॉर्म में बना रहा।
पश्चिम बंगाल में मतदाता अपील का मामला भी अभी पूरी तरह साफ नहीं हुआ है। न्यायिक अधिकारियों ने कुछ मतदाताओं के नाम जोड़ने का आदेश दिया था, लेकिन उसके खिलाफ अपील किसने दायर की और उसे ऐसा करने का अधिकार किस आधार पर मिला, इसका जिक्र नोट में नहीं है।
इसी तरह, डीजी (आईटी) सीमा खन्ना और वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्त मनीष गर्ग को लेकर भी नोट में कुछ स्पष्ट नहीं किया गया है। दोनों आयुक्तों ने इन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। अब सवाल यह है कि क्या इन दोनों के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई या नहीं? इसकी जानकारी भी सामने नहीं आई है।
इन सवालों के जवाब नहीं मिलने से पूरा मामला और पेचीदा हो गया है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि चुनाव आयोग आगे इन मामलों को किस तरह सुलझाता है और आगे की प्रक्रिया क्या होगी।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि चुनाव आयोग आगे कैसे काम करता है। क्या मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार किसी बड़े फैसले से पहले संधू और जोशी को साथ लेकर चलेंगे? क्या दोनों आयुक्तों की राय और भूमिका आने वाले फैसलों में ज्यादा अहम होगी? अभी इन सवालों का जवाब साफ नहीं है। आने वाले महीनों में आयोग के फैसलों और काम करने के तरीके से ही तस्वीर स्पष्ट होगी।
वोटर लिस्ट सीधे हर नागरिक के वोट के अधिकार से जुड़ी है। इसलिए उसमें नाम जोड़ने, हटाने या सुधार से जुड़े फैसले बेहद अहम होते हैं। इस पूरे मामले से यह भी पता चलता है कि चुनाव आयोग के अंदर बड़े फैसलों पर किस तरह चर्चा और असहमति हो सकती है। जब दो आयुक्त कई मुद्दों पर बार-बार अपनी आपत्ति दर्ज कराते हैं, तो लोगों के लिए यह जानना जरूरी हो जाता है कि इन फैसलों की प्रक्रिया कितनी साफ और पारदर्शी है। खासकर फॉर्म 6 और पश्चिम बंगाल में मतदाता अपील जैसे मामले सीधे वोटर के अधिकार से जुड़े हैं। इसी वजह से यह सिर्फ आयोग की अंदरूनी प्रक्रिया की खबर नहीं, बल्कि आम मतदाता से जुड़ा मुद्दा भी है।
तीन दिन पहले आयोग ने इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट का जवाब दिया था। रिपोर्ट में आयोग के कामकाज पर कई सवाल उठाए गए थे।
समझें क्या है पूरा मामला
इन नौ फैसलों के पीछे मुख्य वजह चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां ही थीं। मामला मतदाता पंजीकरण से जुड़े फैसलों का था। यानी कौन व्यक्ति वोटर बनेगा, किसका नाम हटाया जाएगा और नाम हटने या जुड़ने के बाद अपील का अधिकार किसे होगा। इन मुद्दों पर आयोग के भीतर सवाल उठाए गए थे।
14 बार आपत्ति क्यों
चुनाव आयोग के नौ फैसले क्या हैं?
