40 साल पुराने आश्रम की जमीन 2025 में अचानक उत्तम स्वामी के नाम, बिना डायवर्शन खड़ा हुआ अवैध आश्रम

Neel Tiwari | Feb 18, 2026, 24:03 IST
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The land of 40 years old ashram will suddenly be transferred to the name of Uttam Swami in 2025
Photograph: (the sootr)

जबलपुर में 2025 में अचानक आश्रम की जमीन उत्तम स्वामी के नाम पर ट्रांसफर। बिना डायवर्शन के अवैध आश्रम बनवाने के आरोप। प्रशासन की भूमिका पर सवाल।

News in short

  • खसरा नंबर 46/1 की भूमि अब भी कृषि मद में दर्ज
  • 21 अगस्त 2025 को “मां नर्मदा श्री उत्तम शांतिनाथ” के नाम रजिस्ट्री
  • लगभग 5 हजार वर्गफीट में नया निर्माण
  • डायवर्शन और निर्माण अनुमति पर सवाल
  • प्रशासन ने जांच के संकेत दिए
JABALPUR। दुष्कर्म के आरोपों से घिरे उत्तम स्वामी के जबलपुर आश्रम के मामले में 'द सूत्र' बड़ा खुलासा कर रहा है। जबलपुर के हीरापुर बंधा गांव स्थित उनके आश्रम को लेकर जमीन के मालिकाना हक और निर्माण प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर 2025 में अचानक यह भूमि उनके नाम कैसे दर्ज हो गई और कृषि भूमि पर निर्माण किसके संरक्षण में कराया गया?

News in detail

खसरे ने खोली परतें, कृषि भूमि पर खड़ा पक्का ढांचा

उत्तम स्वामी के आश्रम से जुड़ी जमीन के मामले में, जबलपुर लोक सूचना के द्वारा 17 फरवरी को जारी खसरे की प्रति में स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है कि संबंधित भूमि कृषि मद में दर्ज है। कॉलम नंबर 10 में जायद फसल के रूप में उड़द की खेती का उल्लेख आज भी दर्ज है। इसके बावजूद उसी भूमि पर पक्का आश्रम संचालित हो रहा है और हाल के महीनों में निर्माण विस्तार की भी जानकारी सामने आई है।

राजस्व नियमों के अनुसार कृषि भूमि पर स्थायी निर्माण से पहले विधिवत डायवर्शन कराना जरूरी है। यदि यह प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है, तो निर्माण अवैध माना जाता है। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि क्या संबंधित विभागों को इस निर्माण की जानकारी नहीं थी, या फिर जानकारी होते हुए भी कार्रवाई नहीं की गई?

आश्रम के वर्तमान खसरे की सत्यापित प्रति-

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मंगलनाथ वल्द शांतिनाथ के नाम पर थी जमीन-

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2025 में अचानक बदला मालिकाना हक, कैसे और क्यों?

स्थानीय लोगों के अनुसार यह आश्रम लगभग 40 वर्षों से संत शांतिनाथ के नाम से जाना जाता रहा। लंबे समय तक इसकी पहचान उसी परंपरा से जुड़ी रही, लेकिन 21 अगस्त 2025 को यह भूमि “मां नर्मदा श्री उत्तम शांतिनाथ” के नाम रजिस्टर्ड हो गई। यह परिवर्तन अचानक और चर्चा का विषय बन गया।

सवाल उठता है कि क्या यह सामान्य लेन-देन था या इसके पीछे कोई विशेष परिस्थितियां थीं? क्या संबंधित राजस्व अधिकारियों ने स्वामित्व परिवर्तन की पूरी जांच की? क्या आपत्तियों का अवसर दिया गया? इन प्रश्नों के उत्तर फिलहाल सार्वजनिक रिकॉर्ड में स्पष्ट नहीं हैं, जिससे संदेह और गहरा गया है।

इतने पुराने संत ने साल 2025 में क्यों बनवाया आश्रम

उत्तम स्वामी पर यह भी आरोप लग रहे हैं कि पहले उनकी छवि जैन संत के रूप में प्रसारित की गई थी। तब वह सफेद वस्त्र धारण करते थे। कुछ समय बाद उन्होंने भगवा वस्त्र धारण करना शुरू किया और उसके बाद वह महामंडलेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुए। हालांकि इन आरोपों की और उनके महामंडलेश्वर बनने की कोई प्रमाणित तिथि उपलब्ध नहीं है।

लेकिन सवाल यहां उठ रहा है कि इतने पुराने संत आखिर एकाएक साल 2025 में जबलपुर के एक संत की भूमि को अपने नाम पर ट्रांसफर करते हैं और वहां पर बिना डायवर्शन और बिना परमिशन के आश्रम खड़ा कर देते हैं। अब मात्र 1 साल पहले हुए इस आश्रम के निर्माण पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

तेजी से हुआ नया कंस्ट्रक्शन, 5000 वर्गफीट तक विस्तार

ग्रामीणों का कहना है कि पहले आश्रम सीमित आकार में था, लेकिन पिछले एक साल में नए हिस्सों का निर्माण हुआ है। अनुमान है कि लगभग 5 हजार वर्गफीट क्षेत्र में नया पक्का ढांचा खड़ा किया गया है।

भूमि का कुल रकबा करीब 67 हजार वर्गफीट यानी एक एकड़ से अधिक बताया जा रहा है। ऐसे में यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि इतने बड़े निर्माण कार्य के दौरान क्या किसी विभाग ने स्थल निरीक्षण किया? क्या ग्राम पंचायत या नगर नियोजन विभाग से कोई अनुमति ली गई?

क्या जिम्मेदारों पर था राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव?

सबसे अहम सवाल यही है कि यदि भूमि कृषि मद में दर्ज थी, तो बिना डायवर्शन निर्माण संभव कैसे हुआ? क्या यह प्रशासनिक चूक थी या फिर किसी प्रकार का प्रभाव और दबदबा काम कर रहा था?

स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि उत्तम स्वामी का राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव मजबूत रहा है। ऐसे में यह संदेह भी उठ रहा है कि क्या इसी प्रभाव के चलते राजस्व और प्रशासनिक अमला अब तक कार्रवाई से करों बचता रहा ?

यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं, बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की जवाबदेही का सवाल बन जाता है।

कॉलम 10 में उड़द की खेती दर्ज-

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एसडीएम ने दिए जांच के संकेत

एसडीएम शहपुरा मदन सिंह रघुवंशी ने स्पष्ट किया है कि यदि भूमि कृषि मद में दर्ज है तो बिना डायवर्शन निर्माण नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि पूरे मामले की जांच की जाएगी और रिकॉर्ड की पड़ताल होगी।

अब यह जांच ही तय करेगी कि क्या स्वामित्व परिवर्तन और निर्माण प्रक्रिया वैधानिक थी या नियमों की अनदेखी की गई।

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रेप आरोपों के बीच बढ़ता दबाव

उत्तम स्वामी पहले से ही दुष्कर्म के गंभीर आरोपों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में भूमि और निर्माण से जुड़ा यह विवाद उनकी कानूनी और सामाजिक स्थिति को और जटिल बना सकता है। जबलपुर में अब चर्चा केवल आपराधिक मामले की नहीं है, बल्कि इस सवाल की भी है कि क्या प्रभावशाली लोगों के लिए नियम अलग होते हैं?

जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा कि यह मामला केवल प्रशासनिक त्रुटि है या प्रभाव और दबदबे की कहानी। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि 2025 में अचानक बदला नाम और बिना डायवर्शन निर्माण, आखिर किसके भरोसे?



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