गुजरात के बाद MP में बाघों में फैला कैनाइन डिस्टेंपर वायरस! बाघिन और शावकों की मौत से हुआ खुलासा
Aman Vaishnav | May 06, 2026, 12:04 IST
kanha tiger reserve tigress cubs death virus
कान्हा टाइगर रिजर्व में बाघिन T-141 और उसके 4 शावकों की मौत का एक बड़ा खुलासा हुआ है। जांच करने पर कैनाइन डिस्टेंपर वायरस मौत का कारण निकला। पेंच, बांधवगढ़ और पन्ना रिजर्व को भी हाई अलर्ट पर रखा गया है।
मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व में बाघिन T-141 और उसके चार शावकों की मौत सिर्फ नौ दिनों में हो गई। शुरुआती जांच में CDV (कैनाइन डिस्टेंपर वायरस) को मौत का जिम्मेदार माना जा रहा है।
सारही रेंज में यह पूरा बाघ परिवार खत्म हो गया है, जो वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में एक दर्दनाक हादसा है। घटना के बाद वन विभाग ने कई स्तरों पर कार्रवाई शुरू की है। पेंच, बांधवगढ़ और पन्ना टाइगर रिजर्व को भी हाई अलर्ट पर रखा गया है।
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21 अप्रैल को सारही रेंज में एक नर शावक का शव मिला था। इसके बाद 23 अप्रैल को दूसरा और 25 अप्रैल को एक मादा शावक का शव बरामद हुआ था।
28 अप्रैल को बाघिन की हालत बेहद नाजुक हो गई थी। वन विभाग ने उसे और आखिरी बचे शावक को बचाने के लिए क्वारंटीन सेंटर में शिफ्ट किया था।
शुरुआत में दोनों में सुधार दिखा लेकिन अचानक हालत बिगड़ गई। बाघिन अगली सुबह चल बसी और शावक भी उसी दिन बाद में मर गया था।
जबलपुर के वन्यजीव फोरेंसिक संस्थान में हुई जांच में वायरस के निशान मिले है। इससे मौत की वजह तय करने में मदद मिली है।
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CDV (कैनाइन डिस्टेंपर वायरस) एक बेहद संक्रामक वायरस है। यह मुख्य रूप से कुत्तों को निशाना बनाता है। वहीं बाघ जैसे दूसरे मांसाहारी जानवर भी इसकी चपेट में आ जाते हैं।
यह वायरस सांस के रोग, पाचन तंत्र की समस्या और दौरे जैसे गंभीर तंत्रिका संबंधी लक्षण पैदा करता है। एक बार संक्रमण होने के बाद यह जानवर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को खत्म कर देता है।
खासतौर पर वे जानवर जिन्हें टीका नहीं लगा होता उनके लिए यह जानलेवा साबित होता है।
यह वायरस सीधे संपर्क, शिकार या एक ही जगह पर खाना खाने से जंगली जानवरों तक फैलता है। संरक्षित वनक्षेत्रों के पास रहने वाले बिना टीके वाले कुत्ते इसके सबसे बड़े वाहक माने जाते हैं।
घटना के बाद वन विभाग ने तेज कदम उठाए हैं। संक्रमित क्षेत्र में 2 वर्ग किलोमीटर के जंगल को सील कर दिया गया है। साथ ही पानी के स्रोतों को साफ और कीटाणुरहित किया गया है। सारही रेंज के उस हिस्से को क्वारंटीन कर दिया गया जहां ये मौतें हुईं थी।
बफर जोन के आठ गांवों में 94 कुत्तों को तत्काल टीके लगाए गएहैं। इस मौजूदा टीकाकरण अभियान में अब तक 12 जहार से ज्यादा जानवरों को कवर किया जा चुका है।
निगरानी के लिए 40 कैमरा ट्रैप लगाए गए और हाथी गश्त भी शुरू की गई है। वन कर्मचारियों को CDV के लक्षण पहचानने की ट्रेनिंग दी जा रही है।
कान्हा की इस घटना ने पूरे मध्य प्रदेश के वन्यजीव प्रबंधन को हिलाकर रख दिया है। पेंच, बांधवगढ़ और पन्ना टाइगर रिजर्व को हाई अलर्ट पर रखा गया है। तीनों जगहों पर भी एहतियाती कदम उठाए जा रहे हैं।
इस साल मध्य प्रदेश में T-141 और उसके शावकों समेत 27 बाघों की मौत हो चुकी है। इनमें से ज्यादातर मौतें इलाकाई लड़ाई, प्राकृतिक कारणों और कुछ मामलों में बिजली के करंट से हुई थीं। CDV के कारण मौत का यह पहला संदिग्ध मामला है।
यह पहली बार नहीं है कि CDV ने भारत के किसी वन्यजीव क्षेत्र पर हमला बोला हो। 2018 में गुजरात के गिर शेर अभयारण्य में करीब 28 शेर दो हफ्तों के भीतर मर गए थे। जांच में CDV ही वजह पाई गई थी।
