धार की ऐतिहासिक मूर्ति सरस्वती की नहीं, मां गायत्री की निकली, 900 साल पुराना भ्रम टूटा!
Sourabh Bhatnagar | Jul 13, 2026, 10:30 IST
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भोपाल स्टेट म्यूजियम में रखी 12वीं सदी की मूर्ति अब तक सरस्वती मानी जाती थी। डिजिटल 3D मैपिंग और शिल्पशास्त्र के मिलान से साबित हुआ कि यह असल में मां गायत्री की दुर्लभ प्रतिमा है। वीणा न होना इसकी सबसे बड़ी वजह बनी।
समझें क्या है पूरा मामला
- भोपाल म्यूजियम की 12वीं सदी की मूर्ति अब मां गायत्री साबित हुई।
- पहले इसे देवी सरस्वती की मूर्ति माना जाता था।
- 3D मैपिंग और डिजिटल डॉक्यूमेंटेशन से पहचान बदली।
- मूर्ति में वीणा नहीं है, जो सरस्वती की मूर्तियों में जरूरी मानी जाती है।
- यह मूर्ति परमार राजवंश के दौर की मानी जा रही है।
यह मूर्ति लाल बलुआ पत्थर से बनी है। इसे धार जिले से खोजा गया था। धार कभी परमार राजवंश की राजधानी हुआ करता था। इसीलिए इस मूर्ति का ऐतिहासिक महत्व और भी बढ़ जाता है।
लंबे समय तक शोधकर्ता इसे सरस्वती मानकर ही रिसर्च करते रहे। लेकिन राज्य पुरातत्व निदेशालय की नई 3D मैपिंग ने पूरी तस्वीर बदल दी। हाई-रिज़ॉल्यूशन डिजिटल डॉक्यूमेंटेशन ने सदियों पुराना भ्रम दूर कर दिया।
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क्यों बदली पहचान
पुरातत्व निदेशालय से जुड़े आर्कियोलॉजिस्ट रमेश यादव ने इस बारे में विस्तार से बताया। उनके मुताबिक मूर्ति ललितासन मुद्रा में बैठी है। इसकी चार भुजाएं हैं। हाथों में जपमाला, कमल और वेद साफ दिखते हैं। मूर्ति के पास एक हंस भी बना है, जो पवित्र ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। यादव का कहना है कि यह पूरी बनावट शिल्पशास्त्र में बताए गए मां गायत्री के स्वरूप से पूरी तरह मेल खाती है।
धार और परमार कनेक्शन
मूर्ति की खास पहचान
आगे क्या होगा
यह खोज सिर्फ एक मूर्ति की पहचान बदलने भर की बात नहीं है। यह मध्य प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को नए सिरे से सामने लाती है। धार जैसे क्षेत्रों में परमार काल की कला कितनी विकसित थी, यह मूर्ति इसका जीता-जागता सबूत है। आने वाले समय में इस तरह की और भी मूर्तियों की दोबारा पहचान हो सकती है। डिजिटल तकनीक ने पुरातत्व की दुनिया में नई संभावनाएं खोल दी हैं।
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मां गायत्री बीज | मां गायत्री स्रोत Archaeology
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