16 बसों का 9 करोड़ टैक्स घोटाला: RTO के संरक्षण में सड़कों पर दौड़ रही कबाड़ बसें, EOW ने दर्ज किया केस

डिंडौरी में 16 यात्री बसों से जुड़ा 9 करोड़ रुपए का टैक्स घोटाला सामने आया है। बसों को कागजों में कबाड़ दिखाया गया, लेकिन परमिट और फिटनेस जारी होते रहे। अब RTO दफ्तर की भूमिका पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

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Neel Tiwari
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RTO 9 crore tax

News in short

  • 16 बसों का 2006 से 2025 तक टैक्स जमा नहीं किया गया।
  • बसों को कबाड़ दिखाकर टैक्स से बचने का आरोप।
  • बकाया के बावजूद RTO से परमिट और फिटनेस जारी होने का दावा।
  • टैक्स वसूली के दौरान मूल फाइलें गायब मिलीं।
  • शासन को करीब 9 करोड़ रुपए का नुकसान, EOW ने अपराध दर्ज किया।

News in detail

आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ, जबलपुर ने एक ऐसे मामले का खुलासा किया है। जिसमें आरटीओ की मेहरबानी से कबाड़ घोषित हो चुकी बसें 20 सड़कों पर दौड़ रही थी। इस पूरे मामले की शिकायत भोपाल मुख्यालय से मिली थी। शिकायत में साफ आरोप था कि भारी बकाया टैक्स होने के बावजूद संबंधित बसों के परमिट और फिटनेस प्रमाणपत्र जिला परिवहन कार्यालय डिंडौरी से जारी किए गए। यही बिंदु सबसे अहम है। नियमों के अनुसार जब तक वाहन का पूरा टैक्स जमा न हो, तब तक उसे परमिट या फिटनेस जारी नहीं की जा सकती। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि आखिर RTO दफ्तर ने किस आधार पर दस्तावेज जारी किए? क्या यह महज लापरवाही थी या फिर सुनियोजित मिलीभगत?

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16 बसें, कई रूटों पर संचालन, लेकिन टैक्स शून्य

जांच में सामने आया कि संजय केशवानी और साधना केशवानी के नाम पर 16 बसें पंजीकृत थीं। ये बसें डिंडौरी, जबलपुर, शहडोल, मंडला और बालाघाट जिलों में दर्ज थीं और डिंडौरी-जबलपुर, अमरकंटक-मलाजखंड, बिछिया-डिंडौरी जैसे व्यस्त रूटों पर संचालित हो रही थीं। इन रूटों पर नियमित संचालन से अच्छी आय होना स्वाभाविक है। इसके बावजूद वर्ष 2006 से 2025 तक टैक्स जमा न होना और फिर भी संचालन जारी रहना, RTO कार्यालय की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

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कागजों में कबाड़, हकीकत में चलती रहीं बसें

बस मालिकों ने परिवहन कार्यालय को सूचना दी कि संबंधित बसों को कबाड़ में बेच दिया गया है। इस सूचना के आधार पर टैक्स जमा करना बंद कर दिया गया। लेकिन जांच में पाया गया कि बसों को नष्ट करने की वैधानिक अनुमति नहीं ली गई थी। न तो वाहन निरस्तीकरण की पूरी प्रक्रिया अपनाई गई और न ही आवश्यक सत्यापन हुआ। ऐसे में सवाल यह भी है कि RTO दफ्तर ने बिना भौतिक सत्यापन के इस सूचना को रिकॉर्ड में कैसे दर्ज कर लिया?

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वसूली शुरू होते ही गायब हुईं टैक्स फाइलें

वर्ष 2017 में जब जिला परिवहन कार्यालय डिंडौरी ने बकाया टैक्स की वसूली शुरू की, तब संबंधित बसों की टैक्स फाइलें रिकॉर्ड में नहीं मिलीं। आरोप है कि उस समय पदस्थ सहायक ग्रेड-1 कर्मचारी पुष्प कुमार प्रधान ने बकाया टैक्स से जुड़ी मूल नस्तियों को सुरक्षित नहीं रखा। फाइलें गायब होने से न सिर्फ वसूली प्रक्रिया रुक गई, बल्कि विभाग के पास कानूनी कार्रवाई के लिए जरूरी दस्तावेज भी नहीं बचे। इससे बस मालिकों को सीधा लाभ मिला।

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RTO की आंतरिक जांच की मांग

EOW की जांच में यह स्थापित हुआ कि बस मालिकों और विभागीय कर्मचारी के बीच आपराधिक षड्यंत्र की संभावना है। बकाया टैक्स, फाइलों का गायब होना और परमिट जारी होना, ये सभी तथ्य एक-दूसरे से जुड़े हुए नजर आ रहे हैं। टैक्स की गणना के अनुसार शासन को लगभग 9 करोड़ रुपए की आर्थिक क्षति हुई है। इतनी बड़ी राजस्व हानि के बाद अब RTO कार्यालय की आंतरिक कार्यप्रणाली और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की मांग उठ रही है।

इन धाराओं में दर्ज हुआ मामला

आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ जबलपुर ने आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 318(4), 61(2), 238 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 (संशोधित 2018) की धारा 7-सी के तहत अपराध दर्ज किया है। मामले की विस्तृत विवेचना जारी है। EOW यह भी जांच कर रही है कि क्या इस पूरे प्रकरण में अन्य अधिकारी या कर्मचारी भी शामिल थे। आने वाले दिनों में RTO दफ्तर की भूमिका को लेकर और खुलासे हो सकते हैं।

यह मामला सिर्फ टैक्स चोरी का नहीं, बल्कि परिवहन व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़ा बड़ा सवाल बन गया है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जांच में कितनी गहराई तक सच्चाई सामने आती है और शासन की क्षति की भरपाई कैसे होगी।

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