इंदौर स्मार्ट सिटी कंपनी ने टेंडर में किए करोड़ों के खेल, गांधी हॉल का रिनोवेशन भी नियम के खिलाफ

Sanjay Gupta | Feb 24, 2026, 16:57 IST
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indore smart city scam cag report gandhi hall renovation corruption
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कैग की हालिया रिपोर्ट में इंदौर स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट को लेकर चौंकाने वाले खुलासे किए गए हैं। इसमें करोड़ों के टेंडर घोटाले और नियमों के उल्लंघन का पर्दाफाश किया गया है। इसमें गांधी हॉल का नवीनीकरण भी शामिल है।

INDORE. केंद्र की महत्वाकांक्षी योजना स्मार्ट सिटी मिशन घोटाले की भेंट चढ़ चुका है। इंदौर स्मार्ट सिटी मिशन में टेंडर के नाम पर जमकर खेल हुए हैं। कभी सिंगल बोली में ठेका दे दिया गया, तो कभी सही ठेके को निरस्त कर अपने वाले को दे दिया। फंड को भी नियमों से बाहर जाकर डायवर्ट किया गया। इंदौर गांधी हॉल का रिनोवेशन भी नियमों के खिलाफ किया गया था।

कैग की रिपोर्ट में एक-एक बातों का खुलासा

कम्पट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (सीएजी- कैग) की रिपोर्ट में एमपी के सभी स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट का विश्लेषण किया गया है। इसमें इंदौर के कई प्रोजेक्ट और टेंडर को लेकर गंभीर टिप्पणियां की गई हैं।

साफ लिखा गया है कि इस सरकारी राशि के नुकसान के लिए अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए, क्योंकि उन्होंने वित्तीय नियमों का उल्लंघन कर यह काम किए हैं।

इंदौर स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में कुल 773 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। इसमें केंद्र से 485 करोड़ रुपए और राज्य से 275 करोड़ रुपए मिले थे। बाकी 13 करोड़ अतिरिक्त खर्च हुए हैं।

गांधी हॉल का रिनोवेशन, बस्ती का सौंदर्यीकरण गलत

रिपोर्ट में साफ है कि स्मार्ट सिटी मिशन की गाइडलाइन के तहत बिना इन्फ्रास्ट्रक्चर, तकनीक वाले कामों को नहीं लेना था। इसके बाद भी गांधी हॉल का रिनोवेशन सात करोड़ 42 लाख की लागत से नगर निगम ने स्मार्ट सिटी से कराए थे।

इसके साथ ही निगम ने 16 जगहों पर सिविल वर्क कराकर बस्ती का सौंदर्यीकरण भी 10 करोड़ 58 लाख की लागत से किया, जो नियमों के खिलाफ था। इसके अलावा, वाटर संरचना पर छह करोड़ 80 लाख और सड़क के विज़ुअलाइजेशन वर्क पर 42 करोड़ 53 लाख रुपए खर्च किए गए थे।

इस तरह, इंदौर स्मार्ट सिटी ने कुल 68 करोड़ के काम नियमों के खिलाफ किए हैं। इसी तरह इंदौर में स्मार्ट सिटी कंपनी के प्रशासनिक कामों पर 47 करोड़ रुपए खर्च हुए जो बहुत ज्यादा है।

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तय कीमत से अधिक पर दे मारा टेंडर

टेंडर में तो जमकर खेल हुए हैं। कैग ने जल आपूर्ति व सीवरेज संबंधी काम के टेंडर की जांच कर विस्तार से यह खेल बताया है। साल 2017 में टेंडर हुआ था। इसमें एक ही टेंडर आया तो रद्द कर दिया था।

इसके बाद जनवरी 2018 में दूसरी बार हुआ तो तीन कंपनी आईं थी। इसमें कंपनी मेसर्स तेजस कंसट्रक्शन ने 201 करोड़ की बोली लगाई तो विष्णु प्रकाश आर पुंगलिया दूसरे नंबर पर थी। उसने आपत्ति ली और कहा कि टेंडर में भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी की गई थी।

