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News In Short
- मध्य प्रदेश में करीब 250 कृषि वैज्ञानिक अपने वेतन को तरस रहे हैं।
- आईसीएआर ने दिया तर्क कि इन्हें वेतन सुविधाएं देना राज्य की जिम्मेदारी है।
- सरकार का तर्क है कि पहले आरसीएआर (केंद्रीय कृषि अनुसंधान परिषद) खर्च उठाता था तो अब क्यों नहीं उठाता है।
- आईसीएआर और सरकार की लड़ाई में दो साल से मामला अटका है।
- विश्वविद्यालय सभी 228 कर्मचारियों का संविलियन नहीं कर सकता है।
News In Detail
मध्य प्रदेश के खेतों में खुशहाली का बीज बोने वाले वैज्ञानिक आज खुद अभाव की फसल काट रहे हैं। प्रदेश के कृषि विज्ञान केंद्रों के करीब 250 कर्मचारी और वैज्ञानिक अफसरशाही की उस अड़ियल जंग में पिस रहे हैं जहां तर्क तो भारी हैं लेकिन वैज्ञानिक हार रहे हैं। स्थिति यह है कि दो साल से ये वैज्ञानिक साल के 4-5 महीने बिना वेतन के गुजार रहे हैं।
ऐसे चलते हैं कृषि विज्ञान केंद्र
केंद्रीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के सहयोग से प्रदेश में कुल 52 कृषि विज्ञान केंद्र संचालित हैं। इनमें से 44 केंद्र जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर के माध्यम से स्थापित किए गए हैं। अनूपपुर का केंद्र सेंट्रल एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी अमरकंटक तथा शेष सात केंद्र निजी स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा चलाए जा रहे हैं।
अकेले जबलपुर कृषि विश्वविद्यालय से जुड़े केंद्रों में ही करीब 150 वैज्ञानिकों सहित 228 कर्मचारी कार्यरत हैं। ये सभी केंद्र अलग-अलग वर्षों में स्थापित हुए हैं। दो साल से सभी एक जैसी वेतन समस्या से जूझ रहे हैं।
दो साल पहले शुरू हुआ संकट
सूत्रों के अनुसार वर्ष 2023–24 तक स्थिति सामान्य थी। 2024 में आईसीएआर ने कृषि विज्ञान केंद्रों के कर्मचारियों की पेंशन, जीएसटी और अन्य मदों का भुगतान करने से इनकार कर दिया। आईसीएआर का कहना है कि केंद्रों की स्थापना में राज्य सरकार के साथ एमओयू हुआ था।
इस एमओयू में यह स्पष्ट था कि कर्मचारी राज्य सरकार के माने जाएंगे। केंद्रों की स्थापना में यह शर्त पहले से तय की गई थी। उनकी पेंशन व अन्य देनदारियां राज्य सरकार की जिम्मेदारी होंगी। आईसीएआर का कहना है कि वह केवल मूल वेतन, महंगाई भत्ता और मकान भत्ता का भुगतान करने के लिए बाध्य है।
पहले दे रहे थे,अब क्यों नहीं?
मध्य प्रदेश कृषि विभाग और जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय के अधिकारी एमओयू की शर्तें मानते हैं। हालांकि, वे सवाल उठाते हैं कि 2023–24 तक आईसीएआर ने सभी भुगतान किए थे। अब अचानक अनुबंध की शर्तें कैसे याद आ गईं।
हाईकोर्ट की दखल,पूरा वेतन दें
वेतन संकट से परेशान कुछ वैज्ञानिकों व कर्मचारियों ने हाईकोर्ट जबलपुर में याचिका दायर की। अदालत ने अंतरिम राहत देते हुए पूर्व की तरह पूरा वेतन देने के आदेश जारी किए। आदेश के उल्लंघन पर अवमानना याचिका भी दाखिल की गई है जो फिलहाल विचाराधीन है।
विश्वविद्यालय खुद वेतन संकट में
जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार अखिलेश कुमार जैन ने बताया कि, राज्य सरकार से विश्वविद्यालय को केवल 98 करोड़ रुपए की ग्रांट मिलती है। अन्य राज्यों में यह ग्रांट 400 से 700 करोड़ रुपए तक होती है। सीमित बजट के चलते विश्वविद्यालय अपने नियमित कर्मचारियों को भी पूरे साल का वेतन नहीं दे पा रहा है। पिछले साल केवल 10 माह का वेतन दिया जा सका और इस वर्ष भी हालात कुछ बेहतर नहीं हैं।
जैन के मुताबिक अदालत के आदेश के अनुसार आईसीएआर से प्राप्त पूरी राशि कृषि विज्ञान केंद्रों को आवंटित की जा रही है। तय अनुपात से कम राशि मिलने के कारण साल में केवल कुछ महीनों का ही वेतन दिया जा रहा है।
संविलियन का प्रस्ताव, अनुसंधान पर खतरा
वेतन संकट से निपटने के लिए विश्वविद्यालय ने कृषि विज्ञान केंद्रों के कर्मचारियों के संविलियन का प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजा है। यदि यह प्रस्ताव मंजूर होता है तो इसका सीधा मतलब कृषि विज्ञान केंद्रों का बंद होना होगा। रजिस्ट्रार जैन ने स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय सभी 228 कर्मचारियों का संविलियन नहीं कर सकता। कई पद सीधी भर्ती के हैं जिन्हें संविलियन से भरा नहीं जा सकता।
अब शर्तों की दुहाई क्यों
आईसीएआर के जबलपुर जोन के निदेशक डॉ. एस.आर.के. सिंह का कहना है कि एमओयू में पेंशन भुगतान न करने की शर्त स्पष्ट रूप से दर्ज है। आईसीएआर ने दिसंबर 2025 तक की अपनी पूरी देनदारी चुका दी है। शेष जिम्मेदारी कृषि विश्वविद्यालय और राज्य सरकार की है।
वहीं राज्य के कृषि विभाग के अपर मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल ने भी इस पर अपनी टिप्पणी दी। कहा कि दो साल पहले तक आईसीएआर पूरा वेतन देता रहा है। अब अचानक अनुबंध की शर्तों की दुहाई क्यों दी जा रही है।
जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय एक स्वायत्त संस्था है। ऐसे में कृषि विज्ञान केंद्रों के कर्मचारियों को राज्य सरकार का कर्मचारी नहीं माना जा सकता।
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