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News In Short
कमलेश बाई कुशवाहा और राजू कुशवाहा को हत्या के आरोप से हाईकोर्ट ने बरी किया।
कोर्ट ने पुलिस जांच को कथा लेखन और दस्तावेजों को फर्जी बताया।
एक ही समय पर जांच अधिकारी की दो जगह मौजूदगी का दावा झूठा पाया गया।
मुख्य गवाह मुकरा, कॉल डिटेल्स बिना 65B प्रमाणपत्र के पेश की गईं।
DGP को विभागीय जांच के निर्देश, आदेश सभी पुलिसकर्मियों में प्रसारित करने को कहा गया।
News In Detail
MP News. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने हत्या के एक सनसनीखेज मामले में पुलिस की जांच को दुर्भावनापूर्ण बताया है। साथ ही दो आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया है। कोर्ट ने पाया कि जांच अधिकारी ने फर्जी दस्तावेज तैयार कर निर्दोषों को फंसाने की कोशिश की है। हाईकोर्ट ने DGP को दोषी इंस्पेक्टर पर विभागीय जांच के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा इस आदेश को पूरे पुलिस महकमे में प्रसारित करने को कहा है, ताकि भविष्य में ऐसी हरकतों पर लगाम लग सके।
यह मामला साल 2017 का है। जब पन्ना जिले की प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अदालत ने 16 नवंबर 2022 को कमलेश बाई कुशवाहा और राजू कुशवाहा को भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 (हत्या) और 201 (साक्ष्य मिटाना) के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
अभियोजन का आरोप था कि कमलेश बाई और राजू के बीच अवैध संबंध थे। उसका कहना है कि दोनों ने मिलकर कमलेश के पति पंथप्रकाश की हत्या कर शव को ठिकाने लगा दिया। इसी आधार पर निचली अदालत ने उन्हें दोषी माना था।
हाईकोर्ट में खुली पुलिस की कथा लेखन वाली जांच
जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस राजेंद्र कुमार वानी की बेंच ने अपील पर सुनवाई की। जिसमें उन्होंने पाया कि इस मामले में असल जांच की बजाय केवल कहानी बनाई गई थी। कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी ने तथ्यों के बजाय घटनाक्रम को इस तरह प्रस्तुत किया, मानों वह कोई काल्पनिक कथा लिख रहे हों। डॉक्यूमेंट्स और साक्ष्यों में गंभीर विरोधाभास सामने आए, जिससे अभियोजन की पूरी कहानी संदिग्ध हो गई है।
एक समय में दो जगह मौजूद अधिकारी
पुलिस ने दावा किया कि 5 अप्रैल 2017 को सुबह 8:30 बजे आरोपी राजू कुशवाहा का मेमोरेंडम थाना अमानगंज में दर्ज किया गया। वहीं वैज्ञानिक अधिकारी डॉ. महेंद्र सिंह की रिपोर्ट में कहा गया कि, उसी समय जांच अधिकारी इंस्पेक्टर डी.के. सिंह घटनास्थल पर थे, जो थाने से चार किलोमीटर दूर था। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि एक अधिकारी एक समय में दो स्थानों पर नहीं हो सकता। इस विरोधाभास से दस्तावेजों की विश्वसनीयता खत्म हो गई और उन्हें फर्जी माना गया।
मुख्य गवाह मुकरा लास्ट सीन थ्योरी ध्वस्त
अभियोजन का दावा था कि, रामजान खान ने आरोपियों को आखिरी बार मृतक के साथ देखा था। लेकिन अदालत में गवाही देते समय उसने इस दावे से साफ इनकार कर दिया। इसी तरह मृतक के भाई छोटेलाल ने भी स्वीकार किया कि उसने कभी आरोपियों को आपत्तिजनक स्थिति में नहीं देखा और न ही मृतक ने कभी ऐसे संबंधों की शिकायत की थी। इतना ही नहीं, उसने यह भी कहा कि पुलिस ने उससे कोरे कागजों पर साइन करवाए थे। इन तथ्यों ने अभियोजन की पूरी कहानी को कमजोर कर दिया।
तकनीकी साक्ष्यों में भी भारी चूक
पुलिस ने कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) पेश तो किए, लेकिन भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B के तहत जरूरी सर्टिफिकेट पेस नहीं किया।साथ ही आरोपियों की लोकेशन उस स्थान पर नहीं पाई गई जहां शव फेंका गया था। इससे तकनीकी साक्ष्य भी अदालत की कसौटी पर खरे नहीं उतरे।
दुर्भावनापूर्ण जांच पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
High Court ने कहा कि यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि Malicious Investigation यानी दुर्भावनापूर्ण जांच का मामला है। कोर्ट ने कहा कि निर्दोष नागरिकों को फर्जी दस्तावेजों के आधार पर फंसाने की अनुमति कानून नहीं देता। पुलिस का कर्तव्य न्याय की सहायता करना है, न कि कहानी गढ़कर किसी को सजा दिलाना।
DGP को विभागीय जांच और आदेश प्रसारित करने के निर्देश
कोर्ट ने दोनों अपीलकर्ताओं को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया। साथ ही पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देशित किया गया कि तत्कालीन इंस्पेक्टर डी.के. सिंह के खिलाफ विभागीय जांच प्रारंभ करने पर विचार करें।
सबसे जरूरी बात यह रही कि हाईकोर्ट (जबलपुर हाईकोर्ट) ने आदेश दिया कि इस फैसले को सभी पुलिसकर्मियों के बीच प्रसारित किया जाए, ताकि यह एक नसीहत बने और भविष्य में कोई भी अधिकारी फर्जी दस्तावेज तैयार कर निर्दोषों को फंसाने की हिम्मत न करे।
हाईकोर्ट ने दिया चेतावनी भरा साफ संदेश
यह फैसला केवल दो आरोपियों की रिहाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे पुलिस तंत्र के लिए एक सख्त संदेश है कि जांच की निष्पक्षता और पारदर्शिता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। हाईकोर्ट के रुख से साफ है कि न्यायालय फर्जी जांच और झूठे साक्ष्यों के आधार पर दी गई सजाओं को सहन नहीं करेगा।
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