टैक्स समय पर जमा, फिर ब्याज क्यों? GST पोर्टल की व्यवस्था पर कर संगठनों ने उठाए सवाल
Ramanand Tiwari | Oct 07, 2026, 22:26 IST
मध्य प्रदेश के दो कर संगठनों ने GST पोर्टल पर ब्याज गणना को लेकर सवाल उठाते हुए कमिश्नर को ज्ञापन सौंपा है।
GST लागू हुए आठ साल से ज्यादा हो गए, लेकिन पोर्टल की तकनीकी व्यवस्था पर सवाल अब भी खत्म नहीं हुए हैं। मध्य प्रदेश के दो प्रमुख कर संगठनों ने जीएसटी कमिश्नर को ज्ञापन देकर ऐसा मुद्दा उठाया है, जो सीधे करदाताओं की जेब से जुड़ा है। सवाल यही है कि टैक्स समय पर जमा हो चुका है, तो सिर्फ रिटर्न की जानकारी सुधारने पर ब्याज की मांग क्यों निकले?
कमिश्नर की टेबल तक पहुंचा पोर्टल का विवाद
इस ज्ञापन की अहम बात यह है कि विवाद टैक्स चोरी या टैक्स नहीं चुकाने को लेकर नहीं, बल्कि टैक्स जमा होने के बावजूद कुछ परिस्थितियों में सिस्टम द्वारा ब्याज की गणना किए जाने के आरोप से जुड़ा है।
टैक्स जमा है तो सुधार पर ब्याज क्यों?
यहीं कर विशेषज्ञ व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं। उनका तर्क है कि “टैक्स देर से जमा करना” और “पहले से जमा टैक्स से जुड़े रिटर्न की जानकारी सुधारना” दो अलग परिस्थितियां हैं। अगर दोनों को एक जैसी तकनीकी प्रक्रिया से देखा जाएगा, तो विवाद पैदा होना स्वाभाविक है।
ITC मौजूद, फिर भी ब्याज का सवाल
एसोसिएशन का पक्ष है कि ऐसी परिस्थितियों में, जहां पर्याप्त क्रेडिट पहले से उपलब्ध था, ब्याज की गणना करते समय इस तथ्य को ध्यान में रखा जाना चाहिए। विशेषज्ञों ने धारा 50 के तहत ब्याज की गणना को लेकर भी यही मुद्दा उठाया है। उनका तर्क है कि उपलब्ध ITC की सीमा तक वास्तविक आर्थिक प्रभाव और ब्याज देयता का परीक्षण अलग तरीके से होना चाहिए।
हालांकि ब्याज की कानूनी देयता हर मामले के तथ्यों, रिटर्न, भुगतान की प्रकृति और लागू GST प्रावधानों पर निर्भर कर सकती है। इसलिए एसोसिएशन की मांग को स्वतः अंतिम कानूनी निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
आठ साल बाद भी सिस्टम अंतर क्यों नहीं पहचान रहा?
अब सवाल यह है कि पोर्टल टैक्स देर से जमा करने और सिर्फ रिटर्न की जानकारी सुधारने के बीच साफ फर्क क्यों नहीं कर पा रहा। MPTLB और CTPA भी यही मांग कर रहे हैं कि दोनों स्थितियों को अलग-अलग तरीके से देखा जाए।
अश्विन लखोटिया ने क्या कहा?
यानी एसोसिएशन चाहता है कि पोर्टल का सिस्टम यह पहचान सके कि मामला वास्तव में सरकार को टैक्स देर से मिलने का है या सिर्फ पहले दाखिल रिटर्न की जानकारी ठीक करने का।
अब नजर GST प्रशासन के अगले कदम पर
लेकिन फिलहाल यह एसोसिएशनों की मांग और कानूनी-तकनीकी आपत्ति है। पोर्टल की व्यवस्था में बदलाव या ब्याज से राहत को अंतिम निर्णय मानना उचित नहीं होगा। GST के आठ साल बाद भी अगर पोर्टल टैक्स भुगतान में वास्तविक देरी और केवल रिटर्न सुधार के बीच फर्क नहीं कर पा रहा है, तो तकनीकी गलती की आर्थिक कीमत करदाता क्यों चुकाए?
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