70,80,90 फीसदी सैलरी पर घिरी सरकार, कर्मचारी मांग रहे पूरे वेतन का अधिकार

एमपी सरकार 2019 के बाद नियुक्त कर्मचारियों को पूरी सैलरी देने के मामले में घिरी है। जबलपुर हाईकोर्ट ने तीन साल की परिवीक्षा अवधि के बाद वेतन में कटौती को अतार्किक बताया।

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Sanjay Sharma
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BHOPAL.MP में साल 2019 के बाद नियुक्त कर्मचारियों को पूरी वेतन देने के मामले पर सरकार पूरी तरह घिर गई है। जबलपुर हाईकोर्ट ने कुछ याचिकाओं की सुनवाई के बाद निर्णय दिया।

कोर्ट ने कहा कि कर्मचारियों को तीन साल की परिवीक्षा अवधि के दौरान पहले साल 70%, दूसरे साल 80% और तीसरे साल 90% वेतन देना अतार्किक है। इसके साथ ही सभी याचिकाकर्ताओं को नियुक्ति की तारीख से ही पूरा वेतन और बकाया एरियर के भुगतान का आदेश दिया है। 

2019 के बाद नियुक्त 94 हजार से ज्यादा कर्मचारियों ने सरकार से पूरा वेतन देने की मांग की। सरकार अब इस पर विचार कर रही है। विधि और वित्त विभाग के अधिकारी फैसले पर मंथन कर रहे हैं।

सरकार के एक्सपर्ट कर्मचारियों की मांग से जुड़ी आर्थिक स्थिति का आंकलन कर रहे हैं। अतिरिक्त आर्थिक भार और कर्मचारियों की नाराजगी से बचने के विकल्प तलाशे जा रहे हैं।

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News in Short...

  1. जबलपुर हाईकोर्ट ने याचिकाओं की सुनवाई के बाद 6 जनवरी को पूरी सैलरी देने का आदेश जारी किया है।
  2. 2019 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार के नियम बदलने के कारण नियुक्ति के तीन साल बाद मिल पाता है पूरा वेतन।
  3. हाईकोर्ट के आदेश के बाद 94 हजार से ज्यादा कर्मचारियों को पूरी सैलरी देने का दबाव सरकार पर बढ़ गया है।  
  4. नियम की विसंगति की वजह से समान काम के बावजूद ईएसबी से भर्ती कर्मचारियों के साथ हो रहा है पक्षपात।
  5. कर्मचारियों को ऐरियर सहित नियुक्ति दिनांक से पूरे वेतन के आदेश के बाद सरकार विकल्प तलाश रही है।

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News in Detail

जबलपुर हाईकोर्ट ने पूरी सैलरी देने का फैसला उन कर्मचारियों के संदर्भ में दिया है जो याचिका लेकर पहुंचे थे। अब इस निर्णय ने सरकार के सामने संकट खड़ा कर दिया है। सरकार को अब इस फैसले के आधार पर 94 हजार से अधिक कर्मचारियों की मांग पूरी करने पर विचार करना पड़ रहा है। 

मध्य प्रदेश में तत्कालीन कांग्रेस सरकार के इस निर्णय का कर्मचारियों ने खूब विरोध किया था। तब सत्ता बदलने के बाद बीजेपी सरकार ने इसे कांग्रेस का काला कानून बताया था। दो साल पहले मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कर्मचारी संगठनों की मांग पर विचार किया। उन्होंने इस नियम को बदलने का भरोसा दिया था। हालांकि, सरकार ने इस पर अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया।

वहीं विधि विभाग के कुछ कर्मचारियों को पूरी सैलरी देने के बाद कटौती के नोटिस ने मामले को हाईकोर्ट पहुंचा दिया। कर्मचारियों ने पूरी सैलरी देने के बाद 70%, 80% और 90% वेतन के आधार पर वसूली के नोटिस पर हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिकाओं की समान प्रकृति के आधार पर जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस दीपक खोट ने एक साथ सुनवाई की। 

