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News in Short
- एमपी के 20 सरकारी कॉलेजों में बिना ICAR मापदंडों के BSc एग्रीकल्चर कोर्स शुरू किया गया है।
- कॉलेजों के पास खुद की कृषि भूमि और लैब नहीं है, वे प्रैक्टिकल के लिए पूरी तरह किसानों पर निर्भर हैं।
- कई कॉलेजों में किसानों के खेत 20 किलोमीटर से भी अधिक दूर हैं, जिससे नियमित प्रैक्टिकल संभव नहीं हो पा रहे।
- स्थाई कृषि वैज्ञानिकों के स्थान पर केवल 3 गेस्ट फैकल्टी के भरोसे पूरा विभाग चलाया जा रहा है।
- सागर जैसे शहरों के कॉलेजों में संसाधनों के अभाव के कारण एक भी छात्र ने प्रवेश नहीं लिया है।
News in Detail
मध्य प्रदेश उच्च शिक्षा विभाग ने प्रदेश के 20 सरकारी कॉलेजों में बिना ICAR (Indian Council of Agricultural Research) मापदंडों के बीएससी एग्रीकल्चर का कोर्स तो शुरू कर दिया है। हालांकि, असल सच इससे कहीं ज्यादा चौंकाने वाला है।
इन कॉलेजों के पास न तो अपनी कृषि भूमि है, न प्रयोगशालाएं और न ही स्थाई कृषि वैज्ञानिक। विभाग ने इस कमी को पूरा करने के लिए जो फॉर्मूला निकाला है, उसने शिक्षा की गुणवत्ता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
किसानों के भरोसे प्रैक्टिकल
विभाग ने कॉलेजों को आदेश दिया है कि वे संसाधनों की कमी पूरी करने के लिए स्थानीय किसानों के साथ एमओयू (Memorandum of Understanding) करें। यानी छात्र प्रैक्टिकल करने के लिए किसानों के खेतों और उनके ट्रैक्टरों पर निर्भर रहेंगे।
हैरानी की बात यह है कि कई कॉलेजों ने जिन खेतों के साथ अनुबंध किया है, वे कॉलेज से 20-25 किलोमीटर दूर हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि छात्र हर दिन इतनी दूर जाकर नियमित प्रैक्टिकल कैसे करेंगे?
एक्सपर्ट्स की जगह गेस्ट फैकल्टी का सहारा
जहां प्रदेश के जबलपुर, ग्वालियर और रीवा स्थित कृषि विश्वविद्यालयों में दशकों से कड़े मापदंडों के तहत पढ़ाई हो रही है। वहीं इन नए 20 कॉलेजों में स्थाई फैकल्टी के बजाय तीन-तीन गेस्ट फैकल्टी के भरोसे पूरा कोर्स छोड़ दिया गया है।
Sootr Expert
इस पर रीवा एजी कॉलेज के डीन एसके त्रिपाठी कहते हैं कि, बीएससी एग्रीकल्चर (ऑनर्स) के शुरुआती सेमेस्टरों में हॉर्टिकल्चर और प्लांट बायोकैमिस्ट्री जैसे गंभीर विषय होते हैं, जिनके लिए उन्नत लैब जरूरी हैं। इन रिसोर्सेज के बिना एग्रीकल्चर की पढ़ाई करना सभंव ही नहीं है।
राजधानी से लेकर दमोह-सागर तक बदहाल स्थिति
प्रदेश के प्रमुख कॉलेजों में इस बीएससी एग्रीकल्चर कोर्स की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है-
भोपाल (MLB कॉलेज): यहां सेकंड ईयर में केवल 2 छात्राएं हैं। प्रैक्टिकल के लिए 20 किमी दूर किसान से जमीन का एमओयू किया गया है, फिलहाल कैंपस की छोटी क्यारियों में खरपतवार (Weeds) पर ही काम चल रहा है।
दमोह (PG कॉलेज): जुलाई 2024 से कोर्स तो चल रहा है, लेकिन लैब नहीं है। जो जमीन मिली थी, वह वन विभाग की निकली।
सागर (गर्ल्स कॉलेज): यहां स्थिति इतनी खराब है कि एक भी छात्र ने एडमिशन नहीं लिया। न भूमि है, न वैज्ञानिक और न ही शिक्षक।
जबलपुर (महाकौशल कॉलेज): पिछले सत्र से कोर्स शुरू हुआ, लेकिन अब तक न लैब बनी और न ही किसानों से एमओयू हो पाया है।
कॉलेजों की दलील बनाम एक्सपर्ट्स की चेतावनी
कॉलेज प्रबंधन का तर्क है कि वे शुरुआती दो साल की पढ़ाई बॉटनी और लाइफ साइंस की लैब में करा सकते हैं। हालांकि, कृषि एक्सपर्ट इसे शिक्षा के साथ खिलवाड़ मान रहे हैं। उनके अनुसार, एग्रीकल्चर कोर्स के लिए विशेष उपकरणों और प्रयोगात्मक भूखंडों (Experimental plots) की जरूरत होती है, जो सामान्य विज्ञान की लैब में संभव नहीं है।
सरकार क्या पक्ष रख रही है
इस पूरे मामले पर उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार का कहना है कि यह अभी शुरुआती चरण है। उन्होंने आश्वासन दिया है कि जो भी समस्याएं आ रही हैं, उनका समाधान किया जाएगा। कॉलेजों को निर्देश दिए गए हैं कि वे कम से कम तीन विषय एक्सपर्ट्स को जरूरी रूप से रखें ताकि पढ़ाई प्रभावित न हो।
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