इसके अलावा, अधिकारियों को विदेश यात्रा पर जाने से पहले अब चुनाव आयोग से मंजूरी लेनी होगी। चुनाव आयोग में कोई नया आईटी मॉड्यूल लागू करने से पहले उसे अधिकारियों की एक समिति जांच करेगी। वहीं, ईसीआईएनईटी (ECINET) यानी चुनाव आयोग के आईटी नेटवर्क की भी एक समिति समीक्षा करेगी।
ECINET समीक्षा समिति में कौन
ये फैसले संधू और जोशी की ओर से उठाई गई कई आपत्तियों से काफी हद तक मेल खाते हैं। इसी वजह से इन फैसलों के सामने आने के बाद पूरे मामले को लेकर तस्वीर कुछ और साफ होती है।
गोवा में क्या हुआ अब
लेकिन बाकी 16 मतदाताओं का क्या होगा, इस पर अभी स्थिति साफ नहीं है। इसके अलावा, वोटर का नाम दोबारा जोड़ने वाला सॉफ्टवेयर फीचर भी अब तक एक्टिव नहीं हुआ है। ऐसे में गोवा का मामला आयोग के फैसलों के बाद भी पूरी तरह सुलझा नहीं माना जा सकता।
फॉर्म 6 पर विवाद क्यों
खास बात यह है कि इस जानकारी को भरे बिना ऑनलाइन आवेदन आगे नहीं बढ़ता। वहीं, आयोग के नौ फैसलों वाले नोट में इस नए सवाल को लेकर कोई खास चर्चा नहीं की गई है। यही वजह है कि सवाल उठ रहा है कि यह बदलाव कब और किस प्रक्रिया के तहत किया गया।
नोट में यह भी कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने SIR के लिए इस्तेमाल होने वाले डिक्लेरेशन को बरकरार रखा है। हालांकि, 27 मई 2026 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में SIR की वैधता और प्रक्रिया पर विस्तार से चर्चा है। इसलिए इस दावे और ऑनलाइन फॉर्म में जोड़े गए नए हिस्से के बीच अंतर को अलग-अलग समझना जरूरी है।
आयुक्तों की मूल चिंता क्या थी
इसके बावजूद जुलाई में ऑनलाइन Form 6 में SIR से जुड़ा नया सवाल जोड़ दिया गया। 13 अगस्त को संधू ने इस बदलाव को “अनधिकृत और अवैध” बताते हुए इसे तुरंत हटाने की बात कही। लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक, इसके बाद भी यह सवाल फॉर्म में बना रहा।
अनुत्तरित सवाल कौन से
इसी तरह, डीजी (आईटी) सीमा खन्ना और वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्त मनीष गर्ग को लेकर भी नोट में कुछ स्पष्ट नहीं किया गया है। दोनों आयुक्तों ने इन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। अब सवाल यह है कि क्या इन दोनों के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई या नहीं? इसकी जानकारी भी सामने नहीं आई है।
इन सवालों के जवाब नहीं मिलने से पूरा मामला और पेचीदा हो गया है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि चुनाव आयोग आगे इन मामलों को किस तरह सुलझाता है और आगे की प्रक्रिया क्या होगी।
आगे का रास्ता क्या होगा
यह खबर क्यों जरूरी है
- चुनाव आयोग के नौ नए फैसले क्या हैं?
चुनाव आयोग ने बैठक के बाद नौ नए फैसलों की जानकारी दी। इनमें हर बैठक से पहले एजेंडा साझा करना, अधिकारियों की विदेश यात्रा के लिए आयोग की मंजूरी जरूरी करना, ईसीआईएनईटी की समीक्षा के लिए समिति बनाना और आयुक्तों के निर्देशों का पूरी तरह पालन जैसे फैसले शामिल हैं। ये फैसले संधू और जोशी की ओर से पहले उठाई गई कई आपत्तियों से जुड़े हैं। - फॉर्म 6 में बदलाव को लेकर विवाद क्यों है?
ऑनलाइन फॉर्म 6 में माता-पिता से जुड़ा एक नया सवाल जोड़ा गया है। इस जानकारी को भरे बिना आवेदक फॉर्म को आगे नहीं बढ़ा सकता। आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने इस बदलाव को पहले “अनधिकृत और अवैध” बताया था। हालांकि, आयोग की ओर से जारी नौ फैसलों वाले नोट में इस नए सवाल का कोई स्पष्ट जिक्र नहीं है। - गोवा में मतदाता पंजीकरण से संबंधित मुद्दा क्या है?
गोवा में 97 मतदाताओं के नाम अंतिम सूची से गायब पाए गए थे। आयोग ने कहा है कि 81 मतदाताओं ने फॉर्म 6 भरा है, लेकिन बाकी 16 मतदाताओं के बारे में स्थिति स्पष्ट नहीं है। इसके अलावा, मतदाता पंजीकरण सॉफ्टवेयर फीचर अब तक सक्रिय नहीं हुआ है।
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