गिर के शेर एक अलग-थलग आबादी में रहते हैं। इससे वायरस के फैलाव की गति और तेज हो गई थी। यह घटना भारत के वन्यजीव प्रबंधन के लिए एक बड़ी चेतावनी थी। कान्हा की घटना उसी इतिहास को फिर से याद दिला रही है।
कान्हा टाइगर रिजर्व के बफर जोन में लगभग 150 गांव हैं। इन गांवों के ज्यादातर कुत्ते अर्ध-पालतू हैं यानी घर से जुड़े हैं लेकिन खुले घूमते हैं।
ये कुत्ते CDV जैसे वायरस के सबसे बड़े स्रोत बन सकते हैं। यही कारण है कि बफर जोन के गांवों में कुत्तों का टीकाकरण इस पूरे बचाव अभियान की सबसे जरूरी कड़ी बन गया है।
भारत दुनिया में बाघों की सबसे बड़ी आबादी का घर है। मध्य प्रदेश इस गौरव में सबसे आगे है। कान्हा टाइगर रिजर्व में नौ दिन में एक पूरे बाघ परिवार का खत्म हो जाना सिर्फ एक वन्यजीव त्रासदी नहीं है, यह हमारी संरक्षण नीतियों और जनस्वास्थ्य की चूक का भी संकेत है।
CDV (Canine Distemper Virus) जैसी बीमारियां पालतू जानवरों से जंगली जानवरों तक बहुत तेजी से फैलती हैं। वन क्षेत्रों के पास रहने वाले बिना टीके वाले कुत्ते इसकी सबसे बड़ी वजह बनते हैं। यह खबर आम नागरिकों को बताती है कि वन्यजीव संरक्षण का रिश्ता सीधे गांव के स्तर पर जानवरों के टीकाकरण और जागरूकता से जुड़ा है।
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सारही रेंज में यह पूरा बाघ परिवार खत्म हो गया है, जो वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में एक दर्दनाक हादसा है। घटना के बाद वन विभाग ने कई स्तरों पर कार्रवाई शुरू की है। पेंच, बांधवगढ़ और पन्ना टाइगर रिजर्व को भी हाई अलर्ट पर रखा गया है।
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नौ दिन में पांच मौतें
28 अप्रैल को बाघिन की हालत बेहद नाजुक हो गई थी। वन विभाग ने उसे और आखिरी बचे शावक को बचाने के लिए क्वारंटीन सेंटर में शिफ्ट किया था।
शुरुआत में दोनों में सुधार दिखा लेकिन अचानक हालत बिगड़ गई। बाघिन अगली सुबह चल बसी और शावक भी उसी दिन बाद में मर गया था।
जबलपुर के वन्यजीव फोरेंसिक संस्थान में हुई जांच में वायरस के निशान मिले है। इससे मौत की वजह तय करने में मदद मिली है।
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CDV क्या होता है?
यह वायरस सांस के रोग, पाचन तंत्र की समस्या और दौरे जैसे गंभीर तंत्रिका संबंधी लक्षण पैदा करता है। एक बार संक्रमण होने के बाद यह जानवर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को खत्म कर देता है।
खासतौर पर वे जानवर जिन्हें टीका नहीं लगा होता उनके लिए यह जानलेवा साबित होता है।
यह वायरस सीधे संपर्क, शिकार या एक ही जगह पर खाना खाने से जंगली जानवरों तक फैलता है। संरक्षित वनक्षेत्रों के पास रहने वाले बिना टीके वाले कुत्ते इसके सबसे बड़े वाहक माने जाते हैं।
मल्टी-लेयर रिस्पांस शुरू
बफर जोन के आठ गांवों में 94 कुत्तों को तत्काल टीके लगाए गएहैं। इस मौजूदा टीकाकरण अभियान में अब तक 12 जहार से ज्यादा जानवरों को कवर किया जा चुका है।
निगरानी के लिए 40 कैमरा ट्रैप लगाए गए और हाथी गश्त भी शुरू की गई है। वन कर्मचारियों को CDV के लक्षण पहचानने की ट्रेनिंग दी जा रही है।
तीन रिजर्व हाई अलर्ट पर
इस साल मध्य प्रदेश में T-141 और उसके शावकों समेत 27 बाघों की मौत हो चुकी है। इनमें से ज्यादातर मौतें इलाकाई लड़ाई, प्राकृतिक कारणों और कुछ मामलों में बिजली के करंट से हुई थीं। CDV के कारण मौत का यह पहला संदिग्ध मामला है।
गुजरात में भी हो चुका है ऐसा
गिर के शेर एक अलग-थलग आबादी में रहते हैं। इससे वायरस के फैलाव की गति और तेज हो गई थी। यह घटना भारत के वन्यजीव प्रबंधन के लिए एक बड़ी चेतावनी थी। कान्हा की घटना उसी इतिहास को फिर से याद दिला रही है।
कुत्तों से बाघ तक का रास्ता
ये कुत्ते CDV जैसे वायरस के सबसे बड़े स्रोत बन सकते हैं। यही कारण है कि बफर जोन के गांवों में कुत्तों का टीकाकरण इस पूरे बचाव अभियान की सबसे जरूरी कड़ी बन गया है।
यह खबर क्यों जरूरी है?
