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BHOPAL. कूनो नेशनल पार्क में नामीबिया से लाए गए चीतों का पुनर्वास पहले ही 100 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च करा चुका है। अब विधानसभा में दी गई जानकारी से खुलासा हुआ है कि पार्क में मौजूद 32 चीते सिर्फ एक साल में 1 करोड़ 27 लाख रुपए से ज्यादा कीमत का बकरा मीट खा चुके हैं। खास बात यह है कि बकरों की खरीदी के लिए कोई अलग बजट नहीं है। खर्च दूसरी मदों से किया गया है।
सदन में सामने आए बड़े तथ्य
कूनो प्रोजेक्ट पर कुल खर्च 100 करोड़ रुपए से अधिक। वर्तमान में कूनो में 32 चीते मौजूद। वित्तीय वर्ष 2024-25 में 1.27 करोड़ रुपए से ज्यादा का बकरा मीट खरीदा गया। बकरा खरीदी के लिए अलग से कोई निर्धारित बजट नहीं है। प्रतिदिन कितने बकरे खिलाए जाते हैं, इसका कोई तय मानक नहीं है।
कितना हुआ मीट पर खर्च?
कांग्रेस विधायक मुकेश मल्होत्रा ने सवाल किया था कि चीतों के भोजन पर सालाना कितना खर्च हो रहा है और रोज कितने बकरे खिलाए जा रहे हैं। लिखित जवाब में सीएम मोहन यादव ने बताया कि 2024-25 में बकरा मीट खरीदने पर 1 करोड़ 27 लाख 10 हजार 870 रुपए खर्च हुए हैं।
अलग बजट नहीं, दूसरी योजनाओं से खर्च
सरकार ने स्पष्ट किया कि बकरों की खरीदी के लिए अलग से कोई विशेष बजट नहीं दिया गया है। चीतों की देखभाल, प्रबंधन और अन्य योजनाओं के तहत जो राशि स्वीकृत होती है, उसी से मीट खरीदा जाता है।
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रोज कितने बकरे?
सबसे अहम सवाल यह था कि प्रतिदिन कितने बकरे चीतों को खिलाए जाते हैं। सरकार ने जवाब दिया कि इसका कोई निर्धारित मानक नहीं है। आवश्यकता के अनुसार मीट उपलब्ध कराया जाता है। विधायक ने यह भी पूछा कि क्या चीते ग्वालियर, शिवपुरी, मुरैना या राजस्थान के ग्रामीण इलाकों तक पहुंच रहे हैं और मवेशियों का शिकार कर रहे हैं। सरकार ने माना कि खुले जंगल में विचरण करते हुए कुछ चीते कभी-कभी वनमंडल की सीमा से बाहर चले जाते हैं और ग्रामीणों के पशुओं का शिकार कर लेते हैं।
एक्सीडेंट में चीते की मौत
दिसंबर 2025 में घाटीगांव हाइवे पर एक चीते की सड़क दुर्घटना में मौत हुई थी। सरकार ने स्पष्ट किया कि यह राष्ट्रीय राजमार्ग पर हुई दुर्घटना थी और निगरानी व ट्रैकिंग टीम लगातार सक्रिय है।
बड़ा सवाल: संरक्षण बनाम खर्च
कूनो प्रोजेक्ट देश का महत्वाकांक्षी वन्यजीव पुनर्वास अभियान है। लेकिन जब खर्च 100 करोड़ पार हो जाए और सिर्फ भोजन पर सालाना 1.27 करोड़ खर्च हो तो पारदर्शिता और दीर्घकालिक रणनीति पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
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आगे क्या जरूरी?
- खर्च का स्पष्ट और पारदर्शी ब्योरा।
- मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने के ठोस उपाय हाईवे सुरक्षा और ट्रैकिंग मजबूत करना।
- स्थानीय ग्रामीणों के लिए मुआवजा तंत्र प्रभावी बनाना।
- क्योंकि यह सिर्फ चीतों का मामला नहीं, बल्कि वन्यजीव संरक्षण, सरकारी जवाबदेही और जनभावनाओं से जुड़ा विषय है।
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