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को समान काम के लिए समान वेतन का हकदार माना। कोर्ट ने ईएसबी और लोकसेवा आयोग के माध्यम से भर्ती कर्मचारियों को दो श्रेणियों में बांटने पर ऐतराज किया। साथ ही, जबलपुर हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को नियुक्ति के बाद से एरियर सहित वेतन भुगतान का आदेश दिया।

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Documents

जबलपुर हाईकोर्ट के फैसले ने हजारों कर्मचारियों में उम्मीदें जगा दी हैं। 2019 में नियुक्त 94 हजार से ज्यादा कर्मचारियों को तीन साल तक पूरा वेतन नहीं मिला। पहले साल 30%, दूसरे साल 20%, तीसरे साल 10% कटौती की गई। हाईकोर्ट ने इस कटौती को तर्कसंगत नहीं माना और नियम को अतार्किक बताया। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को पूरे वेतन का हकदार माना। अब यह फैसला पूरी सैलरी से वंचित कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज बन गया है।

अब आगे क्या 

जबलपुर हाईकोर्ट के फैसले के बाद मध्यप्रदेश के कर्मचारी संगठन पूरा वेतन दिलाने की तैयारी कर रहे हैं। पहले से 13 विभागों के कर्मचारियों की याचिका पर हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही है। इसी बीच, हजारों अन्य कर्मचारी संगठन पूरी सैलरी की लड़ाई एक साथ या अलग-अलग याचिकाओं के जरिए हाईकोर्ट में लड़ने की रणनीति बना रहे हैं।

वहीं सरकार भी हाईकोर्ट के फैसले की बारीकियों पर विचार मंथन कर रही है। इस फैसले के आधार पर कर्मचारियों को पूरी सैलरी और कटौती की राशि का भुगतान करना सरकार के लिए 400 करोड़ से ज्यादा का भार होगा। मध्य प्रदेश कर्मचारी चयन मंडल ने 2020 में 6, 2022 में 8, 2023 में 5, 2024 में 9 और 2025 में 6 भर्ती परीक्षाएं आयोजित की हैं।

इन परीक्षाओं के माध्यम से 94 हजार से ज्यादा भर्तियां हुई हैं। इन सभी कर्मचारियों के वेतन से तीन साल तक कटौती की गई है। सरकार को अब नियुक्त कर्मचारियों को पूरा वेतन देना होगा। पूर्व में की गई कटौती भी एरियर के रूप में लौटानी पड़ सकती है। इससे बचने के लिए सरकार हाईकोर्ट में अपील या सुप्रीम कोर्ट में निर्णय चैलेंज कर सकती है। लेकिन यह कदम सरकार को कर्मचारी विरोधी बना सकता है।

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इनका कहना है 

मप्र सचिवालयीन कर्मचारी संघ प्रदेश अध्यक्ष  सुभाष वर्मा का कहना है सरकार से लंबे समय से मांग की जा रही है। पूर्व में सीएम डॉ.मोहन यादव ने तत्कालीन कांग्रेस सरकार के फैसले को बदलने का आश्वासन भी दिया था। हालांकि कुछ अधिकारियों के बहकावे और आर्थिक भार बढ़ने के डर से सरकार ने निर्णय नहीं लिया।

यदि सरकार ने कर्मचारियों को पूरा वेतन दिया होता, तो कांग्रेस के गलत निर्णय को बदलने का क्रेडिट सीएम मोहन यादव को मिलता। सरकार को केवल निर्णय के बाद की तारीख से कर्मचारियों को पूरी सैलरी देनी होती। उस पर पुरानी कटौती का भार नहीं आता। अब हाईकोर्ट के फैसले के आधार पर 2019 के बाद भर्ती सभी कर्मचारी पूरे वेतन और कटौती की राशि का दावा करने आगे आ रहे हैं।

निष्कर्ष :

कांग्रेस सरकार द्वारा ईएसबी से भर्ती कर्मचारियों की परिवीक्षा अवधि नियमों में बदलाव अब बीजेपी सरकार के लिए समस्या बन गया है। जबलपुर हाईकोर्ट के फैसले के बाद सरकार के पास दो ही विकल्प हैं। सरकार यदि दिसम्बर 2019 के बाद भर्ती कर्मचारियों को पूरा वेतन नहीं देती, तो वे कोर्ट जाएंगे। 

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