वहीं, स्मार्ट सिटी ने बाद में जांच की और खुद पुंगलिया ने भी माना कि टेंडर सही था। इसके बाद टेंडर रद्द कर दिया गया था। फिर तीसरी बार टेंडर आपत्ति लेने वाली कंपनी पुंगलिया को 237 करोड़ में दे दिया था। यानी पूर्व टेंडर 201 करोड़ से 36 करोड़ रुपए से अधिक में दे दिया गया था।

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एक ही कंपनी को बिना टेंडर फिर काम दिया

इसी तरह साल 2017 में स्मार्ट सिटी ने जरूरी उपकरण के लिए टेंडर किया था। इसमें मेसर्स हायवा इंडिया प्रालि को ऑर्डर दिया था। इससे आठ करोड़ 47 लाख के उपकरण लिए थे।

बाद में ये कहा गया कि अतिरिक्त उपकरण की जरूरत है। फिर इसी कंपनी से बिना टेंडर किए ही पुराने वर्क ऑर्डर पर आठ करोड़ 59 लाख रुपए के उपकरण और ले लिए गए थे। वहीं, यह कहीं नहीं बताया गया कि आखिर इस खरीदी का क्या औचित्य था। यह वित्तीय अनियमितता थी।

यहां तो गजब किया ठेकेदार पैसे लेकर चला गया

वहीं एक काम का और जिक्र किया गया है। इंदौर में इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम लगाने का 40 करोड़ का काम तय हुआ था। इससे 30 चौराहों पर ट्रैफिक सुधार होना था।

साल 2019 में वर्क ऑर्डर हुआ था। कंपनी से दो करोड़ की बैंक गारंटी ली गई थी। ठेकेदार ने कुछ दिन काम किया और उसे 23 करोड़ का भुगतान हो गया था। वहीं, ठेकेदार काम पूरा नहीं कर पाया और ठेका जुलाई 2021 में निरस्त कर दिया गया था।

कंपनी से राशि भी चली गई और काम भी नहीं हुआ था। ठेका देते हुए तीन साल के टर्नओवर और सात साल के अनुभव को नहीं देखा गया था। काम ऐसे ही अनुभवहीन ठेकेदार को दे दिया गया था, जो आखिर भाग गया।

सरकार कह रही है कि हाईकोर्ट के आदेश से भुगतान हुआ, लेकिन ठेका गैर अनुभवी ठेकेदार को क्यों दिया गया इसका कोई कारण नहीं बताया गया।

कंपनी से पैसे भी चले गए और काम भी नहीं हुआ। ठेके का काम ऐसे ठेकेदार को दे दिया गया, जो अनुभवहीन था और बाद में वह भाग गया। सरकार कह रही है कि हाईकोर्ट के आदेश से भुगतान हुआ था। वहीं, यह नहीं बताया गया कि अनुभवहीन ठेकेदार को काम क्यों दिया गया था।

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निगम ने ले लिया कंपनी का पैसा

कैग ने इस बात पर भी आपत्ति ली कि निगम ने अपने काम के लिए स्मार्ट सिटी से फंड डायवर्ट कराया था। इंदौर नगर निगम ने सड़क निर्माण के लिए 30 करोड़ का ठेका साल 2013 में दिया था। यह स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट आने से पहले का था।

इसके तहत ठेकेदार को 15 करोड़ का भुगतान किया था। वहीं, बाद में स्मार्ट सिटी आने पर यह काम कंपनी को दे दिया था। साथ ही ठेकेदार को दिए गए पुराने 15 करोड़ के भुगतान भी वापस ले लिया गया था। साथ ही ठेकेदार को बाकी बचे 15 करोड़ का भुगतान भी स्मार्ट कंपनी से ही कराया गया था।

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