एमपी के कर्मचारियों के 70, 80, 90% वेतन पर HC ने खोली राह, रद्द की कटौती

Sanjay Sharma | Jan 07, 2026, 23:41 IST
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Madhya Pradesh employees will now get 100% salary, High Court canceled the cut
Photograph: (the sootr)

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने 70, 80 और 90% वेतन कटौती के नियम को गलत बताया और पूरा वेतन देने का आदेश दिया।

BHOPAL. मध्य प्रदेश में नियुक्ति के बाद तीन साल तक अधूरे वेतन का बैरियर टूटने वाला है। हाईकोर्ट ने विचाराधीन याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए सरकार को याचिकाकर्ता कर्मचारियों को शत प्रतिशत वेतन देने का आदेश दिया है।

जबलपुर हाईकोर्ट के इस आदेश ने मध्य प्रदेश में बीते तीन साल में नियुक्ति पाने वाले हजारों कर्मचारियों को राहत दी है। इन याचिकाओं के विरुद्ध की गई सरकार और अन्य सरकारी एजेंसियों की अपील को भी हाईकोर्ट ने खारिज किया है।

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हाईकोर्ट से केवल याचिकाकर्ताओं को फायदा

इन सभी कर्मचारियों के वेतन में भी 70,80 और 90 फीसदी के बैरियर के कारण कटौती हो रही है। नवनियुक्त कर्मचारियों के परिवीक्षा और वेतन कटौती के नियमों में दिसम्बर 2019 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने बदलाव किया था। हजारों कर्मचारी इन नियमों में बदलाव को लेकर बीते पांच सालों से मांग करते आ रहे हैं। फिलहाल हाईकोर्ट से केवल याचिकाकर्ताओं को फायदा हुआ है। कर्मचारियों का मानना है अब यह निर्णय सभी को पूरा वेतन दिलाने के संघर्ष में मील का पत्थर साबित होगा।

अभी ऐसे कटती है कर्मचारियों की सैलरी

मध्य प्रदेश में साल 2019 के बाद नियुक्ति पाने वाले कर्मचारियों को जीएडी के पत्र के आधार पर शुरूआती तीन साल के लिए पूरा वेतन नहीं दिया जा रहा था। उन्हें पहले साल 70 फीसदी, दूसरे साल 80 और तीसरे साल 90 फीसदी ही वेतन का भुगतान किया गया। वहीं उनकी परिवीक्षा अवधि भी दो से बढ़ाकर तीन साल कर दी गई थी।

जीएडी द्वारा 12 दिसम्बर 2019 में जारी आदेश के आधार पर वेतन की यह कटौती केवल कर्मचारी चयन मंडल के जरिए नियुक्ति पाने वाले कर्मचारियों से की जा रही थी। जबकि मध्य प्रदेश लोकसेवा आयोग के माध्यम से भर्ती होने वाले कर्मचारियों को पहले महीने से ही पूरा वेतन दिया जा रहा था। इस विसंगति को लेकर कई कर्मचारियों द्वारा हाईकोर्ट की शरण ली गई थी।

तीन साल तक तीन स्लैब में वेतन का भुगतान तर्कहीन

हाईकोर्ट जबलपुर के अलावा जीएडी के इस आदेश के खिलाफ इंदौर बेंच में भी कर्मचारियों द्वारा याचिकाएं पेश की गई थी। जिन पर लगातार सुनवाई जारी थी। हाईकोर्ट ने स्वाति जैन, आदित्य मिश्रा और वसीम अकरम एंव अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा पेश की गई याचिका की समान प्रकृति को देखते हुए उन पर एक साथ फैसला दिया है।

जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस दीपक खोट द्वारा सुनवाई के दौरान तीन साल की परिवीक्षा अवधि में नियमित कार्य लेने के बावजूद तीन स्लैब में वेतन से कटौती को अतार्किक माना है। याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने कोर्ट के सामने जीएडी के 12 दिसम्बर 2019 के परिपत्र का भी उल्लेख किया गया।

यह परिपत्र ऐसे कर्मचारियों के लिए है जिनकी नियुक्ति मध्य प्रदेश सिविल सेवा नियम 1961 के अंतर्गत की गई है। जबकि परिपत्र के खंड 2 में वेतन कटौती की शर्तों से लोक सेवा आयोग द्वारा नियुक्त कर्मचारियों को बाहर रखा गया है। सुनवाई के दौरान यह तर्क भी दिया गया कि वित्त विभाग को मौलिक नियमों में संशोधन का अधिकार दिया गया है, लेकिन एमपीपीएससी और राज्य की अन्य एजेंसियों द्वारा नियुक्त तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के बीच भेदभाव नहीं किया जा सकता।

प्रक्रियागत नियुक्त कर्मचारी समान वेतन पाने का अधिकारी

हाईकोर्ट में नवनियुक्त कर्मचारियों को तीन स्लैब में तीन साल की परिवीक्षा अवधि में 70, 80 और 90 फीसदी वेतन के मामले पर सुनवाई में याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने भी मजबूती से पक्ष रखा। याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट कैलाश चंद्र घिल्डियाल, अवधेश कुमार अहिरवार, प्रवीण दुबे ने दलीलें पेश कीं। जबकि सरकार की ओर से एडवोकेट पीयूष जैन, बृजेश नाथ मिश्रा ने हाईकोर्ट में पक्ष रखा।

याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने हाईकोर्ट के सामने एमपीपीएससी से भर्ती कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन मिलने और राज्य की अन्य एजेंसियों से नियुक्त कर्मचारियों को परिवीक्षा अवधि के तीन साल में 70, 80 और 90 फीसदी वेतन देना पक्षपात बताया। इसके आधार पर वे परिवीक्षाधीन कर्मचारियों के दो वर्ग बांटना तर्कसंगत न होना साबित करने में सफल रहे।

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समान कार्य-समान वेतन के तर्क पर खारिज सरकारी आपत्ति

जीएडी के आदेश को पूर्व में ही दिलिराज भिलाला के मामले में नकारे जाने का तथ्य भी हाईकोर्ट के सामने रखा गया। इन तर्क और तथ्यों के आधार पर माना गया कि उचित प्रक्रिया और उचित माध्यम से किसी पद पर नियुक्त कर्मचारी परिवीक्षा अवधि में भी समान काम समान वेतन पाने का हकदार है। सरकार के पास उसे परिवीक्षा अवधि में 70, 80 और 90 फीसदी वेतन देने का कोई तर्क या कारण नहीं है।

इस आधार को मानते हुए हाईकोर्ट ने सरकार की ओर से याचिकाओं पर पेश की गई आपत्ति को अमान्य कर दिया। याचिकाकर्ताओं ने संबंधित पद पर कार्य किया है इसलिए वे बिना कटौती पूरा वेतन प्राप्त करने के हकदार हैं।

हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते जीएडी के विवादित आदेश और वसूली को रद्द किया है। वहीं याचिकाकर्ताओं से वसूल की गई राशि वापस लौटाने और परिवीक्षा अवधि में जिन याचिकाकर्ताओं को 100 फीसदी वेतन नहीं मिला उन्हें उस अवधि का पूरा वेतन देने का आदेश भी सरकार को दिया है।



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