CDV (Canine Distemper Virus) जैसी बीमारियां पालतू जानवरों से जंगली जानवरों तक बहुत तेजी से फैलती हैं। वन क्षेत्रों के पास रहने वाले बिना टीके वाले कुत्ते इसकी सबसे बड़ी वजह बनते हैं। यह खबर आम नागरिकों को बताती है कि वन्यजीव संरक्षण का रिश्ता सीधे गांव के स्तर पर जानवरों के टीकाकरण और जागरूकता से जुड़ा है।
FAQ
- CDV (Canine Distemper Virus) क्या है और यह बाघों को कैसे प्रभावित करता है?
CDV यानी कैनाइन डिस्टेंपर वायरस एक अत्यंत संक्रामक वायरस है जो मुख्य रूप से कुत्तों को प्रभावित करता है। यह सांस की बूंदों, लार, मूत्र या मल के जरिए फैलता है। जब यह वायरस बाघ जैसे जंगली मांसाहारी जानवरों तक पहुंचता है तो बुखार, फेफड़ों में संक्रमण, पाचन संबंधी परेशानी और दौरे जैसे गंभीर तंत्रिका तंत्र संबंधी लक्षण पैदा करता है। बिना टीके वाले युवा जानवरों में यह सबसे ज्यादा घातक होता है। इस वायरस का अभी तक कोई पक्का इलाज नहीं है, इसलिए रोकथाम ही सबसे बड़ा हथियार है। - कान्हा टाइगर रिजर्व में क्या हुआ और वन विभाग ने क्या कदम उठाए?
21 अप्रैल से 29 अप्रैल 2026 के बीच कान्हा टाइगर रिजर्व की सारही रेंज में बाघिन T-141 और उसके चार शावकों की मौत CDV के संदिग्ध संक्रमण से हो गई। जबलपुर स्थित वन्यजीव फोरेंसिक प्रयोगशाला में जांच के बाद वायरस की पुष्टि हुई। जवाब में 2 वर्ग किलोमीटर जंगल को सील किया गया, पानी के स्रोतों को कीटाणुरहित किया गया, 40 कैमरा ट्रैप लगाए गए और बफर जोन के गांवों में 94 कुत्तों को टीके लगाए गए। इस चक्र में कुल 12 हजार से ज्यादा जानवरों का टीकाकरण हो चुका है। पेंच, बांधवगढ़ और पन्ना रिजर्व को भी हाई अलर्ट पर रखा गया है। - क्या CDV से पहले भी भारत में वन्यजीवों की मौत हुई है?
हां। 2018 में गुजरात के गिर शेर अभयारण्य में CDV के कारण करीब 28 एशियाई शेरों की मौत दो हफ्तों में हो गई थी। चूंकि गिर के शेर एक अलग-थलग आबादी में रहते हैं, इसलिए वायरस बेहद तेजी से फैला। उस घटना के बाद भारत के कई टाइगर और लायन रिजर्व में CDV की रोकथाम के लिए कुत्तों के टीकाकरण को प्राथमिकता दी गई। कान्हा की ताजा घटना यह याद दिलाती है कि यह खतरा अभी टला नहीं है।
एमपी में 1000 के करीब पहुंची बाघों की संख्या, सरकार ने पूछा- जंगल कितने बाघों के लिए पर्याप्त
मध्यप्रदेश न्यूज: क्या खतरे में है MP का टाइगर स्टेट का टैग? नहीं धम रहे बाघ की मौत के मामले
एमपी न्यूज: नहीं थम रहा बाघों की मौत का आंकड़ा, 5 दिन में 3 शावकों ने गंवाई जान
सरिस्का में बाघिन ने दिए 3 शावकों को जन्म, कुनबा बढ़कर हुआ 52, अब छोटा पड़ने लगा जंगल
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